मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय १२८ * | ४५१ |
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| अस्माल्लोकादमुं लोकं तीर्णानां सुकृतात्मनाम्।<br>तारणात्तारका ह्येताः शुक्लत्वाच्चैव शुक्लिकाः॥ ३४<br><br>दिव्यानां पार्थिवानां च वंशानां चैव सर्वशः।<br>तपनस्तेजसो योगादादित्य इति गद्यते॥ ३५<br><br>सुवतिः स्पन्दनार्थे च धातुरेष निगद्यते।<br>सवनात्तेजसोऽपां च तेनासौ सविता स्मृतः॥ ३६<br><br>बह्वर्थश्चन्द्र इत्येष ह्लादने धातुरुच्यते।<br>शुक्लत्वे ह्यमृतत्वे च शीतत्वेऽपि विमान्यते॥ ३७ | है। इस लोकसे परलोकमें जानेवाले पुण्यात्माओंका उद्धार करनेके कारण ये किरणें तारका नामसे प्रसिद्ध हैं तथा शुक्ल-वर्णकी होनेके कारण शुक्ला भी कही जाती हैं। दिव्य (स्वर्गीय) एवं पार्थिव (भौमिक) सभी प्रकारके वंशोंके तेजके संयोगसे सम्पन्न होनेके कारण सूर्यको 'तपन' कहा जाता है। 'सवति (सूते) अर्थात् 'सु' धातु 'उत्पत्ति अथवा चेतनाभाव' के अर्थमें प्रयुक्त होती है। * इसलिये (भूमि-) जल-तेजके उत्पादक होनेके कारण सूर्य सविता कहलाते हैं। इसी प्रकार 'चदि आह्लादने' यह बह्वर्थक धातु आह्लादित करनेके अर्थमें भी प्रयुक्त होती है। इसका शुक्लत्व, अमृतत्व और शीतत्व आदि अन्य अनेकों अर्थोंमें प्रयोग किया जाता है। (इसी धातुसे चन्द्र या चन्द्रमा शब्द निष्पन्न हुआ है।)॥ २९-३७॥ | | सूर्याचन्द्रमसोर्दिव्ये मण्डले भास्वरे खगे।<br>जलतेजोमये शुक्ले वृत्तकुम्भनिभे शुभे॥ ३८<br>वसन्ति कर्मदेवास्तु स्थानान्येतानि सर्वशः।<br>मन्वन्तरेषु सर्वेषु ऋषिसूर्यग्रहादयः॥ ३९<br>तानि देवगृहाणि स्युः स्थानाख्यानि भवन्ति हि।<br>सौरं सूर्योऽविशत्स्थानं सौम्यं सोमस्तथैव च॥ ४०<br>शौक्रं शुक्लोऽविशत्स्थानं षोडशारं प्रभास्वरम्।<br>बृहस्पतिर्बृहत्त्वं च लोहितं चापि लोहितः॥ ४१<br>शनैश्चरोऽविशत् स्थानमेवं शानैश्वरं तथा।<br>बुधोऽपि वै बुधस्थानं भानुं स्वर्भानुरेव च॥ ४२<br>नक्षत्राणि च सर्वाणि नाक्षत्राण्याविशन्ति च।<br>ज्योतींषि सुकृतामेते ज्ञेया देवगृहास्तु वै॥ ४३<br>स्थानान्येतानि तिष्ठन्ति यावदाभूतसम्प्लवम्।<br>मन्वन्तरेषु सर्वेषु देवस्थानानि तानि वै॥ ४४<br>अभिमाने न तिष्ठन्ति तानि देवाः पुनः पुनः।<br>अतीतास्तु सहातीतैर्भाव्या भव्यैः सुरैः सह॥ ४५<br>वर्तन्ते वर्तमानैश्च सुरैः सार्धं तु स्थानिनः। | सूर्य और चन्द्रमाके दिव्य मण्डल गगनतलमें उद्भासित होते हैं। वे सुन्दर श्वेत रंगवाले, जल और तेजसे सम्पन्न एवं कुम्भ-सदृश गोलाकार हैं। उनमें सभी मन्वन्तरोंके ऋषि एवं सूर्यादि ग्रह कर्मदेवताके रूपसे निवास करते हैं। ये ही उनके स्थान हैं, इसीसे उन्हें देव-गृह कहा जाता है। वे देव-गृह उन्हीं देवोंके नामसे प्रसिद्ध होते हैं। सूर्य सौर नामक स्थानमें तथा चन्द्रमा सौम्य स्थानमें प्रवेश करते हैं। शुक्र शौक्र स्थानमें प्रवेश करते हैं, जो सोलह अरोंसे युक्त और अत्यन्त कान्तिमान् है। इसी प्रकार बृहस्पति बृहत्त्व स्थानमें, मंगल लोहित स्थानमें, शनैश्चर शानैश्वर स्थानमें, बुध बुधस्थानमें और राहु भानुस्थानमें प्रवेश करते हैं। सभी नक्षत्र नाक्षत्र स्थानमें प्रवेश करते हैं। इस प्रकार इन सभी ज्योतियोंको उन पुण्यात्माओंके देव-गृह जानने चाहिये। ये सभी स्थान प्रलयपर्यन्त स्थित रहते हैं। सभी मन्वन्तरोंमें वे ही देवस्थान होते हैं। सभी देवता पुनः-पुनः उन्हीं अपने-अपने स्थानोंमें निवास करते हैं। अतीतकालीन स्थानीय देवता अतीतोंके साथ, भविष्यत्कालीन स्थानीय देवता भावी देवताओंके साथ और वर्तमानकालीन स्थानीय देवता वर्तमान देवताओंके साथ वर्तमान रहते हैं॥ ३८-४५ ½॥ | | सूर्यो देवो विवस्वांश्च अष्टमस्त्वदितेः सुतः॥ ४६<br><br>द्युतिमान् धर्मयुक्तश्च सोमो देवो वसुः स्मृतः।<br>शुक्रो दैत्यस्तु विज्ञेयो भार्गवोऽसुरयाजकः॥ ४७ | अदितिके आठवें पुत्र विवस्वान् सूर्य देवता माने गये हैं। प्रभाशाली एवं धर्मात्मा चन्द्रदेव वसु कहे गये हैं। भृगुनन्दन शुक्रको, जो असुरोंके पुरोहित हैं, कर्मानुसार दैत्य समझना चाहिये। |
* निरुक्त, अमरटीका, धातुवृत्ति, उणादिकोश आदिके अनुसार भी 'षूङ् प्राणि-प्रसवे' धातुसे 'सविता' शब्द बनता है, जिसका अर्थ है-जगत्को उत्पन्न करनेवाला।