मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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४६२ * मत्स्यपुराण *
| Sanskrit Shlokas | Hindi Translation |
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| तेषामर्चयतां देवान् ब्राह्मणांश्च नमस्यताम्।<br>धर्मार्थकामतन्त्राणां महान् कालोऽभ्यवर्तत॥ १६<br><br>अथालक्ष्मीरसूया च तृड्बुभुक्षे तथैव च।<br>कलिश्च कलहश्चैव त्रिपुरं विविशुः सह॥ १७<br><br>संध्याकालं प्रविष्टास्ते त्रिपुरं च भयावहाः।<br>समध्यासुः समं घोराः शरीराणि यथाऽऽमयाः॥ १८<br><br>सर्व एते विशन्तस्तु मयेन त्रिपुरान्तरम्।<br>स्वप्ने भयावहा दृष्टा आविशन्तस्तु दानवान्॥ १९<br><br>उदिते च सहस्रांशौ शुभभासाकरे रवौ।<br>मयः सभामाविवेश भास्कराभ्यामिवाम्बुदः॥ २०<br><br>मेरूकूटनिभे रम्ये आसने स्वर्णमण्डिते।<br>आसीनाः काञ्चनगिरेः शृङ्गे तोयमुचो यथा॥ २१<br><br>पार्श्वयोस्तारकाख्यश्च विद्युन्माली च दानवः।<br>उपविष्टौ मयस्यान्ते हस्तिनः कलभाविव॥ २२ | इस प्रकार देवताओंकी अर्चना और ब्राह्मणोंको नमस्कार करनेवाले तथा धर्म, अर्थ एवं कामके साधक उन दैत्योंका महान् समय व्यतीत होता गया। तदनन्तर अलक्ष्मी (दरिद्रता), असूया (गुणोंमें दोष निकालना), तृष्णा, बुभुक्षा (भूख), कलि और कलह—ये सब एक साथ मिलकर त्रिपुरमें प्रविष्ट हुए। इन भयदायक दुर्गुणोंने सायंकाल त्रिपुरमें प्रवेश किया था। इन्होंने राक्षसोंपर ऐसा अधिकार जनाया, जैसे भयंकर व्याधियाँ शरीरोंको काबूमें कर लेती हैं। त्रिपुरके भीतर प्रवेश करते हुए इन दुर्गुणोंको मयने स्वप्नमें दानवोंके शरीरमें भयानक रूपसे प्रविष्ट होते हुए देख लिया। तब सहस्र किरणधारी एवं उज्ज्वल प्रकाश करनेवाले सूर्यके उदय होनेपर मयने (तारक और विद्युन्मालीके साथ) दो सूर्योंसे युक्त बादलकी तरह सभाभवनमें प्रवेश किया। वहाँ वे मेरुगिरिके शिखरके समान सुन्दर स्वर्णमण्डित रमणीय आसनपर आसीन हो गये। उस समय वे ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो सुमेरुगिरिके शिखरपर बादल उमड़ आये हों। मयदानवके निकट एक ओर तारकासुर और दूसरी ओर दानवश्रेष्ठ विद्युन्माली बैठे हुए थे, जो हाथीके बच्चेकी तरह दीख रहे थे॥ १६—२२॥ |
| ततः सुरारयः सर्वेऽशेषकोपा रणाजिरे।<br>उपविष्टा दृढं विद्धा दानवा देवशत्रवः॥ २३<br><br>तेष्वासीनेषु सर्वेषु सुखासनगतेषु च।<br>मयो मायाविजनक इत्युवाच स दानवान्॥ २४<br><br>खेचराः खेचरारावा भो भो दाक्षायणीसुताः *।<br>निशामयध्वं स्वप्नोऽयं मया दृष्टो भयावहः॥ २५<br><br>चतस्रः प्रमदास्तत्र त्रयो मर्त्या भयावहाः।<br>कोपानलादीप्तमुखाः प्रविष्टास्त्रिपुरार्दिनः॥ २६ | तत्पश्चात् युद्धस्थलमें अत्यन्त घायल होनेके कारण जिनके क्रोध शेष रह गये थे, वे सभी देवशत्रु दानव वहाँ आकर यथास्थान बैठ गये। इस प्रकार उन सबके सुखपूर्वक आसनपर बैठ जानेके पश्चात् मायाके उत्पादक मयने उन दानवोंसे इस प्रकार कहा—'अरे दाक्षायणीके पुत्रो! तुमलोग आकाशमें विचरण करनेवाले तथा आकाशचारियोंमें विशेषरूपसे गर्जना करनेवाले हो। मैंने यह एक भयानक स्वप्न देखा है, उसे तुमलोग ध्यानपूर्वक सुनो। मैंने स्वप्नमें चार स्त्रियों और तीन पुरुषोंको पुरमें प्रवेश करते हुए देखा है। उनके रूप भयानक थे तथा |
* दक्षकी कन्या दनुको ही यहाँ दाक्षायणी कहा गया है। सभी दानव कश्यपजीके द्वारा उत्पन्न इन्हीं दनुके पुत्र थे। दैत्यगण दितिके पुत्र थे।