भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 481
* अध्याय १३३ *४७१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कृत्वा देवा रथं चापि दिव्यं दिव्यप्रभावतः।<br>लोकाधिपतिमभ्येत्य इदं वचनमब्रुवन्॥ ४४<br><br>संस्कृतोऽयं रथोऽस्माभिस्तव दानवशत्रुजित्।<br>इदमापत्यरित्राणं देवान् सेन्द्रपुरोगमान्॥ ४५<br><br>तं मेरुशिखराकारं त्रैलोक्यरथमुत्तमम्।<br>प्रशस्य देवान् साध्विति रथं पश्यति शङ्करः॥ ४६<br><br>मुहुर्दृष्ट्वा रथं साधु साध्वित्युक्त्वा मुहुर्मुहुः।<br>उवाच सेन्द्रानमरानमराधिपतिः स्वयंम्॥ ४७<br><br>यादृशोऽयं रथः कॢप्तो युष्माभिर्मम सत्तमाः।<br>ईदृशो रथसम्पत्त्या यन्ता शीघ्रं विधीयताम्॥ ४८<br><br>इत्युक्ता देवदेवेन देवा विद्धा इवेषुभिः।<br>अवापुर्महतीं चिन्तां कथं कार्यमिति ब्रुवन्॥ ४९<br><br>महादेवस्य देवोऽन्यः को नाम सदृशो भवेत्।<br>मुक्त्वा चक्रायुधं देवं सोऽप्यस्येषु समाश्रितः॥ ५०<br><br>धुरि युक्ता इवोक्षाणो घटन्त इव पर्वतैः।<br>निःश्वसन्तः सुराः सर्वे कथमेतदिति ब्रुवन्॥ ५१<br><br>देवेष्वाह देवदेवो लोकनाथस्य धूर्गतान्।<br>अहं सारथिरित्युक्त्वा जग्राहाश्वांस्ततोऽग्रजः॥ ५२<br><br>ततो देवैः सगन्धर्वैः सिंहनादो महान् कृतः।<br>प्रतोदहस्तं सम्प्रेक्ष्य ब्रह्माणं सूततां गतम्॥ ५३<br><br>भगवानपि विश्वेशो रथस्थे वै पितामहे।<br>सदृशः सूत इत्युक्त्वा चारुरोह रथं हरः॥ ५४<br><br>आरोहति रथं देवे ह्यश्वा हरभरातुराः।<br>जानुभिः पतिता भूमौ रजोग्रासश्च ग्रासितः॥ ५५<br><br>देवो दृष्ट्वाथ वेदांस्तानभीरुग्रहयान् भयात्।<br>उज्जहार पितॄनार्तान् सुपुत्र इव दुःखितान्॥ ५६<br><br>ततः सिंहरवो भूयो बभूव रथभैरवः।<br>जयशब्दश्च देवानां सम्बभूवार्णवोपमः॥ ५७इस प्रकार देवगण दिव्य प्रभावसे उस दिव्य रथका निर्माण कर लोकाधिपति शङ्करके निकट जाकर इस प्रकार बोले—'दानवरूप शत्रुओंके विजेता भगवन्! हमलोगोंने आपके लिये इस रथकी रचना की है। यह इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंकी आपत्तिसे रक्षा करेगा। सुमेरुगिरिके शिखरके समान उस उत्तम त्रैलोक्यरथको देखकर भगवान् शङ्करने उसकी प्रशंसा करके देवताओंकी प्रशंसा की और पुनः उस रथका निरीक्षण करने लगे। वे बार-बार रथके प्रत्येक भागको देखते और बार-बार उसकी प्रशंसा करते थे। तत्पश्चात् देवताओंके अधीश्वर स्वयं भगवान् शङ्करने इन्द्रसहित देवताओंसे कहा—'देवगण! आपलोगों ने जिस प्रकार मेरे लिये रथकी सारी सामग्रियोंसे युक्त इस रथका निर्माण किया है, इसीकी मर्यादाके अनुकूल शीघ्र ही किसी सारथिका भी विधान कीजिये।' देवाधिदेव शङ्करके ऐसा कहनेपर देवगण ऐसे व्याकुल हो गये, मानो वे बाणोंसे बींध दिये गये हों। उन्हें बड़ी चिन्ता हुई। वे कहने लगे कि अब क्या किया जाय। भला, चक्रधारी भगवान् विष्णुके अतिरिक्त दूसरा कौन देवता महादेवजीके सदृश हो सकता है, किंतु वे तो उनके बाणपर स्थित हो चुके हैं। यह सोचकर जैसे गाड़ीमें जुते हुए बैल पर्वतोंसे टकरा जानेपर हाँफने लगते हैं, वैसे ही सभी देवता लम्बी साँस लेने लगे और कहने लगे कि यह कार्य कैसे सिद्ध होगा? इतनेमें ही उन देवताओंके बीच देवदेव अग्रज ब्रह्मा बोल उठे—'सारथि मैं होऊँगा' ऐसा कहकर उन्होंने लोकनाथ शङ्करके रथमें जुते हुए घोड़ोंकी बागडोर पकड़ ली। उस समय ब्रह्माको हाथमें चाबुक लिये हुए सारथिके स्थानपर स्थित देखकर गन्धर्वोंसहित देवताओंने महान् सिंहनाद किया। तदनन्तर पितामह ब्रह्माको रथपर स्थित देखकर विश्वेश्वर भगवान् शङ्कर 'उपयुक्त सारथि मिला' ऐसा कहकर रथपर आरूढ़ हुए। भगवान् शंकरके रथपर चढ़ते ही घोड़े उनके भारसे व्याकुल हो गये। वे घुटनोंके बल पृथ्वीपर गिर पड़े और उनके मुखमें धूल भर गयी। इस प्रकार जब शङ्करजीने देखा कि अश्वरूपधारी वेद भयवश भूमिपर गिर पड़े हैं, तब उन्होंने उन्हें उसी प्रकार उठाया, जैसे सुपुत्र आर्त एवं दुःखी पितरोंका उद्धार करता है। तत्पश्चात् रथकी भयंकर घरघराहटके साथ सिंहनाद होने लगा। देवगण समुद्रकी गर्जनाके समान जय-जयकार करने लगे॥ ४४-५७ ॥