मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* अध्याय १३१ * । ४६१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सिंहा वनमिवानेके मकरा इव सागरम्।<br>रोषैश्चैवातिपारुष्यैः शरीरमिव संहतैः॥ ३<br>तद्वद् बलिभिरध्यस्तं तत्पुरं देवतारिभिः।<br>त्रिपुरं संकुलं जातं दैत्यकोटिशताकुलम्॥ ४<br>सुतलादपि निष्पत्य पातालाद् दानवालयात्।<br>उपतस्थुः पयोदाभा ये च गिर्युपजीविनः॥ ५<br>यो यं प्रार्थयते कामं सम्प्राप्तस्त्रिपुराश्रयात्।<br>तस्य तस्य मयस्तत्र मायया विदधाति सः॥ ६<br>सचन्द्रेषु प्रदोषेषु साम्बुजेषु सरःसु च।<br>आरामेषु सचूतेषु तपोधनवनेषु च॥ ७<br>स्वङ्गाश्चन्दनदिग्धाङ्गा मातङ्गाः समदा इव।<br>मृष्टाभरणवस्त्राश्च मृष्टस्रगनुलेपनाः॥ ८<br>प्रियाभिः प्रियकामाभिर्भावभावप्रसूतिभिः।<br>नारीभिः सततं रेमुर्मुदिताश्चैव दानवाः॥ ९ | प्रविष्ट हुए। जैसे अनेकों सिंह वनको, अनेकों मगरमच्छ सागरको और क्रोध एवं अत्यन्त कठोरता परस्पर सम्मिलित होकर शरीरको अपने अधिकारमें कर लेते हैं, वैसे ही उन महाबली देव-शत्रुओंद्धारा वह पुर व्याप्त हो गया। इस प्रकार वह त्रिपुर असंख्य (अरबों) दैत्योंसे भर गया। उस समय सुतल और पाताल (दानवोंके निवासस्थान)-से निकलकर आये हुए दानव तथा (देवताओंके भयसे छिपकर) पर्वतोंपर जीवन-निर्वाह करनेवाले दैत्य भी, जो काले बादलकी-सी कान्तिवाले थे, (शरणार्थीके रूपमें) वहाँ उपस्थित हुए। त्रिपुरमें आश्रय लेनेके कारण जो असुर जिस वस्तुकी कामना करता था, उसकी उस कामनाको मयदानव मायाद्वारा पूर्ण कर देता था। जिनके सुडौल शरीरपर चन्दनका अनुलेप लगा था, जो निर्मल आभूषण, वस्त्र, माला और अङ्गरागसे अलंकृत थे तथा मतवाले गजेन्द्रसरीखे दीख रहे थे, ऐसे दानव चाँदनी रातोंमें एवं सायंकालके समय कमलसे सुशोभित सरोवरोंके तटपर, आमके बगीचों और तपोवनोंमें अपनी पत्नियोंके साथ निरन्तर हर्षपूर्वक विहार करते थे॥ १—९॥ |
| मयेन निर्मिते स्थाने मोदमाना महासुराः।<br>अर्थे धर्मे च कामे च निदधुस्ते मतीः स्वयम्॥ १०<br>तेषां त्रिपुरयुक्तानां त्रिपुरे त्रिदशारिणाम्।<br>व्रजति स्म सुखं कालः स्वर्गस्थानां यथा तथा॥ ११<br>शुश्रूषन्ते पितॄन् पुत्राः पत्न्यश्चापि पतींस्तथा।<br>विमुक्तकलहाश्चापि प्रीतयः प्रचुराभवन्॥ १२<br>नाधर्मस्त्रिपुरस्थानां बाधते वीर्यवानपि।<br>अर्चयन्तो दितेः पुत्रास्त्रिपुरायतने हरम्॥ १३<br>पुण्याहशब्दानुच्चैरुराशीर्वादांश्च वेदगान्।<br>स्वनूपुररवन्मिश्रान् वेणुवीणारवानपि॥ १४<br>हासश्च वरनारीणां चित्तव्याकुलकारकः।<br>त्रिपुरे दानवेन्द्राणां रमतां श्रूयते सदा॥ १५ | इस प्रकार मयद्वारा निर्मित उस स्थानपर निवास करते हुए वे महासुर आनन्दका उपभोग कर रहे थे। उन्होंने स्वयं ही धर्म, अर्थ और कामके सम्पादनमें अपनी बुद्धि लगायी। त्रिपुरमें निवास करनेवाले उन देव-शत्रुओंका समय ऐसा सुखमय व्यतीत हो रहा था, जैसे स्वर्गवासियोंका व्यतीत होता है। वहाँ पुत्र पितृगणोंकी तथा पत्नियाँ पतियोंकी सेवा करती थीं। वे परस्पर कलह नहीं करते थे। उनमें परम प्रेम था। किसी प्रकारका अधर्म प्रबल होनेपर भी त्रिपुर-निवासियोंको बाधा नहीं पहुँचाता था। वे दैत्य शिव-मन्दिरमें शङ्करजीकी अर्चना करते हुए वेदोक्त माङ्गलिक शब्दों एवं आशीर्वादोंका उच्चारण करते थे। त्रिपुरमें आनन्द मनानेवाले दानवेन्द्रोंके अपने नूपुरकी झनकारसे मिश्रित वेणु एवं वीणाके शब्द तथा सुन्दरी नारियोंके चित्तको व्याकुल कर देनेवाले हास सदा सुनायी पड़ते थे। |