भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

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पृष्ठ 473

* अध्याय १३१ * ४६३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्रविश्य रुषितास्ते च पुराण्यतुलविक्रमाः ।<br>प्रविष्टाः स्म शरीराणि भूत्वा बहुशरीरिणः ॥ २७<br><br>नगरं त्रिपुरं चेदं तमसा समवस्थितम् ।<br>सगृहं सह युष्माभिः सागराम्भसि मज्जितम् ॥ २८<br><br>उलूकं रुचिरा नारी नग्नाऽऽरूढा खरं तथा।<br>पुरुषः सिन्दुतिलकश्चतुरङ्घ्रिस्त्रिलोचनः ॥ २९<br><br>येन सा प्रमदा नुन्ना अहं चैव विबोधितः।<br>ईदृशी प्रमदा दृष्टा मया चातिभयावहा ॥ ३०<br><br>एष ईदृशिकः स्वप्नो दृष्टो वै दितिनन्दनाः।<br>दृष्टः कथं हि कष्टाय असुराणां भविष्यति ॥ ३१<br><br>यदि वोऽहं क्षमो राजा यदिदं वेत्थ चेद्धितम् ।<br>निबोधध्वं सुमनसो न चासूयितुमर्हथ ॥ ३२<br><br>कामं चेष्र्याँ च कोपं च असूयां संविहाय च।<br>सत्ये दमे च धर्मे च मुनिवादे च तिष्ठत ॥ ३३<br><br>शान्तयश्च प्रयुज्यन्तां पूज्यतां च महेश्वरः ।<br>यदि नामास्य स्वप्नस्य ह्येवं चोपरमो भवेत् ॥ ३४<br><br>कुप्यते नो ध्रुवं रुद्रो देवदेवस्त्रिलोचनः ।<br>भविष्याणि च दृश्यन्ते यतो नस्त्रिपुरेऽसुराः ॥ ३५<br><br>कलहं वर्जयन्तश्च अर्जयन्तस्तथाऽऽर्जवम् ।<br>स्वप्नोदयं प्रतीक्षध्वं कालोदयमथापि च ॥ ३६मुख क्रोधाग्निसे उद्दीप्त हो रहे थे, जिससे ऐसा लगता था मानो वे त्रिपुरके विनाशक हैं। वे अतुल पराक्रमशाली प्राणी क्रोधसे भरे हुए थे और पुरोंमें प्रवेश करके अनेकों शरीर धारणकर दानवोंके शरीरोंमें भी घुस गये हैं। यह त्रिपुर नगर अन्धकारसे आच्छन्न हो गया है और गृह तथा तुमलोगोंके साथ ही सागरके जलमें डूब गया है। एक सुन्दरी स्त्री नंगी होकर उलूकपर सवार थी तथा उसके साथ एक पुरुष था, जिसके ललाटमें लाल तिलक लगा था। उसके चार पैर और तीन नेत्र थे। वह गधेपर चढ़ा हुआ था। उसने उस स्त्रीको प्रेरित किया, तब उसने मुझे नींदसे जगा दिया। इस प्रकारकी अत्यन्त भयावनी नारीको मैंने स्वप्नमें देखा है। दितिपुत्रो! मैंने इस प्रकारका स्वप्न देखा है और यह भी देखा है कि यह स्वप्न असुरोंके लिये किस प्रकार कष्टदायक होगा। इसलिये यदि तुमलोग हमें अपना उचितरूपसे राजा मानते हो और यह समझते हो कि इनका कथन हितकारक होगा तो मन लगाकर मेरी बात सुनो। तुमलोग किसीकी असूया (झूठी निन्दा) मत करो। काम, क्रोध, ईर्ष्या, असूया आदि दुर्गुणोंको एकदम छोड़कर सत्य, दम, धर्म और मुनिमार्गका आश्रय लो। शान्तिदायक अनुष्ठानोंका प्रयोग करो और महेश्वरकी पूजा करो। सम्भवतः ऐसा करनेसे स्वप्नकी शान्ति हो जाय। असुरो! (ऐसा प्रतीत हो रहा है कि) त्रिनेत्रधारी देवाधिदेव भगवान् रुद्र निश्चय ही हमलोगोंपर कुपित हो गये हैं; क्योंकि हमारे त्रिपुरमें भविष्यमें घटित होनेवाली घटनाएँ अभीसे दीख पड़ रही हैं। अतः तुमलोग कलहका परित्याग तथा सरलताका आश्रय लेकर इस दुःस्वप्नके परिणामस्वरूप आनेवाले कालकी प्रतीक्षा करो'॥ २३—३६॥
श्रुत्वा दाक्षायणीपुत्रा इत्येवं मयभाषितम् ।<br>क्रोधेष्र्यावस्थया युक्ता दृश्यन्ते च विनाशगाः ॥ ३७इस प्रकार मयदानवका भाषण सुनकर सभी दानव क्रोध और ईर्ष्याके वशीभूत हो गये तथा विनाशकी ओर जाते हुए-से दीखने लगे। अलक्ष्मीद्वारा प्रभावित हुए वे
विनाशमुपपश्यन्तो ह्यलक्ष्म्याध्यापितासुराः ।<br>तत्रैव दृष्ट्वा तेऽन्योन्यं संक्रोधापूरितेक्षणाः ॥ ३८असुर अपने भावी विनाशको संनिकट देखते हुए भी परस्पर एक-दूसरेकी ओर देखकर वहीं क्रोधसे भर गये।