भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 459, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 459
* अध्याय १२८ *४४९

| यश्चासौ तपते सूर्ये शुचिरग्निश्च स स्मृतः।<br>वैद्युतो जाठरः सौम्यो वैद्युतश्चाप्यनिन्धनः॥ ७<br>तेजोभिश्चाप्यते कश्चित् कश्चिदेवाप्यनिन्धनः।<br>काष्ठेन्धनस्तु निर्मथ्यः सोऽद्भिः शाम्यति पावकः॥ ८<br>अर्चिष्मान्पचनोऽग्निस्तु निष्प्रभः सौम्यलक्षणः।<br>यश्चासौ मण्डले शुक्ले निरूष्मा न प्रकाशते॥ ९<br>प्रभा सौरी तु पादेन अस्तं याति दिवाकरे।<br>अग्निमाविशते रात्रौ तस्मादग्निः प्रकाशते॥ १० | उसे पार्थिव अग्नि कहते हैं। जो अग्नि सूर्यमें स्थित होकर ताप पैदा करती है, वह शुचि अग्नि कहलाती है। उदरमें स्थित अग्नि विद्युत्से उत्पन्न हुई मानी जाती है। उसे सौम्य कहते हैं। इस वैद्युताग्निका इन्धन जल है। कोई अग्नि अपने तेजसे ही बढ़ती है और कोई बिना इन्धनके भी उद्दीप्त होती है। काष्ठरूपी इन्धनसे जलनेवाली अग्निका नाम निर्मन्थ्य है। यह अग्नि जलके संयोगसे शान्त हो जाती है। पचमान अग्नि ज्वालाओंसे संयुक्त रहता है और प्रभाहीन रहना सौम्य अग्निका लक्षण है। जो श्वेत मण्डलमें स्थित रहकर ऊष्मारहित हो प्रकाशित नहीं होती, सूर्यकी वह कान्ति सूर्यके अस्त हो जानेपर अपने चतुर्थांशसे अग्निमें प्रवेश कर जाती है, इसी कारण रातमें अग्निका प्रकाश अधिक होता है॥ २-१०॥ | | उदिते तु पुनः सूर्ये ऊष्माग्नेस्तु समाविशत्।<br>पादेन तेजसश्चाग्नेस्तस्मात् संतपते दिवा॥ ११<br>प्राकाश्यं च तथौष्ण्यं च सौर्याग्नेये तु तेजसी।<br>परस्परानुप्रवेशादाप्यायेते दिवानिशम्॥ १२<br>उत्तरे चैव भूम्यर्धे तथा ह्यस्मिंस्तु दक्षिणे।<br>उत्तिष्ठति पुनः सूर्ये रात्रिराविशते ह्यपः॥ १३<br>तस्मात् ताम्रा भवन्त्यापो दिवारात्रिप्रवेशनात्।<br>अस्तं गते पुनः सूर्ये अहो वै प्रविशत्यपः॥ १४<br>तस्मान्नक्तं पुनः शुक्ला ह्यापो दृश्यन्ति भासुराः।<br>एतेन क्रमयोगेन भूम्यर्धे दक्षिणोत्तरे॥ १५<br>उदयास्तमये चात्र ह्यहोरात्रं विशत्यपः।<br>यश्चासौ तपते सूर्यः सोऽपः पिबति रश्मिभिः॥ १६<br>सहस्त्रपादस्त्वेषोऽग्नी रक्तकुम्भनिभस्तु सः।<br>आदत्ते स तु नाडीनां सहस्त्रेण समन्ततः॥ १७<br>अपो नदीसमुद्रेभ्यो हृदकूपेभ्य एव च।<br>तस्य रश्मिसहस्त्रेण शीतवर्षोष्णनिःस्रवः॥ १८ | पुनः सूर्योदय होनेपर अग्निकी ऊष्मा अपने तेजके चतुर्थांशसे सूर्यमें प्रविष्ट हो जाती है, इस कारण दिनमें सूर्य पूर्णरूपसे तपते हैं। प्रकाशता, उष्णता, सूर्य और अग्निका तेज—इन सबके परस्पर अनुप्रवेश करनेके कारण दिन-रातकी पूर्ति होती है। पृथ्वीके उत्तरवर्ती तथा दक्षिणवर्ती अर्धभागमें सूर्यके उदय होनेपर रात्रि पुनः जलमें प्रवेश कर जाती है। इस प्रकार दिनके समय रात्रिके जलमें प्रवेश करनेके कारण दिनमें जल लाल रंगका दीख पड़ता है। पुनः सूर्यके अस्त हो जानेपर दिन जलमें प्रवेश करता है। इसी कारण जल रातमें उज्ज्वल और चमकीला दिखायी पड़ता है। इसी क्रमसे भूमिके दक्षिणोत्तर अर्धभागमें सूर्यके उदय एवं अस्तके समय दिन और रात क्रमशः जलमें प्रवेश करते हैं। जो ये सूर्य तप रहे हैं, वे अपनी किरणोंद्वारा जलको सोखते हैं। सूर्यमें स्थित अग्निका रंग लाल रंगके घड़ेके समान है। उसमें हजारों किरणें हैं। वह अपनी सहस्रों नाड़ियोंसे नदी, समुद्र, ह्रद और कुएँसे जलको ग्रहण करता है। सूर्यकी उन्हीं हजारों किरणोंसे शीत, वर्षा और गरमीका प्रादुर्भाव होता है॥ ११-१८॥ | | तासां चतुःशतं नाड्यो वर्षन्ते चित्रमूर्तयः। | उन सहस्रों किरणोंमें विचित्र आकृतिवाली चार सौ नाड़ियाँ जलकी वर्षा करनेवाली हैं। उनमें |


* प्रकारान्तरसे इन अग्नियोंका बहुत कुछ उल्लेख अ० ५१ में भी हो चुका है। यहाँ १२६-२८तकके तीन अध्यायोंमें ग्रहोंके स्वरूप तथा उनके रथ, आयुध आदिका परिचय बहुत सुन्दर रूपमें कराया गया है। पहले ९४वें अध्यायमें भी इन ग्रहोंका स्वरूपनिरूपण हुआ है।

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