मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ४५६ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| उवाच हर्षपूर्णाक्षो हर्षपूर्णमुखस्तदा।<br>वरदोऽहं हि वो वत्सास्तपस्तोषित आगतः॥ १४<br>व्रियतामीप्सितं यच्च साभिलाषं तदुच्यताम्।<br>इत्येवमुच्यमानं तु प्रतिपन्नं पितामहम्॥ १५<br>विश्वकर्मा मयः प्राह प्रहर्षोत्फुल्ललोचनः।<br>देव दैत्याः पुरा देवैः संग्रामे तारकामये॥ १६<br>निर्जितास्ताडिताश्चैव हताश्चाप्यायुधैरपि।<br>देववैरानुबन्धाच्च धावन्तो भयवेपिताः॥ १७<br>शरणं नैव जानीमः शर्म वा शरणार्थिनः।<br>सोऽहं तपःप्रभावेण तव भक्त्या तथैव च॥ १८<br>इच्छामि कर्तुं तद् दुर्गं यद् देवैरपि दुस्तरम्।<br>तस्मिंश्च त्रिपुरे दुर्गे मत्कृते कृतिनां वर॥ १९<br>भूम्यग्निजलदुर्गाणां शापानां मुनितेजसाम्।<br>देवप्रहरणानां च देवानां च प्रजापते॥ २०<br>अलङ्घनीयं भवतु त्रिपुरं यदि ते प्रियम्। | कहा—'बच्चो! मैं तुमलोगोंकी तपस्यासे संतुष्ट होकर तुम्हें वर देनेके लिये आया हूँ। तुमलोगोंकी जो अभिलाषा हो, उसे कहो और अपना अभीष्ट वर माँग लो।' वर देनेके लिये उत्सुक पितामहको इस प्रकार कहते हुए देखकर असुरोंके शिल्पी मयके नेत्र अत्यन्त हर्षसे उत्फुल्ल हो उठे। तब उसने कहा—'देव! प्राचीनकालमें घटित हुए तारकामय संग्राममें देवताओंने दैत्योंको पराजित कर दिया था। उन्होंने अस्त्रोंके प्रहारसे कुछको तो मौतके घाट उतार दिया था और कुछको बुरी तरहसे घायल कर दिया था। उस समय देवताओंके साथ वैर बँध जानेके कारण हमलोग भयसे कम्पित होकर चारों दिशाओंमें भागते फिरे, परंतु हम शरणार्थियोंको यह ज्ञात न हुआ कि हमारे लिये शरणदाता कौन है तथा हमारा कल्याण कैसे होगा। इसलिये मैं अपनी तपस्याके प्रभावसे तथा आपकी भक्तिके बलपर एक ऐसे दुर्गका निर्माण करना चाहता हूँ, जिसका पार करना देवताओंके लिये भी कठिन हो। सुकृती पुरुषोंमें श्रेष्ठ पितामह! मेरे द्वारा निर्मित उस त्रिपुरमें पृथ्वी, जल एवं अग्निसे निर्मित तथा सुरक्षित दुर्गोंका और मुनियोंके प्रभावसे दिये गये शापों, देवताओंके अस्त्रों और देवोंका प्रवेश न हो सके। प्रजापते! यदि आपको अच्छा लगे तो वह त्रिपुर सभीके लिये अलङ्घनीय हो जाय॥ १२—२० $\frac{१}{२}$ ॥ |
| विश्वकर्मा इतीवोक्तः स तदा विश्वकर्मणा॥ २१<br>उवाच प्रहसन् वाक्यं मयं दैत्यगणाधिपम्।<br>सर्वामरत्वं नैवास्ति असद्वृत्तस्य दानव॥ २२<br>तस्माद् दुर्गविधानं हि तृणादपि विधीयताम्। | तब असुरोंके विश्वकर्मा (महाशिल्पी) मयद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर विश्व-स्रष्टा ब्रह्मा दैत्यगणोंके अधीश्वर मयसे हँसते हुए बोले—'दानव! (तुझ-जैसे) असदाचारीके लिये सर्वामरत्वका विधान नहीं है, अतः तुम तृणसे ही अपने दुर्गका निर्माण करो।' |
| पितामहवचः श्रुत्वा तदैव दानवो मयः॥ २३<br>प्राञ्जलिः पुनरप्याह ब्रह्माणं पद्मसंभवम्।<br>यस्तदेकेषुणा दुर्गं सकृन्मुक्तेन निर्दहेत्॥ २४<br>समं स संयुगे हन्यादवध्यं शेषतो भवेत्। | उस समय पितामहकी ऐसी बात सुनकर मयदानवने हाथ जोड़कर पुनः पद्मयोनि ब्रह्मासे कहा—'जो एक ही बारके छोड़े गये एक ही बाणसे उस दुर्गको जला दे, वही युद्धस्थलमें हम सबको मार सके, शेष प्राणियोंसे हमलोग अवध्य हो जायँ।' |
| एवमस्त्विति चाप्युक्त्वा मयं देवः पितामहः॥ २५<br>स्वप्ने लब्धो यथार्थो वै तत्रैवादर्शनं ययौ।<br>गते पितामहे दैत्या गता मयरविप्रभाः॥ २६<br>वरदानाद् विरेजुस्ते तपसा च महाबलाः।<br>स मयस्तु महाबुद्धिर्दानवो वृषसत्तमः॥ २७ | तदनन्तर मयसे 'एवमस्तु—ऐसा ही हो' कहकर भगवान् ब्रह्मा स्वप्नमें प्राप्त हुए धनकी तरह वहीं अन्तर्हित हो गये। पितामहके चले जानेपर सूर्यके समान प्रभावशाली मय आदि दानव भी अपने स्थानको चले गये। वे महाबली दानव तपस्या तथा वरदानके प्रभावसे अत्यन्त शोभित हो रहे थे। कुछ समयके बाद दानवश्रेष्ठ महाबुद्धिमान् मय- |