मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| यदि न त्रायसे लोकं दानवैर्विद्रुतं द्रुतम्।<br>धर्षेणानेन निर्देवं निर्मनुष्याश्रमं जगत्॥ ९<br>इत्येवं त्रिदशैरुक्तः पद्मयोनिः पितामहः।<br>प्रत्याह त्रिदशान् सेन्द्रानिन्दुत्तुल्याननः प्रभुः॥ १०<br>मयस्य यो वरो दत्तो मया मतिमतां वराः।<br>तस्यान्त एष सम्प्राप्तो यः पुरोक्तो मया सुराः॥ ११<br>तच्च तेषामधिष्ठानं त्रिपुरं त्रिदशर्षभाः।<br>एकेषुपातमोक्षेण हन्तव्यं नेषुवृष्टिभिः॥ १२<br>भवतां च न पश्यामि कमप्यत्र सुरर्षभाः।<br>यस्तु चैकप्रहारेण पुरं हन्यात् सदानवम्॥ १३<br>त्रिपुरं नाल्पवीर्येण शक्यं हन्तुं शरेण तु।<br>एकं मुक्त्वा महादेवं महेशानं प्रजापतिम्॥ १४<br>ते यूयं यदि अन्ये च क्रतुविध्वंसकं हरम्।<br>याचामः सहिता देवं त्रिपुरं स हनिष्यति॥ १५<br>कृतः पुराणां विष्कम्भो योजनानां शतं शतम्।<br>यथा चैकप्रहारेण हन्यते वै भवेन तु।<br>पुष्ययोगेन युक्तानि तानि चैकक्षणेन तु॥ १६<br>ततो देवैश्च सम्प्रोक्तो यास्याम इति दुःखितैः।<br>पितामहश्च तैः सार्धं भवसंसदमागतः॥ १७<br>तं भवं भूतभव्येशं गिरिशं शूलपाणिनम्।<br>पश्यन्ति चोमया सार्धं नन्दिना च महात्मना॥ १८<br>अग्निवर्णमजं देवमग्निकुण्डनिभेक्षणम्।<br>अग्न्यादित्यसहस्राभमग्निवर्णविभूषितम् ॥ १९<br>चन्द्रावयवलक्ष्माणं चन्द्रसौम्यतराननम्।<br>आगम्य तमजं देवमथ तं नीललोहितम्॥ २०<br>स्तुवन्तो वरदं शम्भुं गोपतिं पार्वतीपतिम्॥ २१ | घूम रहे हैं। यदि आप शीघ्र ही दानवोंद्वारा विध्वंस किये जाते हुए लोककी रक्षा नहीं करेंगे तो सारा जगत् देवता, मनुष्य और आश्रमसे रहित हो जायगा'॥ १—९॥<br>जब देवताओंने पद्मयोनि ब्रह्मासे इस प्रकार निवेदन किया, तब चन्द्रमाके समान गौरवर्ण मुखवाले सामर्थ्यशाली ब्रह्माने इन्द्रादि देवताओंसे कहा—'बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ देवगण! मैंने मयको जो वर दिया था, उसका यह अन्त समय आ पहुँचा है, जिसे मैंने पहले ही उन लोगोंसे कह दिया था। श्रेष्ठ देवताओ! उनका निवासस्थान वह त्रिपुर तो एक ही बाणके प्रहारसे नष्ट हो जानेवाला है। उसपर बाण-वृष्टिकी आवश्यकता नहीं है, किंतु श्रेष्ठ देवगण! मैं यहाँ तुमलोगोंमेंसे किसीको भी ऐसा नहीं देख रहा हूँ, जो एक ही बाणके आघातसे दानवोंसहित त्रिपुरको नष्ट कर सके। देवाधिदेव प्रजापति शङ्करके अतिरिक्त अन्य कोई अल्प पराक्रमी वीर एक ही बाणसे त्रिपुरका विनाश नहीं कर सकता। इसलिये यदि तुमलोग तथा अन्यान्य देवगण भी एक साथ होकर दक्ष-यज्ञके विध्वंसक भगवान् शङ्करके पास चलकर उनसे याचना करें तो वे त्रिपुरका विनाश कर देंगे। इन पुरोंका विष्कम्भ सौ-सौ योजनोंका बना हुआ है, अतः पुष्य नक्षत्रके योगमें जब ये तीनों एक साथ सम्मिलित होंगे, उसी क्षण भगवान् शङ्कर एक ही बाणके आघातसे इसका विध्वंस कर सकते हैं।' यह सुनकर दुःखित देवताओंने कहा कि 'हमलोग चलेंगे।' तब ब्रह्मा उन्हें साथ लेकर शङ्करजीकी सभामें आये। वहाँ उन्होंने देखा कि भूत एवं भविष्यके स्वामी तथा गिरिपर शयन करनेवाले त्रिशूलपाणि शङ्कर पार्वतीदेवी तथा महात्मा नन्दीके साथ विराजमान हैं। उन अजन्मा महादेवके शरीरका वर्ण अग्निके समान उद्दीप्त था। उनके नेत्र अग्निकुण्डके सदृश लाल थे। उनके शरीरसे सहस्रों अग्नियों और सूर्योंके समान प्रभा छिटक रही थी। वे अग्निके-से रंगवाली विभूतिसे विभूषित थे। उनके ललाटपर बालचन्द्र शोभा पा रहा था और मुख (पूर्णिमाके) चन्द्रमासे भी अधिक सुन्दर दीख रहा था। तब देवगण उन अजन्मा नीललोहित महादेवके निकट गये और पशुपति, पार्वती-प्राणवल्लभ, वरदायक शम्भुकी इस प्रकार स्तुति करने लगे—॥ १०—२१॥ |