भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 479, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 479
* अध्याय १३३ *४६९
ये रथा ये गजाश्चैव याः स्त्रियो वसु यच्च नः।<br>तन्नो व्यपहृतं दैत्यैः संशयो जीविते पुनः॥ १२(कहाँतक कहें) हमलोगोंके पास जितने रथ, जितने हाथी, जितनी स्त्रियाँ और जो कुछ भी धन था, हमारा वह सब दैत्योंने अपहरण कर लिया है और अब हमलोगोंके जीवनमें भी सन्देह उत्पन्न हो गया हैं'॥ १-१२॥
त्रिनेत्र एवमुक्तस्तु देवैः शक्रपुरोगमैः।<br>उवाच देवान् देवेशो वरदो वृषवाहनः॥ १३<br>व्यपगच्छतु वो देवा महत् दानवजं भयम्।<br>तदहं त्रिपुरं धक्ष्ये क्रियतां यद् ब्रवीमि तत्॥ १४<br>यदीच्छथ मया दग्धुं तत्पुरं सहदानवम्।<br>रथमौपयिकं मह्यं सज्जध्वं किमास्यते॥ १५<br>दिग्वाससा तथोक्तास्ते सपितामहकाः सुराः।<br>तथेत्युक्त्वा महादेवं चक्रुस्ते रथमुत्तमम्॥ १६<br>धरां कूबरकौ द्वौ तु रुद्रपार्श्वचरावुभौ।<br>अधिष्ठानं शिरो मेरोरक्षो मन्दर एव च॥ १७<br>चक्रुश्चन्द्रं च सूर्यं च चक्रं काञ्चनराजते।<br>कृष्णपक्षं शुक्लपक्षं पक्षद्वयमपीश्वराः॥ १८<br>रथनेमिद्वयं चक्रुर्देवा ब्रह्मपुरःसराः।<br>आदित्यं पक्षयन्त्रं यन्त्रमेताश्च देवताः॥ १९<br>कम्बलाश्वतराभ्यां च नागाभ्यां समवेष्टितम्।<br>भार्गवश्चाङ्गिराश्चैव बुधोऽङ्गारक एव च॥ २०<br>शनैश्चरस्तथा चात्र सर्वे ते देवसत्तमाः।<br>वरूथं गगनं चक्रुश्चारुरूपं रथस्य ते॥ २१<br>कृतं द्विजिह्ननयनं त्रिवेणुं शातकौम्भिकम्।<br>मणिमुक्तेन्द्रनीलैश्च वृतं ह्यष्टमुखैः सुरैः॥ २२इन्द्र आदि देवताओं द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर त्रिनेत्रधारी, वरदायक, वृषवाहन, देवेश्वर शङ्करने देवताओंसे कहा—'देवगण! अब आपलोगोंका दानवोंसे उत्पन्न हुआ महान् भय दूर हो जाना चाहिये। मैं उस त्रिपुरको जला डालूँगा, किंतु मैं जो कह रहा हूँ, वैसा उपाय कीजिये। यदि आपलोग मेरे द्वारा दानवोंसहित उस त्रिपुरको जला देनेकी इच्छा रखते हैं तो मेरे लिये समस्त साधनोंसे सम्पन्न एक रथ सुसज्जित कीजिये। अब देर मत कीजिये।' दिग्वासा शङ्करजीद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर ब्रह्मासहित उन देवताओंने महादेवजीसे 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली। फिर तो वे एक उत्तम रथका निर्माण करनेमें लग गये। उन्होंने पृथ्वीको रथ, रुद्रके दो पार्श्वचरोंको, दोनों कूबर मेरुको रथका शिरः-स्थान और मन्दरको धुरा बनाया। सूर्य और चन्द्रमा रथके सोने-चाँदीके दोनों पहिये बनाये गये। ब्रह्मा आदि ऐश्वर्यशाली देवोंने शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष—दोनोंसे रथकी दोनों नेमियाँ बनायीं। देवताओंने कम्बल और अश्वतर नामक नागोंसे परिवेष्टित कर दोनों बगलके पक्ष-यन्त्र बनाये। शुक्र, बृहस्पति, बुध, मङ्गल तथा शनैश्चर ये—सभी देवश्रेष्ठ उसपर विराजित हुए। उन देवताओंने गगन-मण्डलको रथका सौन्दर्यशाली वरूथ बनाया। सर्पोंके नेत्रोंसे उसका त्रिवेणु बनाया गया, जो सुवर्ण-सा चमक रहा था। वह मणि, मुक्ता और इन्द्रनील मणिके समान आठ प्रधान देवताओंसे घिरा था॥ १३-२२॥
गङ्गा सिन्धुः शतद्रुश्च चन्द्रभागा इरावती।<br>वितस्ता च विपाशा च यमुना गण्डकी तथा॥ २३<br>सरस्वती देविका च तथा च सरयूरपि।<br>एताः सरिद्वराः सर्वा वेणुसंज्ञा कृता रथे॥ २४<br>धृतराष्ट्राश्च ये नागास्ते च रश्म्यात्मकाः कृताः।<br>वासुकेः कुलजा ये च ये च रैवतवंशजाः॥ २५<br>ते सर्पा दर्पसम्पूर्णाश्चापतूणेष्वनूगनाः।<br>अवतस्थुः शरा भूत्वा नानाजातिशुभाननाः॥ २६गङ्गा, सिन्धु, शतद्रु, चन्द्रभागा, इरावती, वितस्ता, विपाशा, यमुना, गण्डकी, सरस्वती, देविका तथा सरयू—इन सभी श्रेष्ठ नदियोंको उस रथमें वेणुस्थानपर नियुक्त किया गया। धृतराष्ट्रके वंशमें उत्पन्न होनेवाले जो नाग थे, वे बाँधनेके लिये रस्सी बने हुए थे। जो वासुकि और रैवतके वंशमें उत्पन्न होनेवाले नाग थे, वे सभी दर्पसे पूर्ण और शीघ्रगामी होनेके कारण नाना प्रकारके सुन्दर मुखवाले बाण बनकर धनुषके तरकसोंमें अवस्थित हुए।
मत्स्य महापुराण · पृष्ठ 479, कुल 1098 में से · BharatKosha