मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय १२८ * | ४५३ |
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| चन्द्रतः षोडशो भागो भार्गवस्य विधीयते।<br>विष्कम्भान्मण्डलाच्चैव योजनानां तु स स्मृतः॥ ६३<br>भार्गवात्पादहीनश्च विज्ञेयो वै बृहस्पतिः।<br>बृहस्पतेः पादहीनौ कुजसौरौवुभौ स्मृतौ॥ ६४<br>विस्तारमण्डलाभ्यां तु पादहीनस्तयोर्बुधः।<br>तारानक्षत्ररूपाणि वपुष्मन्तीह यानि वै॥ ६५<br>बुधेन समरूपाणि विस्तारान्मण्डलात्तु वै।<br>तारानक्षत्ररूपाणि हीनानि तु परस्परम्॥ ६६ | व्यास और बाह्यवृत्त—दोनोंके योजन-परिमाणमें शुक्रका परिमाण चन्द्रमाके सोलहवें भागके बराबर बतलाया जाता है। बृहस्पतिका परिमाण शुक्रके परिमाणसे एक चतुर्थांश कम जानना चाहिये। शनि और मंगल—ये दोनों प्रमाणमें बृहस्पतिसे चतुर्थांश कम बतलाये गये हैं। बुध इन दोनों ग्रहोंसे विस्तार और मण्डलमें चौथाई कम हैं। आकाशमण्डलमें तारा, नक्षत्र आदि जितने शरीरधारी हैं, वे सभी विस्तार और मण्डलके हिसाबसे बुधके समकक्ष हैं। तारा और नक्षत्र परस्पर एक-दूसरेसे कम हैं॥५७—६६॥ |
| शतानि पञ्च चत्वारि त्रीणि द्वे चैकमेव च।<br>सर्वोपरि विसृष्टानि मण्डलानि तु तारकाः॥ ६७<br>योजनार्धप्रमाणानि तेभ्यो ह्रस्वं न विद्यते।<br>उपरिष्टात्तु ये तेषां ग्रहा ये क्रूरसात्त्विकाः॥ ६८<br>सौरश्चाङ्गिरसो वक्रो विज्ञेया मन्दचारिणः।<br>तेभ्योऽधस्तात्तु चत्वारः पुनश्चान्ये महाग्रहाः॥ ६९<br>सोमः सूर्यो बुधश्चैव भार्गवश्चेति शीघ्रगाः।<br>यावन्ति चैव ऋक्षाणि कोट्यस्तावन्ति तारकाः॥ ७०<br>सर्वेषां तु ग्रहाणां वै सूर्योऽधस्तात् प्रसर्पति।<br>विस्तीर्णं मण्डलं कृत्वा तस्योर्ध्वं चरते शशी॥ ७१<br>नक्षत्रमण्डलं चापि सोमादूर्ध्वं प्रसर्पति।<br>नक्षत्रेभ्यो बुधश्चोर्ध्वं बुधाच्चोर्ध्वं तु भार्गवः॥ ७२<br>वक्रस्तु भार्गवादूर्ध्वं वक्रादूर्ध्वं बृहस्पतिः।<br>तस्माच्छनैश्चरश्चोर्ध्वं देवाचार्योपरि स्थितः॥ ७३<br>शनैश्चरात्तथा चोर्ध्वं ज्ञेयं सप्तर्षिमण्डलम्।<br>सप्तर्षिभ्यो ध्रुवश्चोर्ध्वं समस्तं त्रिदिवं ध्रुवे॥ ७४<br>द्विगुणेषु सहस्रेषु योजनानां शतेषु च।<br>ग्रहान्तरमथैकैकमूर्ध्वं नक्षत्रमण्डलात्॥ ७५<br>ताराग्रहान्तराणि स्युरुपर्युपर्यधिष्ठितम्।<br>ग्रहाश्च चन्द्रसूर्यौ च दिवि दिव्येन तेजसा॥ ७६<br>नक्षत्रेषु च युज्यन्ते गच्छन्तो नियतक्रमात्। | इस प्रकार उन सभी ज्योतिर्गणोंका मण्डल पाँच, चार, तीन, दो अथवा एक योजनमें विस्तृत है। तारकाओंके मण्डल सबसे ऊपर हैं। उनका प्रमाण आधा योजन है। इनसे कम विस्तारवाला अन्य कोई नहीं है। इनके ऊपर जो क्रूर और सात्त्विक ग्रह स्थित हैं, उन्हें शनैश्चर, बृहस्पति और मंगल समझना चाहिये। ये सभी मन्द गतिवाले हैं। इनके नीचे चन्द्र, सूर्य, बुध और शुक्र—ये चार अन्य महान् ग्रह विचरण करते हैं। ये सभी शीघ्रगामी हैं। जितने नक्षत्र हैं, उतने ही करोड़ तारकाएँ हैं। सूर्य सभी ग्रहोंके निचले भागमें गमन करते हैं। सूर्यके उपरी भागमें चन्द्रमा अपने मण्डलको विस्तृत करके चलते हैं। नक्षत्रमण्डल चन्द्रमासे ऊपर भ्रमण करता है। इसी प्रकार नक्षत्रोंसे ऊपर बुध, बुधसे ऊपर शुक्र, शुक्रसे ऊपर मंगल, मंगलसे ऊपर बृहस्पति और देवाचार्य बृहस्पतिके ऊपर शनैश्चर स्थित हैं। शनैश्चरसे ऊपर सप्तर्षि-मण्डलको जानना चाहिये। सप्तर्षियोंसे ऊपर ध्रुव हैं और ध्रुवसे ऊपर सारा आकाशमण्डल है। नक्षत्रमण्डलसे ऊपर प्रत्येक ग्रह दो लाख योजनोंके अन्तरपर स्थित है। ताराओं और ग्रहोंके अन्तर परस्पर एक-दूसरेके ऊपर स्थित हैं। आकाशमण्डलमें सूर्य, चन्द्रमा और ग्रहगण दिव्य तेजसे युक्त हो निश्चित क्रमानुसार चलते हुए नक्षत्रोंसे मिलते हैं॥ ६७—७६ १/२ ॥ |
| चन्द्रार्कग्रहनक्षत्रा नीचोच्चगृहमाश्रिताः॥ ७७<br>समागमे च भेदे च पश्यन्ति युगपत्प्रजाः।<br>परस्परं स्थिता ह्येवं युज्यन्ते च परस्परम्॥ ७८ | चन्द्रमा, सूर्य, ग्रह और नक्षत्र अपने-अपने नीचे-ऊँचे गृहोंमें स्थित होते हैं। इसी क्रमसे इनका समागम और वियोग भी होता है। उस अवसरपर सभी प्राणी इन्हें एक साथ देखते हैं। इस प्रकार स्थित रहकर ये |