भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

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पृष्ठ 465
* अध्याय १२९ *४५५

| सूत उवाच | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! भगवान् शंकरने जिस प्रकार त्रिपुरको विदीर्ण किया था (उसका वर्णन कर रहा हूँ), सुनिये। मय नामक एक महान् मायावी असुर था। वह विभिन्न प्रकारकी मायाओंका उत्पादक था। वह संग्राममें देवताओंद्वारा पराजित हो गया था, इसलिये घोर तपस्यामें संलग्न हो गया। द्विजवरो! उसे तपस्या करते देख दो अन्य दैत्य भी अनुग्रहवश उसीके कार्यके उद्देश्यसे उग्र तपस्यामें जुट गये। उनमें एक महाबली विद्युन्माली और दूसरा महापराक्रमी तारक था। ये दोनों मयके तेजसे आकृष्ट होकर उसीके पार्श्वभागमें बैठकर तपस्या कर रहे थे। उस समय तपस्यासे उद्भासित होते हुए वे तीनों ऐसा प्रतीत हो रहे थे, मानो लौकिक रूपमें मूर्तिमान् तीनों अग्नियाँ हों। वे तीनों दानव त्रिलोकीको संतप्त करते हुए तपस्यामें संलग्न थे। वे हेमन्त-ऋतुमें जलमें शयन करते, ग्रीष्म-ऋतुमें पञ्चाग्नि तापते और वर्षा-ऋतुमें आकाशके नीचे खुले मैदानमें खड़े रहते थे। इस प्रकार वे सबको परम प्रिय लगनेवाले अपने शरीरको सुखा रहे थे और मात्र फल, मूल, फूल और जलके आहारपर जीवन व्यतीत कर रहे थे अथवा वे कभी-कभी निराहार भी रह जाते थे। उनके वल्कलोंपर कीचड़ जम गया था और वे स्वयं विमल देहधारी होकर भी गंदे सेवारके कीचड़ोंमें निमग्न रहते थे। इस कारण उनके शरीरका मांस गल गया था। वे इतने दुर्बल हो गये थे कि उनके शरीरकी नसें बाहर उभड़ आयी थीं। उनकी तपस्याके प्रभावसे सारा जगत् निष्प्रभ हो गया—काँप उठा। सर्वत्र उदासी छा गयी। सभीके स्वर मन्द पड़ गये। इस प्रकार उन तीनों दानवरूपी अग्नियोंसे त्रिलोकीको जलते देखकर जगद्बन्धु पितामह ब्रह्मा उनके समक्ष प्रकट हुए॥ ३—११ १/२॥<br><br>तब वे दैत्य अपने पितामहको सहसा सम्मुख उपस्थित देखकर अत्यन्त साहस करके बोले और उनकी स्तुति करने लगे। उस समय ब्रह्माके नेत्र और मुख हर्षसे खिल उठे थे। तब उन्होंने तपस्याके प्रभावसे सूर्यके समान प्रभावशाली उन दानवोंसे | | शृणुध्वं त्रिपुरं* देवो यथा दारितवान् भवः।<br>मयो नाम महामायो मायानां जनकोऽसुरः॥ ३<br>निर्जितः स तु संग्रामे तताप परमं तपः।<br>तपस्यन्तं तु तं विप्रा दैत्यावन्यावनुग्रहात्॥ ४<br>तस्यैव कृत्यमुद्दिश्य तेपतुः परमं तपः।<br>विद्युन्माली च बलवांस्तारकाख्यश्च वीर्यवान्॥ ५<br>मयतेजःसमाक्रान्तौ तेपतुर्मयपार्श्वगौ।<br>लोका इव यथा मूर्तास्त्रयस्त्रय इवाग्नयः॥ ६<br>लोकत्रयं तापयन्तस्ते तेपुर्दानवास्तपः।<br>हेमन्ते जलशय्यासु ग्रीष्मे पञ्चतपे तथा॥ ७<br>वर्षासु च तथाऽऽकाशे क्षपयन्तस्तनूः प्रियाः।<br>सेवानाः फलमूलानि पुष्पाणि च जलानि च॥ ८<br>अन्यथाचरिताहाराः पङ्केनाचितवल्कलाः।<br>मग्नाः शैवालपङ्केषु विमलाविमलेषु च॥ ९<br>निर्मांसाश्च ततो जाताः कृशा धमनिसंतताः।<br>तेषां तपःप्रभावेण प्रभावविधुतं यथा॥ १०<br>निष्प्रभं तु जगत् सर्वं मन्दमेवाभिभाषितम्।<br>दह्यमानेषु लोकेषु तैस्त्रिभिर्दानवाग्निभिः॥ ११<br>तेषामग्रे जगद्बन्धुः प्रादुर्भूतः पितामहः।<br>ततः साहसकर्तारः प्राहुस्ते सहसागतम्॥ १२<br>स्वकं पितामहं दैत्यास्तं वै तुष्टुवुरेव च।<br>अथ तान् दानवान् ब्रह्मा तपसा तपनप्रभान्॥ १३ | |


* यह महत्त्वपूर्ण प्रसङ्ग बहुत कुछ स्कन्द ५। ४३, शिव, सौरपु० २९-३० लिङ्गपु० ७३-४, आदि पुराणोंसे मिलता है। वैसे यह अपेक्षाकृत सर्वाधिक विस्तृत है तथा आगेके नर्मदा-माहात्म्यमें इसी ग्रन्थमें पुनः आया है। इसका बीज तै० सं० ६। ३। २। १, शतप० ६। ३। ३। २५ आदिमें प्राप्त होता है और पुष्पदन्तने भी 'शिवमहिम्नःस्तव' १८-१९ आदिके 'रथः क्षोणी यन्ता'.....'त्रिपुरतृण', 'त्रिपुरहर' आदिमें इसकी खूब उत्प्रेक्षा की है।