भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 477

* अध्याय १३२ * ४६७


देवा ऊचुःदेवताओंने कहा—
नमो भवाय शर्वाय रुद्राय वरदाय च।<br>पशूनां पतये नित्यमुग्राय च कपर्दिने॥ २२<br><br>महादेवाय भीमाय त्र्यम्बकाय च शान्तये।<br>ईशानाय भयघ्नाय नमस्त्वन्धकघातिने॥ २३<br><br>नीलग्रीवाय भीमाय वेधसे वेधसा स्तुते।<br>कुमारशत्रुनिघ्नाय कुमारजनकाय च॥ २४<br><br>विलोहिताय धूम्राय वराय क्रथनाय च।<br>नित्यं नीलशिखण्डाय शूलिने दिव्यशायिने॥ २५<br><br>उरगाय त्रिनेत्राय हिरण्यवसुरेतसे।<br>अचिन्त्यायाम्बिकाभर्त्रे सर्वदेवस्तुताय च॥ २६<br><br>वृषध्वजाय मुण्डाय जटिने ब्रह्मचारिणे।<br>तप्यमानाय सलिले ब्रह्मण्यायाजिताय च॥ २७<br><br>विश्वात्मने विश्वसृजे विश्वमावृत्य तिष्ठते।<br>नमोऽस्तु दिव्यरूपाय प्रभवे दिव्यशम्भवे॥ २८<br><br>अभिगम्याय काम्याय स्तुत्यायार्च्याय सर्वदा।<br>भक्तानुकम्पिने नित्यं दिशते यन्मनोगतम्॥ २९भगवन्! आप भव—सृष्टिके उत्पादक और पालक, शर्व—प्रलयकालमें सबके संहारक, रुद्र—समस्त प्राणियोंके प्राणस्वरूप, वरद—वरप्रदाता, पशुपति*—समस्त जीवोंके स्वामी, उग्र—बहुत ऊँचे, एकादश रुद्रोंमेंसे एक और कपर्दी—जटाजूटधारी हैं, आपको नमस्कार है। आप महादेव—देवताओंके भी पूज्य, भीम—भयंकर, त्र्यम्बक—त्रिनेत्रधारी, एकादश रुद्रोंमें अन्यतम, शान्त—शान्तस्वरूप, ईशान—नियन्ता, भयघ्न—भयके विनाशक और अन्धकघाती—अन्धकासुरके वधकर्ताको प्रणाम है। नीलग्रीव—ग्रीवामें नील चिह्न धारण करनेवाले, भीम—भयदायक, वेधाः—ब्रह्मस्वरूप, वेधसा स्तुतः—ब्रह्माजीके द्वारा स्तुत, कुमारशत्रुनिघ्न—कुमार कार्तिकेयके शत्रुओंको मारनेवाले, कुमारजनक—स्वामी कार्तिकेयके पिता, विलोहित—लाल रंगवाले, धूम्र—धूम्रवर्ण, वर—जगत्‌को ढकनेवाले, क्रथन—प्रलयकारी, नीलशिखण्ड—नीली जटावाले, शूली—त्रिशूलधारी, दिव्यशायी—दिव्य समाधिमें लीन रहनेवाले, उरग—सर्पधारी, त्रिनेत्र—तीन नेत्रोंवाले, हिरण्यवसुरेता—सुवर्ण आदि धनके उद्गम-स्थान, अचिन्त्य—अतर्क्य, अम्बिकाभर्ता—पार्वतीपति, सर्वदेवस्तुत—सम्पूर्ण देवोंद्वारा स्तुत, वृषध्वज—बैल-चिह्नसे युक्त ध्वजावाले, मुण्ड—मुण्डधारी, जटी—जटाधारी, ब्रह्मचारी—ब्रह्मचर्यसम्पन्न, सलिले तप्यमान—जलमें तपस्या करनेवाले, ब्रह्मण्य—ब्राह्मण-भक्त, अजित—अजेय, विश्वात्मा—विश्वके आत्मस्वरूप, विश्वसृक्—विश्वके स्रष्टा, विश्वमावृत्य तिष्ठते—संसारमें व्याप्त रहनेवाले, दिव्यरूप—दिव्यरूपवाले, प्रभु—सामर्थ्यशाली, दिव्यशम्भु—अत्यन्त मङ्गलमय, अभिगम्य—शरण लेने योग्य, काम्य—अत्यन्त सुन्दर, स्तुत्य—स्तवन करनेयोग्य, सर्वदा अर्च्य—सदा पूजनीय, भक्तानुकम्पी—भक्तोंपर दया करनेवाले और यन्मनोगतं नित्यं दिशते—मनकी अभिलाषा पूर्ण करनेवालेको अभिवादन है॥ २२—२९॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे त्रिपुरदाहे ब्रह्मादिसर्वदेवकृतमहेश्वरस्तवो नाम द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १३२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरदाह-प्रसङ्गमें ब्रह्मादि-सर्वदेवकृत महेश्वरस्तव नामक एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १३२॥


* पाशुपत—शैवागमानुसार जीवमात्र पाशबद्ध होनेसे पशु और पाशयुक्त शिव पशुपति कहे गये हैं।