मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय १३२ * | ४६५ |
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| विध्वस्तदेवायतनाश्रमं च<br>सम्भग्नदेवद्विजपूजकं तु।<br>जगद्वभूवामरराजदुष्टै-<br>रभिद्रुतं सस्यमिवालिवृन्दैः॥ ५०॥ | डाले गये। इस प्रकार देवराज इन्द्रके शत्रुओंद्वारा विध्वस्त किया हुआ जगत् ऐसा लगने लगा, जैसे टिड्डीदलोंद्वारा नष्ट की हुई अन्नकी फसल हो॥ ३७—५०॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे त्रिपुरोपाख्याने दुःस्वप्नदर्शनं नामैकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १३१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरोपाख्यानमें दुःस्वप्न-दर्शन नामक एक सौ इकतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १३१॥
एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय
त्रिपुरवासी दैत्योंका अत्याचार, देवताओंका ब्रह्माकी शरणमें जाना और ब्रह्मासहित शिवजीके पास जाकर उनकी स्तुति करना
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं— |
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| अशीलेषु प्रदुष्टेषु दानवेषु दुरात्मसु।<br>लोकेषूत्साद्यमानेषु तपोधनवनेषु च॥ १॥<br><br>सिंहनादे व्योमगानां तेषु भीतेषु जन्तुषु।<br>त्रैलोक्ये भयसम्मूढे तमोऽन्धत्वमुपागते॥ २॥<br><br>आदित्या वसवः साध्याः पितरो मरुतां गणाः।<br>भीताः शरणमाजग्मुर्ब्रह्माणं प्रपितामहम्॥ ३॥<br><br>ते तं स्वर्णोत्पलासीनं ब्रह्माणं समुपागताः।<br>नेमुरूचुश्च सहिताः पञ्चास्यं चतुराननम्॥ ४॥<br><br>वरगुप्तास्तवैवेह दानवास्त्रिपुरालयाः।<br>बाधन्तेऽस्मान् यथा प्रेष्याननुशाधि ततोऽनघ॥ ५॥<br><br>मेघागमे यथा हंसा मृगाः सिंहभयादिव।<br>दानवानां भयात् तद्वद् भ्रमामो हि पितामह॥ ६॥<br><br>पुत्राणां नामधेयानि कलत्राणां तथैव च।<br>दानवैर्भ्राम्यमाणानां विस्मृतानि ततोऽनघ॥ ७॥<br><br>देववेश्मप्रभङ्गाश्च आश्रमभ्रंशनानि च।<br>दानवैर्लोभमोहान्धैः क्रियन्ते च भ्रमन्ति च॥ ८॥ | ऋषियो! त्रिपुरनिवासी दानवोंका शील तो भ्रष्ट ही हो गया था, उनमें दुष्टता भी कूट-कूटकर भर गयी थी। उन दुरात्माओंने लोकों एवं तपोवनोंका विनाश करना आरम्भ किया। वे आकाशमें जाकर सिंहनाद करते, जिसे सुनकर सारे जीव-जन्तु भयभीत हो जाते थे। इस प्रकार जब सारी त्रिलोकी भयके कारण किंकर्तव्यविमूढ़ हो गयी और सर्वत्र अन्धकार-सा छा गया, तब भयसे डरे हुए आदित्य, वसु, साध्य, पितृ-गण और मरुद्गण—ये सभी संगठित होकर प्रपितामह ब्रह्माकी शरणमें पहुँचे। वहाँ पञ्चमुख ब्रह्मा स्वर्णमय कमलासनपर आसीन थे। ये देवगण उनके निकट जाकर उन्हें नमस्कार कर (दानवोंके अत्याचारका) वर्णन करने लगे—'निष्पाप पितामह! त्रिपुरनिवासी दानव आपके ही वरदानसे सुरक्षित होकर हमलोगोंको सेवकोंकी तरह कष्ट दे रहे हैं, अतः आप उन्हें मना कीजिये। पितामह! जैसे बादलोंके उमड़नेपर हंस और सिंहकी दहाड़से मृग भयभीत होकर भागने लगते हैं, उसी प्रकार दानवोंके भयसे हमलोग इधर-उधर लुक-छिप रहे हैं। पापरहित ब्रह्मन्! यहाँतक कि दानवोंद्वारा खदेड़े जानेके कारण हमलोगोंको अपने पुत्रों तथा पत्नियोंके नामतक भूल गये हैं। लोभ एवं मोहसे अंधे हुए दानवगण देवताओंके निवासस्थानोंको तोड़ते-फोड़ते तथा ऋषियोंके आश्रमोंको विध्वस्त करते हुए |