भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 464, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 464

४५४ * मत्स्यपुराण *

| असंकरेण विज्ञेयस्तेषां योगस्तु वै बुधैः।<br>इत्येवं संनिवेशो वै पृथिव्या ज्योतिषां च यः॥ ७९<br>द्वीपानामुदधीनां च पर्वतानां तथैव च।<br>वर्षाणां च नदीनां च ये च तेषु वसन्ति वै॥ ८०<br>इत्येषोऽर्कवशेनैव संनिवेशस्तु ज्योतिषाम्।<br>आवर्तः सान्तरो मध्ये संक्षिप्तश्च ध्रुवात्तु सः॥ ८१<br>सर्वतस्तेषु विस्तीर्णो वृत्ताकार इवोच्छ्रितः।<br>लोकसंव्यवहारार्थमीश्वरेण विनिर्मितः॥ ८२<br>कल्पादौ बुद्धिपूर्वं तु स्थापितोऽसौ स्वयम्भुवा।<br>इत्येष संनिवेशो वै सर्वस्य ज्योतिरात्मकः॥ ८३<br>विश्वरूपं प्रधानस्य परिणामोऽस्य यः स्मृतः।<br>तेषां शक्यं न संख्यातुं याथातथ्येन केनचित्।<br>गतागतं मनुष्येण ज्योतिषां मांसचक्षुषा॥ ८४ | परस्पर संयुक्त होते हैं। विद्वान्लोग इनके इस सम्बन्धको अमिश्रित ही मानते हैं। इसी प्रकार पृथ्वी, ज्योतिर्गणों, द्वीप, समुद्र, पर्वत, वर्ष, नदी तथा उनमें निवास करनेवाले प्राणियोंकी स्थिति है। ज्योतिर्गणोंका यह स्थितिक्रम सूर्यके कारण ही है। (मण्डलाकार घूमते समय) उन गणोंके मध्यमें आवर्त-सा दीख पड़ता है। वह बीचमें ध्रुवके आ जानेसे संक्षिप्त हो जाता है। वह चारों ओर ऊँचाईपर गोलाकार फैला रहता है। परमेश्वरने लोकोंकी प्रयोजन-सिद्धिके लिये उसे बनाया है। ब्रह्माने कल्पके आदिमें बहुत सोच-विचारकर इसे स्थापित किया है। इस प्रकार यह सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डलकी स्थिति है। प्रधान (प्रकृति)-का यह विश्वरूप परिणाम अत्यन्त अद्भुत है। कोई भी इसकी यथार्थ गणना नहीं कर सकता। मनुष्य अपने चर्मचक्षुओंसे इन ज्योतिर्गणोंके गमनागमनको नहीं देख सकता॥ ७७—८४॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे देवगृहवर्णनं नामाष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १२८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णन-प्रसङ्गमें देवगृहवर्णन नामक एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १२८॥


एक सौ उन्तीसवाँ अध्याय

त्रिपुर-निर्माणका वर्णन

ऋषय ऊचुः
कथं जगाम भगवान् पुरारित्वं महेश्वरः।<br>ददाह च कथं देवस्तन्नो विस्तरतो वद॥ १<br>पृच्छामस्त्वां वयं सर्वे बहुमानात् पुनः पुनः।<br>त्रिपुरं तद् यथा दुर्गं मयमायाविनिर्मितम्।<br>देवेनैकेषुणा दग्धं तथा नो वद मानद॥ २ऋषियोंने पूछा— सबको मान देनेवाले सूतजी! भगवान् महेश्वर पुरारि (त्रिपुरके शत्रु) किस कारण हो गये तथा उन देवाधिदेवने उसे कैसे दग्ध किया? यह आप हमलोगोंको विस्तारपूर्वक बतलाइये। हम सब लोग परम सम्मानपूर्वक आपसे बारंबार पूछ रहे हैं कि मयदानवकी मायाद्वारा विनिर्मित उस त्रिपुर दुर्गको भगवान् शंकरने एक ही बाणसे जिस प्रकार जला दिया था, हमलोगोंसे उस प्रसङ्गका विस्तारसे वर्णन कीजिये॥ १-२॥