भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 478

४६८ * मत्स्यपुराण *


एक सौ तैंतीसवाँ अध्याय

त्रिपुर-विध्वंसार्थ शिवजीके विचित्र रथका निर्माण और देवताओंके साथ उनका युद्धके लिये प्रस्थान

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सूत उवाच<br>ब्रह्माद्यैः स्तूयमानस्तु देवैर्देवो महेश्वरः।<br>प्रजापतिमुवाचेदं देवानां क्व भयं महत्॥ १सूतजी कहते हैं— ऋषियो! ब्रह्मा आदि देवताओंद्वारा इस प्रकार स्तुति किये जानेपर देवाधिदेव महेश्वरने प्रजापति ब्रह्मासे यह कहा—'अरे! आप देवताओंको यह महान् भय कहाँसे आया?
भो देवाः स्वागतं वोऽस्तु ब्रूत यद् वो मनोगतम्।<br>तावदेव प्रयच्छामि नास्त्यदेयं मया हि वः॥ २देवगण! आपलोगोंका स्वागत है। आपलोगोंके मनमें जो अभिलाषा हो, उसे कहिये। मैं उसे अवश्य प्रदान करूँगा; क्योंकि आपलोगोंके लिये मुझे कुछ भी अदेय नहीं है।
युष्माकं नितरां शं वै कर्ताहं विबुधर्षभाः।<br>चरामि महदत्युग्रं यच्चापि परमं तपः॥ ३श्रेष्ठ देवगण! मैं सदा आपलोगोंका कल्याण ही करता रहता हूँ। यहाँतक कि जो महान्, अत्यन्त उग्र एवं घोर तप करता हूँ, वह भी आपलोगोंके लिये ही करता हूँ।
विद्विष्टा वो मम द्विष्ठाः कष्टाः कष्टपराक्रमाः।<br>तेषामभावः सम्पाद्यो युष्माकं भव एव च॥ ४जो आपलोगोंसे विद्वेष करते हैं, वे मेरे भी घोर शत्रु हैं। इसलिये जो आपलोगोंको कष्ट देनेवाले हैं, वे कितने ही घोर पराक्रमी क्यों न हों, मुझे उनका अन्त और आपका श्रेयःसम्पादन करना है।'
एवमुक्तास्तु देवेन प्रेम्णा सब्रह्मकाः सुराः।<br>रुद्रमाहुर्महाभागं भागार्हाः सर्व एव ते॥ ५महादेवजीद्वारा प्रेमपूर्वक इस प्रकार कहे जानेपर ब्रह्मसहित समस्त भाग्यशाली देवताओंने महाभाग शङ्करजीसे कहा—
भगवंस्तैस्तपस्तप्तं रौद्रं रौद्रपराक्रमैः।<br>असुरैर्वध्यमानाः स्म वयं त्वां शरणं गताः॥ ६'भगवन्! भयंकर पराक्रमी उन असुरोंने अत्यन्त भीषण तप किया है, जिसके प्रभावसे वे हमें कष्ट दे रहे हैं। इसलिये हमलोग आपकी शरणमें आये हैं।
मयो नाम दितेः पुत्रस्त्रिनेत्र कलहप्रियः।<br>त्रिपुरं येन तद्दुर्गं कृतं पाण्डुरगोपुरम्॥ ७त्रिलोचन! (आप तो जानते ही हैं) दितिका पुत्र मय स्वभावतः कलहप्रिय है। उसने ही पीले रंगके फाटकवाले उस त्रिपुर नामक दुर्गका निर्माण किया है।
तदाश्रित्य पुरं दुर्गं दानवा वरनिर्भयाः।<br>बाधन्तेऽस्मान् महादेव प्रेष्यमस्वामिनं यथा॥ ८उस त्रिपुरदुर्गका आश्रय लेकर दानव वरदानके प्रभावसे निर्भय हो गये हैं। महादेव! वे हमलोगोंको इस प्रकार कष्ट दे रहे हैं, मानो अनाथ नौकर हों।
उद्यानानि च भग्नानि नन्दनादीनि यानि च।<br>वराश्चाप्सरसः सर्वा रम्भाद्या दनुजैर्हृताः॥ ९उन दानवोंने नन्दन आदि जितने उद्यान थे, उन सबको विनष्ट कर दिया तथा रम्भा आदि सभी श्रेष्ठ अप्सराओंका अपहरण कर लिया।
इन्द्रस्य वाह्याश्च गजाः कुमुदाञ्जनवामनाः।<br>ऐरावताद्यापहृता देवतानां महेश्वर॥ १०महेश्वर! वे इन्द्रके वाहन तथा दिशागज कुमुद, अञ्जन, वामन और ऐरावत आदि गजेन्द्रोंको भी छीन ले गये।
ये चेन्द्ररथमुख्याश्च हरयोऽपहृतासुरैः।<br>जाताश्च दानवानां ते रथयोग्यास्तुरङ्गमाः॥ ११इन्द्रके रथमें जुतनेवाले जो मुख्य अश्व थे, उन्हें भी वे असुर हरण कर ले गये और अब वे घोड़े दानवोंके रथमें जोते जाते हैं।