मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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४६८ * मत्स्यपुराण *
एक सौ तैंतीसवाँ अध्याय
त्रिपुर-विध्वंसार्थ शिवजीके विचित्र रथका निर्माण और देवताओंके साथ उनका युद्धके लिये प्रस्थान
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सूत उवाच<br>ब्रह्माद्यैः स्तूयमानस्तु देवैर्देवो महेश्वरः।<br>प्रजापतिमुवाचेदं देवानां क्व भयं महत्॥ १ | सूतजी कहते हैं— ऋषियो! ब्रह्मा आदि देवताओंद्वारा इस प्रकार स्तुति किये जानेपर देवाधिदेव महेश्वरने प्रजापति ब्रह्मासे यह कहा—'अरे! आप देवताओंको यह महान् भय कहाँसे आया? |
| भो देवाः स्वागतं वोऽस्तु ब्रूत यद् वो मनोगतम्।<br>तावदेव प्रयच्छामि नास्त्यदेयं मया हि वः॥ २ | देवगण! आपलोगोंका स्वागत है। आपलोगोंके मनमें जो अभिलाषा हो, उसे कहिये। मैं उसे अवश्य प्रदान करूँगा; क्योंकि आपलोगोंके लिये मुझे कुछ भी अदेय नहीं है। |
| युष्माकं नितरां शं वै कर्ताहं विबुधर्षभाः।<br>चरामि महदत्युग्रं यच्चापि परमं तपः॥ ३ | श्रेष्ठ देवगण! मैं सदा आपलोगोंका कल्याण ही करता रहता हूँ। यहाँतक कि जो महान्, अत्यन्त उग्र एवं घोर तप करता हूँ, वह भी आपलोगोंके लिये ही करता हूँ। |
| विद्विष्टा वो मम द्विष्ठाः कष्टाः कष्टपराक्रमाः।<br>तेषामभावः सम्पाद्यो युष्माकं भव एव च॥ ४ | जो आपलोगोंसे विद्वेष करते हैं, वे मेरे भी घोर शत्रु हैं। इसलिये जो आपलोगोंको कष्ट देनेवाले हैं, वे कितने ही घोर पराक्रमी क्यों न हों, मुझे उनका अन्त और आपका श्रेयःसम्पादन करना है।' |
| एवमुक्तास्तु देवेन प्रेम्णा सब्रह्मकाः सुराः।<br>रुद्रमाहुर्महाभागं भागार्हाः सर्व एव ते॥ ५ | महादेवजीद्वारा प्रेमपूर्वक इस प्रकार कहे जानेपर ब्रह्मसहित समस्त भाग्यशाली देवताओंने महाभाग शङ्करजीसे कहा— |
| भगवंस्तैस्तपस्तप्तं रौद्रं रौद्रपराक्रमैः।<br>असुरैर्वध्यमानाः स्म वयं त्वां शरणं गताः॥ ६ | 'भगवन्! भयंकर पराक्रमी उन असुरोंने अत्यन्त भीषण तप किया है, जिसके प्रभावसे वे हमें कष्ट दे रहे हैं। इसलिये हमलोग आपकी शरणमें आये हैं। |
| मयो नाम दितेः पुत्रस्त्रिनेत्र कलहप्रियः।<br>त्रिपुरं येन तद्दुर्गं कृतं पाण्डुरगोपुरम्॥ ७ | त्रिलोचन! (आप तो जानते ही हैं) दितिका पुत्र मय स्वभावतः कलहप्रिय है। उसने ही पीले रंगके फाटकवाले उस त्रिपुर नामक दुर्गका निर्माण किया है। |
| तदाश्रित्य पुरं दुर्गं दानवा वरनिर्भयाः।<br>बाधन्तेऽस्मान् महादेव प्रेष्यमस्वामिनं यथा॥ ८ | उस त्रिपुरदुर्गका आश्रय लेकर दानव वरदानके प्रभावसे निर्भय हो गये हैं। महादेव! वे हमलोगोंको इस प्रकार कष्ट दे रहे हैं, मानो अनाथ नौकर हों। |
| उद्यानानि च भग्नानि नन्दनादीनि यानि च।<br>वराश्चाप्सरसः सर्वा रम्भाद्या दनुजैर्हृताः॥ ९ | उन दानवोंने नन्दन आदि जितने उद्यान थे, उन सबको विनष्ट कर दिया तथा रम्भा आदि सभी श्रेष्ठ अप्सराओंका अपहरण कर लिया। |
| इन्द्रस्य वाह्याश्च गजाः कुमुदाञ्जनवामनाः।<br>ऐरावताद्यापहृता देवतानां महेश्वर॥ १० | महेश्वर! वे इन्द्रके वाहन तथा दिशागज कुमुद, अञ्जन, वामन और ऐरावत आदि गजेन्द्रोंको भी छीन ले गये। |
| ये चेन्द्ररथमुख्याश्च हरयोऽपहृतासुरैः।<br>जाताश्च दानवानां ते रथयोग्यास्तुरङ्गमाः॥ ११ | इन्द्रके रथमें जुतनेवाले जो मुख्य अश्व थे, उन्हें भी वे असुर हरण कर ले गये और अब वे घोड़े दानवोंके रथमें जोते जाते हैं। |