भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४५८ | * मत्स्यपुराण *


एक सौ तीसवाँ अध्याय

दानवश्रेष्ठ मयद्वारा त्रिपुरकी रचना

सूत उवाच**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! इस प्रकार सोच-विचारकर (महाशिल्पी) मयदानव दिव्य उपायोंके प्रभावसे बननेवाले तथा मनके संकल्पानुसार चलनेवाले त्रिपुर नामक दुर्गकी रचना करनेको उद्यत हुआ। उसने सोचा कि इस मार्गमें परकोटा बनेगा, यहाँ अथवा वहाँ गोपुर (नगरका फाटक) रहेगा, यहाँ अट्टालिकाका दरवाजा तथा यहाँ महलका मुख्य द्वार रखना उचित है। इधर विशाल राजमार्ग होना चाहिये, यहाँ दोनों ओर पगडंडियोंसे युक्त सड़कें और गलियाँ होनी चाहिये, यहाँ चबूतरा रखना ठीक है, यह स्थान अन्तःपुरके योग्य है, यहाँ शिव-मन्दिर रखना अच्छा होगा, यहाँ वट-वृक्षसहित तड़ागों, बावलियों और सरोवरोंका निर्माण उचित होगा। यहाँ बगीचे, सभाभवन और वाटिकाएँ रहेंगी तथा यहाँ दानवोंके निकलनेके लिये मनोहर मार्ग रहेगा। इस प्रकार नगर-रचनामें निपुण मयने केवल मनःसंकल्पमात्रसे उस दिव्य त्रिपुर नगरकी रचना कर डाली थी, ऐसा हमने सुना है। मयने जो काले लोहेका पुर निर्मित किया था, उसका अधिपति तारकासुर हुआ। वह उसपर अपना आधिपत्य जमाकर वहाँ निवास करने लगा। दूसरा जो पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान कान्तिमान् रजतमय पुर निर्मित हुआ, उसका स्वामी विद्युन्माली हुआ। यह विद्युत्समूहोंसे युक्त बादलकी तरह जान पड़ता था। मयद्वारा जिस तीसरे स्वर्णमय पुरकी रचना हुई, उसमें सामर्थ्यशाली मय स्वयं गया और उसका अधिपति हुआ। जिस प्रकार तारकासुरके पुरसे विद्युन्मालीका पुर सौ योजनकी दूरीपर था, उसी प्रकार विद्युन्माली और मयके पुरोंमें भी सौ योजनका अन्तर था। मयदानवका विशाल पुर मेरुपर्वतके समान दीख पड़ता था॥ १—१०½॥
इति चिन्तायुतो दैत्यो दिव्योपायप्रभावजम्।<br>चकार त्रिपुरं दुर्गं मनःसंचारचारितम्॥ १
प्राकारोऽनेन मार्गेण इह वामुत्र गोपुरम्।<br>इह चाट्टालकद्वारमिह चाट्टालगोपुरम्॥ २
राजमार्ग इतश्चापि विपुलो भवतामिति।<br>रथ्योपरथ्याः सदृशा इह चत्वर एव च॥ ३
इदमन्तःपुरस्थानं रुद्रायतनमत्र च।<br>सवटानि तडागानि ह्यत्र वाप्यः सरांसि च॥ ४
आरामाश्च सभाश्चात्र उद्यानान्यत्र वा तथा।<br>उपनिर्गमो दानवानां भवत्यत्र मनोहरः॥ ५
इत्येवं मानसं तत्राकल्पयत् पुरकल्पवित्।<br>मयेन तत्पुरं सृष्टं त्रिपुरं त्विति नः श्रुतम्॥ ६
कार्ष्णायसमयं यत्तु मयेन विहितं पुरम्।<br>तारकाख्योऽधिपस्तत्र कृतस्थानाधिपोऽवसत्॥ ७
यत्तु पूर्णेन्दुसंकाशं राजतं निर्मितं पुरम्।<br>विद्युन्माली प्रभुस्तत्र विद्युन्माली त्विवाम्बुदः॥ ८
सुवर्णाधिकृतं यच्च मयेन विहितं पुरम्।<br>स्वयमेव मयस्तत्र गतस्तदधिपः प्रभुः॥ ९
तारकस्य पुरं तत्र शतयोजनमन्तरम्।<br>विद्युन्मालिपुरं चापि शतयोजनकेऽन्तरे॥ १०