मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
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४५० * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| चन्दनाश्चैव मेध्याश्च केतनाश्चेतनास्तथा ॥ १९<br>अमृता जीवनाः सर्वा रश्मयो वृष्टिसर्जनाः ।<br>हिमोद्भवाश्च ताभ्योऽन्या रश्मयस्त्रिंशतः स्मृताः ।<br>चन्द्रताराग्रहैः सर्वैः पीता भानोर्गभस्तयः ॥ २०<br>एता मध्यास्तथान्याश्च ह्रादिन्यो हिमसर्जनाः ।<br>शुक्लाश्च ककुभश्चैव गावो विश्वभृतश्च याः ॥ २१<br>शुक्लास्ता नामतः सर्वास्त्रिंशत्या घर्मसर्जनाः ।<br>सम्बिभ्रति हि ताः सर्वा मनुष्यान् देवताः पितॄन् ॥ २२<br>मनुष्यानौषधीभिश्च स्वधया च पितॄनपि ।<br>अमृतेन सुरान् सर्वान् सततं परितर्पयन् ॥ २३<br>वसन्ते चैव ग्रीष्मे च शनैः संतपते त्रिभिः ।<br>वर्षासु च शरद्येवं चतुर्भिः सम्प्रवर्षति ॥ २४<br>हेमन्ते शिशिरे चैव हिमोत्सर्गस्त्रिभिः पुनः ।<br>औषधीषु बलं धत्ते सुधां च स्वधया पुनः ॥ २५<br>सूर्योऽमरत्वममृते त्रयस्त्रिषु नियच्छति ।<br>एवं रश्मिसहस्रं तु सौरं लोकर्थिसार्थकम् ॥ २६<br>भिद्यते ऋतुमासाद्य जलशीतोष्णनिःस्रवम् ।<br>इत्येवं मण्डलं शुक्लं भास्वरं लोकसंज्ञितम् ॥ २७<br>नक्षत्रग्रहसोमानां प्रतिष्ठा योनिरैव च ।<br>ऋक्षचन्द्रग्रहाः सर्वे विज्ञेयाः सूर्यसम्भवाः ॥ २८ | चन्दना, मेध्या, केतना, चेतना, अमृता और जीवना—ये सभी किरणें विशेषरूपसे वृष्टि करनेवाली हैं। सूर्यकी तीन सौ किरणें हिमसे उत्पन्न हुई कही जाती हैं। उन्हें चन्द्रमा, तारा और सभी ग्रह पीते रहते हैं। ये मध्य नाड़ियाँ कहलाती हैं। इनके अतिरिक्त अन्य ह्रादिनी आदि नाड़ियाँ हिमकी सृष्टि करनेवाली हैं। शुक्ला, ककुभ, गौ और विश्वभृत् नामकी जो नाड़ियाँ हैं, वे सभी शुक्ला नामसे कही जाती हैं। इनकी भी संख्या तीन सौ हैं। ये धूपको उत्पन्न करनेवाली हैं। वे सभी मनुष्यों, देवताओं और पितरोंका भरण-पोषण करती हैं। ये किरणें ओषधियों (एवं अन्नों) द्वारा सभी मनुष्योंको, स्वधाद्वारा पितरोंको और अमृतके माध्यमसे देवताओंको सदा तृप्त करती रहती हैं। सूर्य वसन्त और ग्रीष्म-ऋतुमें शनैः-शनैः अपनी तीन सौ किरणोंसे ताप उत्पन्न करते हैं। इसी प्रकार वर्षा और शरद्-ऋतुमें चार सौ किरणोंके माध्यमसे वर्षा करते हैं। पुनः हेमन्त और शिशिर-ऋतुमें तीन सौ किरणोंद्वारा बर्फ गिराते हैं। यही सूर्य ओषधियोंमें बल, स्वधामें सुधा और अमृतमें अमरत्वका आधान करते हैं अर्थात् तीनों पदार्थोंमें तीन तरहके गुण उत्पन्न करते हैं। इस प्रकार सूर्यकी ये हजारों किरणें लोगोंका प्रयोजन सिद्ध करनेवाली हैं। ऋतुओंके क्रमानुसार जलकी शीतलता और उष्णतामें परिवर्तन होता रहता है। इस प्रकार उदीप्त एवं श्वेत वर्णवाला वह लोकसंज्ञक मण्डल नक्षत्र, ग्रह और सोमकी प्रतिष्ठा एवं योनि है। इन सभी चन्द्र, नक्षत्र और ग्रहोंको सूर्यसे उत्पन्न हुआ जानना चाहिये॥ १९—२८॥ |
| सुषुम्ना सूर्यरश्मिर्या क्षीणं शशिनमेधते ।<br>हरिकेशः पुरस्तात्तु यो वै नक्षत्रयोनिकृत् ॥ २९<br>दक्षिणे विश्वकर्मा तु रश्मिराप्याययद् बुधम् ।<br>विश्वावसुश्च यः पश्चाच्छुक्रयोनिश्च स स्मृतः ॥ ३०<br>संवर्धनस्तु यो रश्मिः स योनिर्लोहितस्य च ।<br>षष्ठस्तु ह्याश्वभू रश्मिर्योनिः सा हि बृहस्पतेः ॥ ३१<br>शनैश्चरं पुनश्चापि रश्मिराप्यायते सुराट् ।<br>न क्षीयन्ते यतस्तानि तस्मान्नक्षत्रता स्मृता ॥ ३२<br>क्षेत्राण्येतानि वै सूर्यमापतन्ति गभस्तिभिः ।<br>क्षेत्राणि तेषामादत्ते सूर्यो नक्षत्रता ततः ॥ ३३ | सूर्यकी जो सुषुम्ना नामकी किरण है, वह क्षीण हुए चन्द्रमाको पुनः बढ़ाती है। पूर्वदिशामें जो हरिकेश नामकी किरण है, वह नक्षत्रोंकी जननी है। दक्षिण दिशामें स्थित विश्वकर्मा नामकी किरण बुधको तृप्त करती है। पश्चिम दिशामें जो विश्वावसु नामक किरण है, उसे शुक्रकी योनि (उत्पत्तिस्थान) कहा जाता है। जो संवर्धन किरण है, वह लोहित (मंगल)-की योनि है। छठी किरणको अश्वभू कहते हैं, वह बृहस्पतिकी योनि है। पुनः सुराट् नामक किरण शनैश्चरकी वृद्धि करती है। चूँकि ये (चन्द्र, नक्षत्र और ग्रह) कभी नष्ट नहीं होते, इसीलिये इनकी नक्षत्रता मानी गयी है। उपर्युक्त नक्षत्रोंके क्षेत्र सूर्यपर आकर गिरते हैं और सूर्य अपनी किरणोंद्वारा उन क्षेत्रोंको ग्रहण करते हैं, इसीसे उनकी नक्षत्रता सिद्ध होती |