मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
पृष्ठ 482, कुल 1098 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 482
४७२ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तदोङ्कारमयं गृह्य प्रतोदं वरदः प्रभुः।<br>स्वयम्भूः प्रययौ वाहनानुमन्त्र्य यथाजवम्॥ ५८ | तदनन्तर सामर्थ्यशाली वरदायक ब्रह्मा ओंकारमय चाबुकको हाथमें लेकर घोड़ोंको पुचकारते हुए पूर्ण वेगसे आगे बढ़े। |
| ग्रसमाना इवाकाशं मुष्णन्त इव मेदिनीम्<br>मुखेभ्यः ससृजुः श्वासानुच्छ्वसन्त इवोरगाः॥ ५९<br>स्वयम्भुवा चोद्यमानाश्चोदितेन कपर्दिना।<br>व्रजन्ति तेऽश्वा जवनाः क्षयकाल इवानिलाः॥ ६० | फिर तो वे घोड़े पृथ्वीको अपने साथ समेटते तथा आकाशको ग्रसते हुएकी तरह बड़े वेगसे दौड़ने लगे। उनके मुखोंसे ऐसे दीर्घ निःश्वास निकल रहे थे, मानो फुफकारते हुए सर्प हों। शङ्करजीकी प्रेरणासे ब्रह्माद्वारा हाँके जाते हुए वे घोड़े प्रलयकालिक वायुकी तरह अत्यन्त वेगसे दौड़ रहे थे। |
| ध्वजोच्छ्रयविनिर्माणे ध्वजयष्टिममुत्तमाम्।<br>आक्रम्य नन्दीवृषभस्तस्थौ तस्मिञ्छिवेच्छया॥ ६१ | शिवजीकी इच्छासे उस रथमें ध्वजको ऊँचा उठानेमें निपुण नन्दी वृषभ उस अनुपम ध्वजयष्टिके ऊपर स्थित हुए। |
| भार्गवाङ्गिरसौ देवौ दण्डहस्तौ रविप्रभौ।<br>रथचक्रे तु रक्षेते रुद्रस्य प्रियकाङ्क्षिणौ॥ ६२ | सूर्यके समान प्रभावशाली शुक्र और बृहस्पति—ये दोनों देवता हाथमें दण्ड धारण करके रुद्रका प्रिय करनेकी इच्छासे रथके पहियोंकी रक्षा कर रहे थे। |
| शेषश्च भगवान् नागोऽनन्तोऽनन्तकरोऽरिणाम्।<br>शरहस्तो रथं पाति शयनं ब्रह्मणस्तदा॥ ६३ | उस समय शत्रुओंका समूल विनाश करनेवाले अनन्त भगवान् शेषनाग हाथमें बाण धारण कर रथकी तथा ब्रह्माके आसनकी रक्षामें जुटे हुए थे। |
| यमस्तूर्णं समास्थाय महिषं चातिदारुणम्।<br>द्रविणाधिपतिर्व्यालं सुराणामधिपो द्विपम्॥ ६४ | यमराज तुरंत अपने अत्यन्त भयंकर भैंसेपर, कुबेर साँपपर और देवराज इन्द्र ऐरावत हाथीपर चढ़कर आगे बढ़े। |
| मयूरं शतचन्द्रं च कूजन्तं किन्नरं यथा।<br>गुह आस्थाय वरदो जुगोप तं रथं पितुः॥ ६५ | वरदायक गुह कार्तिकेय सैकड़ों चन्द्रवाले तथा किंनरकी भाँति कूजते हुए अपने मयूरपर सवार होकर पिताके उस रथकी रक्षा कर रहे थे। |
| नन्दीश्वरश्च भगवान्छूलमादाय दीप्तिमान्।<br>पृष्ठतश्चापि पार्श्वाभ्यां लोकस्य क्षयकृद् यथा॥ ६६ | तेजस्वी भगवान् नन्दीश्वर शूल लेकर रथके पीछेसे दोनों पार्श्वभागोंकी रक्षा करते थे। उस समय वे ऐसा प्रतीत होते थे, मानो लोकका विनाश कर देना चाहते हों। |
| प्रमथाश्चाग्निवर्णाभाः साग्निज्वाला इवाचलाः।<br>अनुजग्मू रथं शार्वं नक्रा इव महार्णवम्॥ ६७ | अग्निके समान कान्तिमान् प्रमथगण, जो अग्निकी लपटोंसे युक्त पर्वत-सदृश दीख रहे थे, शङ्करजीके रथके पीछे चलते हुए ऐसे लगते थे जैसे महासागरमें नाकगण तैर रहे हों। |
| भृगुर्भरद्वाजवसिष्ठगौतमाः<br>क्रतुः पुलस्त्यः पुलहस्तपोधनाः।<br>मरीचिरत्रिर्भगवानथाङ्गिराः<br>पराशरागस्त्यमुखा महर्षयः॥ ६८<br>हरमजितमजं प्रतुष्टुवुर्वचन-<br>विशेषैर्विचित्रभूषणैः।<br>रथस्त्रिपुरे सकाञ्चनाचलो<br>व्रजति सपक्ष इवाद्रिरम्बरे॥ ६९ | भृगु, भरद्वाज, वसिष्ठ, गौतम, क्रतु, पुलस्त्य, पुलह, मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पराशर, अगस्त्य—ये सभी तपस्वी एवं ऐश्वर्यशाली महर्षि विचित्र छन्दानलंकारोंसे विभूषित उत्कृष्ट वचनोंद्वारा अजन्मा एवं अजेय शङ्करकी स्तुति कर रहे थे। सुमेरुगिरिके सहयोगसे सम्पन्न हुआ वह रथ आकाशमें विचरनेवाले पंखधारी पर्वतकी तरह त्रिपुरकी ओर बढ़ रहा था। |
| करिगिरिरविमेघसंनिभाः<br>सजलपयोदनिनादनादिनः।<br>प्रमथगणाः परिवार्य देवगुप्तं<br>रथमभितः प्रययुः स्वदर्पयुक्ताः॥ ७० | हाथी, पर्वत, सूर्य और मेघके समान कान्तिवाले प्रमथगण जलधर बादलकी भाँति गर्जना करते हुए बड़े गर्वके साथ देवताओंद्वारा सब ओरसे सुरक्षित उस रथके पीछे-पीछे चल रहे थे। |