मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय १३० * | ४५९ |
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| मेरुपर्वतसंकाशं मयस्यापि पुरं महत्।<br>पुष्यसंयोगमात्रेण कालेन स मयः पुरा॥ ११<br><br>कृतवांस्त्रिपुरं दैत्यस्त्रिनेत्रः पुष्यकं यथा।<br>येन येन मयो याति प्रकुर्वाणः पुरं पुरात्॥ १२<br><br>प्रशस्तास्तत्र तत्रैव वारुण्या मालया स्वयम्।<br>रुक्मरूप्यायसानां च शतशोऽथ सहस्रशः॥ १३<br><br>रत्नाचितानि शोभन्ते पुराण्यमरविद्विषाम्।<br>प्रासादशतजुष्टानि कूटागारोत्कटानि च॥ १४<br><br>सर्वेषां कामगानि स्युः सर्वलोकातिगानि च।<br>सोद्यानवापीकूपानि सपद्मसरवन्ति च॥ १५<br><br>अशोकवनभूतानि कोकिलारुतवन्ति च।<br>चित्रशालविशालानि चतुःशालोत्तमानि च॥ १६<br><br>सप्ताष्टदशभौमानि सत्कृतानि मयेन च।<br>बहुध्वजपताकानि स्रग्दामालङ्कृतानि च॥ १७<br><br>किङ्किणीजालशब्दानि गन्धवन्ति महान्ति च।<br>सुसंयुक्तोपलिप्तानि पुष्यनैवेद्यवन्ति च॥ १८<br><br>यज्ञधूमान्धकाराणि सम्पूर्णकलशानि च।<br>गगनावरणाभानि हंसपङ्क्तिनिभानि च॥ १९<br><br>पङ्क्तीकृतानि राजन्ते गृहाणि त्रिपुरे पुरे।<br>मुक्ताकलापैर्लम्बद्भिर्हसन्तीव शशिश्रियम्॥ २० | जिस प्रकार पूर्वकालमें त्रिलोचन भगवान् शंकरने पुष्यककी रचना की थी, उसी प्रकार मयदानवने केवल पुष्यनक्षत्रके संयोगसे कालकी व्यवस्था करके त्रिपुरका निर्माण किया। पुरकी रचना करता हुआ मय जिस-जिस मार्गसे एक पुरसे दूसरे पुरमें जाता था, वहाँ-वहाँ वरुणकी दी हुई मालाद्वारा उत्पन्न चमत्कारसे सोने, चाँदी और लोहेके सैकड़ों-हजारों भवन स्वयं ही बनते जाते थे। उन देव-शत्रुओंके पुर रत्नखचित होनेके कारण विशेष शोभा पा रहे थे। वे सैकड़ों महलोंसे युक्त थे। उनमें ऊँचे-ऊँचे कूटागार (छतके ऊपरकी कोठरियाँ) बने थे। उनमें सभी लोग स्वच्छन्द विचरण करते थे। वे (सुन्दरतामें) सभी लोकोंका अतिक्रमण करनेवाले थे। उनमें उद्यान, बावली, कुआँ और कमलोंसे युक्त सरोवर शोभा पा रहे थे। उनमें अशोक वृक्षके बहुतेरे वन थे, जिनमें कोयलें कूकती रहती थीं। उनमें बड़ी-बड़ी चित्रशालाएँ और उत्तम अटारियाँ बनी थीं। मयने क्रमशः सात, आठ और दस तल्लेवाले भवनोंका बड़ी सुन्दरताके साथ निर्माण किया था। उनपर बहुसंख्यक ध्वज और पताकाएँ फहरा रही थीं। वे मालाकी लड़ियोंसे अलंकृत थे। उनमें लगी हुई क्षुद्र घण्टिकाओंके शब्द हो रहे थे। वे उत्कृष्ट गन्धयुक्त पदार्थोंसे सुवासित थे। उन्हें समुचितरूपसे उपलिप्त किया गया था। उनमें पुष्प, नैवेद्य आदि पूजन-सामग्री सँजोयी गयी थी और जलपूर्ण कलश स्थापित थे। वे यज्ञजन्य धुएँसे अन्धकारित हो रहे थे। उस त्रिपुर नामक पुरमें आकाशसरीखे नीले तथा हंसोंकी पङ्क्तिके समान उज्ज्वल भवन कतारोंमें सुशोभित हो रहे थे। उनमें लटकती हुई मोतियोंकी झालरें ऐसी प्रतीत होती थीं, मानो चन्द्रमाकी शोभाका उपहास कर रही हैं॥ ११-२०॥ | | मल्लिकाजातिपुष्पाद्यैर्गन्धधूपाधिवासितैः ।<br>पञ्चेन्द्रियसुखैर्नित्यं समैः सत्पुरुषैरिव॥ २१ | वे नित्य मल्लिका, चमेली आदि सुगन्धित पुष्पों तथा गन्ध, धूप आदिसे अधिवासित होनेसे पाँचों इन्द्रियोंके सुखोंसे समन्वित सत्पुरुषोंकी तरह सुशोभित हो रहे थे। | | हैमराजतलौहाद्यमणिरत्नाञ्जनाङ्किताः ।<br>प्राकारास्त्रिपुरे तस्मिन् गिरिप्राकारसंनिभाः॥ २२ | उस त्रिपुरमें सोने, चाँदी और लोहेके प्राचीर बने हुए थे, जिनमें मणि, रत्न और अंजन (काले पत्थर) जड़े हुए |