मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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४७० * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सुरसा सरमा कद्रूर्विनता शुचिरेव च।<br>तृषा बुभुक्षा सर्वोग्रा मृत्युः सर्वशमस्तथा॥ २७<br><br>ब्रह्मवध्या च गोवध्या बालवध्या प्रजाभयाः।<br>गदा भूत्वा शक्तयश्च तदा देवरथेऽभ्ययुः॥ २८<br><br>युगं कृतयुगं चात्र चातुर्होत्रप्रयोजकाः।<br>चतुर्वर्णाः सलीलाश्च बभूवुः स्वर्णकुण्डलाः॥ २९<br><br>तद्युगं युगसंकाशं रथशीर्षे प्रतिष्ठितम्।<br>धृतराष्ट्रेण नागेन बद्धं बलवता महत्॥ ३०<br><br>ऋग्वेदः सामवेदश्च यजुर्वेदस्तथापरः।<br>वेदाश्चत्वार एवैते चत्वारस्तुरगाऽभवन्॥ ३१<br><br>अन्नदानपुरोगाणि यानि दानानि कानिचित्।<br>तान्यासन् वाजिनां तेषां भूषणानि सहस्रशः॥ ३२<br><br>पद्मद्वयं तक्षकश्च कर्कोटकधनञ्जयौ।<br>नागा बभूवुरेवैते हयानां वालबन्धनाः॥ ३३<br><br>ओङ्कारप्रभवास्ता वा मन्त्रयज्ञक्रतुक्रियाः।<br>उपद्रवाः प्रतीकाराः पशुबन्धेष्टयस्तथा॥ ३४<br><br>यज्ञोपवाहान्येतानि तस्मिँल्लोकरथे शुभे।<br>मणिमुक्ताप्रवालैस्तु भूषितानि सहस्रशः॥ ३५<br><br>प्रतोदोङ्कार एवासीत्तदग्रं च वषट्कृतम्।<br>सिनीवाली कुहू राका तथा चानुमतिः शुभा॥ ३६<br><br>योक्त्राण्यासंस्तुरङ्गाणामपसर्पणविग्रहाः ॥ ३७<br><br>कृष्णान्यथ च पीतानि श्वेतमाञ्जिष्ठकानि च।<br>अवदाताः पताकास्तु बभूवुः पवनेरिताः॥ ३८<br><br>ऋतुभिश्च कृतः षड्भिर्धनुः संवत्सरोऽभवत्।<br>अजरा ज्याभवच्चापि साम्बिका धनुषो दृढा ॥ ३९<br><br>कालो हि भगवान् रुद्रस्तं च संवत्सरं विदुः।<br>तस्मादुमा कालरात्रिर्धनुषो ज्याजराभवत्॥ ४०<br><br>सगर्भं त्रिपुरं येन दग्धवान् स त्रिलोचनः।<br>स इषुविष्णुसोमाग्नित्रिदैवतमयोऽभवत्॥ ४१<br><br>आननं ह्यग्निरभवच्छल्यं सोमस्तमोनुदः।<br>तेजसः समवायोऽथ चेषोस्तेजो रथाङ्गधृक्॥ ४२<br><br>तस्मिंश्च वीर्यवृद्ध्यर्थं वासुकिर्नागपार्थिवः।<br>तेजः संवसनार्थं वै मुमोचातिविषो विषम्॥ ४३ | सबसे उग्र स्वभाववाली सुरसा, देवशुनी, सरमा, कद्रू, विनता, शुचि, तृषा, बुभुक्षा तथा सबका शमन करनेवाली मृत्यु, ब्रह्महत्या, गोहत्या, बालहत्या और प्रजाभय—ये सभी उस समय गदा और शक्तिका रूप धारण कर उस देवरथमें उपस्थित हुईं। कृतयुगका जूआ बनाया गया। चातुर्होत्र यज्ञके प्रयोजक लीलासहित चारों वर्ण स्वर्णमय कुण्डल हुए। उस युग-सदृश जूएको रथके शीर्षस्थानपर रखा गया और उसे बलवान् धृतराष्ट्र नागद्वारा कसकर बाँध दिया गया। ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद—ये चारों वेद चार घोड़े हुए। अन्नदान आदि जितने प्रमुख दान हैं, वे सभी उन घोड़ोंके हजारों प्रकारके आभूषण बने। पद्मद्वय, तक्षक, कर्कोटक, धनञ्जय—ये नाग उन घोड़ोंके बाल बाँधनेके लिये रस्सी हुए। ओंकारसे उत्पन्न होनेवाली मन्त्र, यज्ञ और क्रतूरूप क्रियाएँ, उपद्रव, उनकी शान्तिके लिये प्रायश्चित्त, पशुबन्ध आदि इष्टियाँ, यज्ञोपवीत आदि संस्कार—ये सभी उस सुन्दर लोकरथमें शोभा-वृद्धिके लिये मणि, मुक्ता और मूँगेके रूपमें उपस्थित हुए। ओंकारका चाबुक बना और वषट्कार उसका अग्रभाग हुआ। सिनीवाली (चतुर्दशीय अमा), कुहू (अमावास्याकी अधिष्ठात्री देवी), राका (शुद्ध पूर्णिमा तिथि) तथा शुभदायिनी अनुमति (प्रतिपद्युक्ता पूर्णिमा)—ये सभी घोड़ोंको रथमें जोतनेके लिये रस्सियाँ और बागडोर बनीं। उसमें काले, पीले, श्वेत और लाल रंगकी निर्मल पताकाएँ लगी थीं, जो वायुके वेगसे फहरा रही थीं। छहों ऋतुओंसहित संवत्सरका धनुष बनाया गया। अम्बिकादेवी उस धनुषकी कभी जीर्ण न होनेवाली सुदृढ़ प्रत्यञ्चा हुईं। भगवान् रुद्र कालस्वरूप हैं। उन्हींको संवत्सर कहा जाता है, इसी कारण अम्बिकादेवी कालरात्रिरूपसे उस धनुषकी कभी न कटनेवाली प्रत्यञ्चा बनीं। त्रिलोचन भगवान् शङ्कर जिस बाणसे अन्तर्भागसहित त्रिपुरको जलानेवाले थे, वह श्रेष्ठ बाण विष्णु, सोम, अग्नि—इन तीनों देवताओंके संयुक्त तेजसे निर्मित हुआ था। उस बाणका मुख अग्नि और फाल अन्धकारविनाशक चन्द्रमा थे। चक्रधारी विष्णुका तेज समूचे बाणमें व्याप्त था। इस प्रकार वह बाण तेजका समन्वित रूप था। उस बाणपर नागराज वासुकिने उसके पराक्रमकी वृद्धि एवं तेजकी स्थिरताके लिये अत्यन्त उग्र विष उगल दिया था॥ २३—४३॥ |