मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५२ * मत्स्यपुराण *
| बृहस्पतिर्बृहत्तेजा देवाचार्योऽङ्गिरःसुतः।<br>बुधो मनोहरश्चैव शशिपुत्रस्तु स स्मृतः॥ ४८<br>शनैश्चरो विरूपश्च संज्ञापुत्रो विवस्वतः।<br>अग्निर्विकेश्यां जज्ञे तु युवासौ लोहिताधिपः॥ ४९<br>नक्षत्रनाम्यः क्षेत्रेषु दाक्षायण्याः सुताः स्मृताः।<br>स्वर्भानुः सिंहिकापुत्रो भूतसंतापनोऽसुरः॥ ५०<br>चन्द्रार्कग्रहनक्षत्रेष्वभिमानी प्रकीर्तितः।<br>स्थानान्येतानि चोक्तानि स्थानिन्यश्चैव देवताः॥ ५१<br>शुक्लमग्निसमं दिव्यं सहस्रांशोर्विवस्वतः।<br>सहस्रांशुत्विषः स्थानमम्मयं तैजसं तथा॥ ५२<br>आप्यस्थानं मनोज्ञस्य रविरश्मिगृहे स्थितम्।<br>शुक्रः षोडशरश्मिस्तु यस्तु देवो ह्यपोमयः॥ ५३<br>लोहितो नवरश्मिस्तु स्थानमाप्यं तु तस्य वै।<br>बृहद्द्वादशरश्मीकं हरिद्राभं तु वेधसः॥ ५४<br>अष्टरश्मिः शनेस्तत्तु कृष्णं वृद्धमयस्मयम्।<br>स्वर्भानोस्तत्त्वायसं स्थानं भूतसंतापनालयम्॥ ५५<br>सुकृतामाश्रयास्तारा रश्मयस्तु हिरण्मयाः।<br>तारणात्तारकाः प्रोक्ताः शुक्लत्वाच्चैव तारकाः॥ ५६<br>नवयोजनसाहस्रो विष्कम्भः सवितुः स्मृतः।<br>मण्डलं त्रिगुणं चास्य विस्तारो भास्करस्य तु॥ ५७<br>द्विगुणः सूर्यविस्ताराद् विस्तारः शशिनः स्मृतः।<br>त्रिगुणं मण्डलं चास्य वैपुल्याच्छशिनः स्मृतम्॥ ५८<br>सर्वोपरि निसृष्टानि मण्डलानि तु तारकाः।<br>योजनार्धप्रमाणानि ताभ्योऽन्यानि गणानि तु॥ ५९<br>तुल्यो भूत्वा तु स्वर्भानुस्तदधस्तात् प्रसर्पति।<br>उद्धृत्य पार्थिवीं छायां निर्मितां मण्डलाकृतिम्॥ ६०<br>ब्रह्मणा निर्मितं स्थानं तृतीयं तु तमोमयम्।<br>आदित्यात् स तु निष्क्रम्य सोमं गच्छति पर्वसु॥ ६१<br>आदित्यमेति सोमाच्च पुनः सौरेषु पर्वसु।<br>स्वभासा तुदते यस्मात्स्वर्भानुरिति स स्मृतः॥ ६२ | महर्षि अङ्गिराके पुत्र परम तेजस्वी बृहस्पति देवोंके आचार्य हैं। मनोहर रूपवाले बुध चन्द्रमाके पुत्र हैं। शनैश्चर कुरूप कहे गये हैं। ये सूर्यके संयोगसे उत्पन्न हुए संज्ञाके पुत्र हैं। लाल रंगके अधिपति मंगल नवयुवक (माने गये) हैं। स्वयं अग्निदेव ही रूपमें विकेशी (भूमि) के* गर्भसे उत्पन्न हुए थे। नक्षत्र नामवाली सत्ताईस नक्षत्राभिमानी देवियाँ दाक्षायणीकी कन्या मानी गयी हैं। राहु सिंहिकाका पुत्र है। यह सभी प्राणियोंको कष्ट देनेवाला राक्षस है। इस प्रकार सूर्य, चन्द्र, ग्रह और नक्षत्रोंके अभिमानी देवताओंका वर्णन किया गया। साथ ही उनके स्थान तथा स्थानी देवता भी बतलाये गये। सहस्र किरणधारी सूर्यका स्थान दिव्य, श्वेत वर्णवाला तथा अग्निके समान तेजस्वी है। चन्द्रमाका स्थान तैजस एवं जलमय है। बुधका स्थान जलमय है और वह सूर्यकी किरणरूपी गृहमें स्थित है। शुक्रदेवका स्थान सोलह किरणोंसे युक्त एवं जलमय है। मंगल नौ किरणोंसे युक्त हैं, उनका स्थान जलमय है। बृहस्पतिका स्थान बारह किरणोंसे युक्त है और उसकी कान्ति हल्दीके समान पीली है। शनैश्चरका स्थान आठ किरणोंसे युक्त, प्राचीन, लौहमय एवं काले रंगका है। राहुका स्थान लोहेका बना है, वह प्राणियोंको कष्ट देनेवाला है। ताराएँ सुकृतीजनोंका आश्रय स्थान हैं। इनकी किरणें स्वर्णमयी हैं। जीवोंका निस्तार करनेके कारण ये तारका कहलाती हैं और शुक्लवर्ण होनेके कारण इनका शुक्ला भी नाम है॥ ४६–५६॥<br><br>सूर्यके व्यासका विस्तार नौ हजार योजन है और इनका सम्पूर्ण मण्डल इस (व्यास) से तिगुना अर्थात् सत्ताईस हजार योजन है। चन्द्रमाका विस्तार सूर्यके विस्तारसे दुगुना बतलाया जाता है। चन्द्रमाका सम्पूर्ण मण्डल विपुलतामें सूर्य-मण्डलसे तिगुना है। सबके ऊपर तारकाओंके मण्डल हैं। उनका विस्तार आधे योजनका बतलाया जाता है। उनसे नीचे अन्य गणोंके स्थान हैं। राहु उनकी तुलनामें समान होते हुए भी उनके नीचेसे भ्रमण करता है। ब्रह्माद्वारा निर्मित वह तीसरा स्थान तमोमय है। उसे पृथिवीकी छायाको ऊपर उठाकर मण्डलाकार बनाया गया है। राहु पूर्णिमा आदि पर्वोंमें सूर्यमण्डलसे निकलकर चन्द्रमण्डलमें चला जाता है और सूर्य-सम्बन्धी अमावास्या आदि पर्वोंमें पुनः चन्द्रमण्डलसे निकलकर सूर्यमण्डलमें चला आता है। वह अपनी कान्तिसे प्राणियोंको कष्ट पहुँचाता है, इसीलिये उसे स्वर्भानु कहते हैं। |
* सभी पुराणों तथा मूर्त्यष्टक शिवव्याख्यानोंमें विकेशीको भूमि कहा गया है। उनके पुत्र होनेसे ही मङ्गलको भौम कहा जाता है।