मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
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| * अध्याय १२९ * | ४५७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| दुर्गं व्यवसितः कर्तुमिति चाचिन्तयत् तदा।<br>कथं नाम भवेद् दुर्गं तन्मया त्रिपुरं कृतम्॥ २८<br>वत्स्यते तत्पुरं दिव्यं मत्तो नान्यैर्न संशयः।<br>यथा चैकेषुणा तेन तत्पुरं न हि हन्यते॥ २९<br>देवैस्तथा विधातव्यं मया मतिविचारणम्।<br>विस्तारो योजनशतमेकैकस्य पुरस्य तु॥ ३०<br>कार्यस्तेषां च विष्कम्भश्चैकैकशतयोजनम्।<br>पुष्ययोगेण निर्माणं पुराणां च भविष्यति॥ ३१<br>पुष्ययोगेण च दिवि समेष्यन्ति परस्परम्।<br>पुष्ययोगेण युक्तानि यस्तान्यासादयिष्यति॥ ३२<br>पुराण्येकप्रहारेण स तानि निहनिष्यति।<br>आयसं तु क्षितितले रजतं तु नभस्तले॥ ३३<br>राजतस्योपरिष्टात् तु सौवर्णं भविता पुरम्।<br>एवं त्रिभिः पुरैर्युक्तं त्रिपुरं तद् भविष्यति।<br>शतयोजनविष्कम्भैरन्तरैस्तद् दुरासदम्॥ ३४<br>अट्टालकैर्यन्त्रशतघ्निभिश्च<br>सचक्रशूलोपलकम्पन्नैश्च ।<br>द्वारैर्महामन्दरमेरुकल्पैः प्राकार-<br>शृङ्गैः सुविराजमानम्॥ ३५<br>सतारकाख्येन मयेन गुप्तं<br>स्वस्थं च गुप्तं तडिमालिनापि।<br>को नाम हन्तुं त्रिपुरं समर्थो<br>मुक्त्वा त्रिनेत्रं भगवन्तमेकम्॥ ३६ | दानव दुर्गकी रचना करनेके लिये उद्यत हो विचार करने लगा। मेरे द्वारा निर्मित होनेवाला यह त्रिपुर दुर्ग कैसा बनाया जाय, जिससे उस दिव्य पुरमें निस्संदेह मेरे अतिरिक्त अन्य कोई निवास न कर सके तथा उसके द्वारा छोड़े गये एक बाणसे यह पुर बींधा न जा सके। देवगण उसे नष्ट करनेकी चेष्टा करेंगे ही, किंतु मुझे तो अपनी बुद्धिसे विचार कर लेना चाहिये। उनमें एक-एक पुरका विस्तार सौ योजनका करना है तथा उनके विष्कम्भ (स्तम्भ या शहतीर) भी एक-एक सौ योजनके बनाने हैं॥ २९–३१½॥<br><br>इन पुरोंका निर्माण पुष्य नक्षत्रके योगमें होगा। इसी पुष्य नक्षत्रके योगमें ये तीनों पुर आकाशमण्डलमें परस्पर मिल जायँगे। जो मनुष्य पुष्य नक्षत्रके योगमें इन तीनों पुरोंको परस्पर मिला हुआ पा लेगा, वही एक बाणके प्रहारसे इन्हें नष्ट कर सकेगा। उनमेंसे एक पुर भूतलपर लौहमय, दूसरा गगनतलमें रजतमय और तीसरा रजतमय पुरसे ऊपर सुवर्णमय होगा। इस प्रकार तीनों पुरोंसे युक्त होनेके कारण वह त्रिपुर नामसे विख्यात होगा। इनके अन्तर्भागमें सौ योजन विस्तारवाले विष्कम्भ (बाधक स्तम्भ) रहेंगे, जिससे यह दूसरोंद्वारा दुष्प्राप्य होगा। वह त्रिपुर अट्टालिकाओं, एक ही बारमें सौ मनुष्योंका वध करनेवाले यन्त्रों, चक्र, त्रिशूल, उपल और ध्वजाओं, मन्दराचल और सुमेरु गिरि-सरीखे द्वारों और शिखर-सदृश परकोटोंसे सुशोभित होगा। उनमें तारक लौहमय पुरकी और मय सुवर्णमय पुरकी रक्षा करेंगे तथा आकाशस्थित रजतमय पुरकी रक्षामें विद्युन्माली नियुक्त रहेगा। ऐसी दशामें एकमात्र भगवान् शंकरको छोड़कर दूसरा कौन इस त्रिपुरका विनाश करनेमें समर्थ हो सकेगा॥ ३१–३६॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे त्रिपुरोपाख्याने एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १२९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरोपाख्यानमें एक सौ उन्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १२९॥