मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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४७४ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| औत्पातिकं पुरेऽस्माकं यथा नान्यत्र कुत्रचित्।<br>वर्तते वर्तमानज्ञ वद त्वं हि च नारद॥ १०<br>दृश्यन्ते भयदाः स्वप्ना भज्यन्ते च ध्वजाः परम्।<br>विना च वायुना केतुः पतते च तथा भुवि॥ ११<br>अट्टालकाश्च नृत्यन्ते सपताकाः सगोपुराः।<br>हिंस हिंसेति श्रूयन्ते गिरश्च भयदाः पुरे॥ १२<br>नाहं बिभेमि देवानां सेन्द्राणामपि नारद।<br>मुक्त्वैकं वरदं स्थाणुं भक्ताभयकरं हरम्॥ १३<br>भगवन् नास्त्यविदितमुत्पातेषु तवानघ।<br>अनागतमतीतं च भवाञ्जानाति तत्त्वतः॥ १४<br>तदेतन्मे भयस्थानमुत्पाताभिनिवेदितम्।<br>कथयस्व मुनिश्रेष्ठ प्रपन्नस्य तु नारद॥ १५<br>इत्युक्तो नारदस्तेन मयेनामयवर्जितः॥ १६ | मयने नारदजीसे कहा—'नारदजी! आप तो (भूत-भव्य और) वर्तमानकी सारी बातोंके ज्ञाता हैं, अतः आप यह बतलाइये कि हमारे पुरमें जैसा उत्पात हो रहा है, वैसा सम्भवतः अन्यत्र कहीं भी नहीं होता होगा। (ऐसा क्यों हो रहा है?) यहाँ भयदायक स्वप्न दीख पड़ते हैं। ध्वजाएँ अकस्मात् टूटकर गिर रही हैं। वायुका स्पर्श न होनेपर भी पताकाएँ पृथ्वीपर गिर रही हैं। पताकाओं और फाटकोंसहित अट्टालिकाएँ नाचती-सी (काँपती-सी) दीखती हैं। नगरमें 'मार डालो, मार डालो' ऐसे भयावने शब्द सुननेमें आ रहे हैं। (इतना होनेपर भी) नारदजी! भक्तोंको अभय प्रदान करनेवाले स्थाणुस्वरूप वरदायक एकमात्र शङ्करजीको छोड़कर मुझे इन्द्रसहित समस्त देवताओंसे भी कुछ भय नहीं है। निष्पाप भगवन्! इन उपद्रवोंके विषयमें आपसे कुछ छिपा तो है नहीं; क्योंकि आप तो (पूर्वोक्त वर्तमानके अतिरिक्त) भूत और भविष्यके भी यथार्थ ज्ञाता हैं। मुनिश्रेष्ठ! ये उत्पात हमलोगोंके लिये भयके स्थान बन गये हैं, जिन्हें मैंने आपसे निवेदित कर दिया है। नारदजी! मैं आपके शरणागत हूँ, कृपया इसका कारण बतलाइये।' इस प्रकार मयदानवने अविनाशी नारदजीसे प्रार्थना की॥ १०–१६॥ |
| नारद उवाच<br><br>शृणु दानव तत्त्वेन भवन्त्यौत्पातिका यथा।<br>धर्मेति धारणे धातुर्माहात्म्ये चैव पठ्यते।<br>धारणाच्च महत्त्वेन धर्म एष निरुच्यते॥ १७<br>स इष्टप्रापको धर्म आचार्यैरुपदिश्यते।<br>इतरश्चानिष्टफलं आचार्यैर्नोपदिश्यते॥ १८<br>उत्पथान्मार्गमागच्छेन्मार्गाच्चैव विमार्गताम्।<br>विनाशस्तस्य निर्देश्य इति वेदविदो विदुः॥ १९<br>स ह्यधर्म रथारूढः सहैभिर्मत्तदानवैः।<br>अपकारिषु देवानां कुरुषे त्वं सहायताम्॥ २०<br>तदेतान्येवमादीनि उत्पातावेदितानि च।<br>वैनाशिकानि दृश्यन्ते दानवानां तथैव च॥ २१<br>एष रुद्रः समास्थाय महालोकमयं रथम्।<br>आयाति त्रिपुरं हन्तुं मय त्वामसुरानपि॥ २२ | (तब) नारदजी बोले—दानवराज! जिस कारण ये उत्पात हो रहे हैं, उन्हें यथार्थरूपसे बतला रहा हूँ, सुनो! 'धृ' धातु धारण-पोषण और महत्त्वके अर्थमें प्रयुक्त होती है। इसी धातुसे धर्म शब्द निष्पन्न हुआ है, अतः महत्त्वपूर्वक धारण करनेसे यह शब्द धर्म कहलाता है। आचार्यगण इष्टकी प्राप्ति करानेवाले इसी धर्मका उपदेश करते हैं। इसके विपरीत अधर्म अनिष्ट फल देनेवाला है, अतः आचार्यगण उसे ग्रहण करनेका आदेश नहीं देते। वेदज्ञोंका कथन है कि मनुष्यको उन्मार्गसे सुमार्गपर आना चाहिये; क्योंकि जो सुमार्गसे उन्मार्गपर चलते हैं, उनका विनाश तो निश्चित ही है। तुम इन उन्मत्त दानवोंके साथ महान् अधर्मके रथपर आरूढ़ होकर देवताओंका अपकार करनेवालोंकी सहायता करते हो। इसलिये इन सभी उत्पातोंद्वारा सूचित अपशकुन दानवोंके विनाशके सूचक हैं। मय! भगवान् रुद्र महालोकमय रथपर सवार होकर त्रिपुरका, तुम्हारा और समस्त असुरोंका भी विनाश करनेके लिये आ रहे हैं। |