भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 485, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 485
* अध्याय १३४ *४७५

| स त्वं महौजसं नित्यं प्रपद्यस्व महेश्वरम्।<br>यास्यसे सह पुत्रेण दानवैः सह मानद॥ २३<br>इत्येवमावेद्य भयं दानवोपस्थितं महत्।<br>दानवानां पुनर्देवो देवेशपद्मागतः॥ २४ | इसलिये मानद! (तुम्हारे लिये यही अच्छा होगा कि) तुम महान् ओजस्वी एवं अविनाशी महेश्वरकी शरण ग्रहण कर लो, अन्यथा तुम पुत्रों और दानवोंके साथ यमलोकके पथिक बन जाओगे। इस प्रकार देवर्षि नारद दानवोंको उनके ऊपर आये हुए महान् भयकी सूचना देकर पुनः देवेश्वर शङ्करजीके पास लौट आये॥ १७—२४॥ | | नारदे तु मुनौ याते मयो दानवनायकः।<br>शूरसम्मतमित्येवं दानवानाह दानवः॥ २५<br>शूराः स्थ जातपुत्राः स्थ कृतकृत्याः स्थ दानवाः।<br>युध्यध्वं दैवतैः सार्धं कर्त्तव्यं चापि नो भयम्॥ २६<br>जित्वा वयं भविष्यामः सर्वेऽमरसभासदः।<br>देवांश्च सेन्द्रकान् हत्वा लोकान् भोक्ष्यामहेऽसुराः॥ २७<br>अट्टालकेषु च तथा तिष्ठध्वं शस्त्रपाणयः।<br>दंशिता युद्धसज्जाश्च तिष्ठध्वं प्रोद्यतायुधाः॥ २८<br>पुराणि त्रीणि चैतानि यथास्थानेषु दानवाः।<br>तिष्ठध्वं लङ्घनीयानि भविष्यन्ति पुराणि च॥ २९<br>नभोगतास्तथा शूरा देवता विदिता हि वः।<br>ताः प्रयत्नेन वार्याश्च विदार्याश्चैव सायकैः॥ ३०<br>इति दनुतनयानम्यस्तथोक्त्वा<br>सुरगणवारणवारणे वचांसि।<br>युवतिजनविषण्णमानसं तत्-<br>त्रिपुरपुरं सहसा विवेश राजा॥ ३१<br>अथ रजतविशुद्धभावभावो<br>भवमभिपूज्य दिगम्बरं सुगीर्भिः।<br>शरणमुपजगाम देवदेवं<br>मदनार्यन्धकयज्ञदेहघातम् ॥ ३२<br>मयमभयपदैषिणं प्रपन्नं<br>न किल बुबोध तृतीयदीप्तनेत्रः।<br>तदभिमतमदात् ततः शशाङ्की<br>स च किल निर्भय एव दानवोऽभूत्॥ ३३ | इधर नारद मुनिके चले जानेपर दानवराज मयदानवने (वहाँ उपस्थित) सभी दानवोंसे इस प्रकार शूरसम्मत वचन कहना आरम्भ किया—'दानवो! तुमलोग शूर-वीर हो, पुत्रवान् हो और (जीवनमें सुखका उपभोग करके) कृतकृत्य हो चुके हो, अतः देवताओंके साथ डटकर युद्ध करो। इसमें तुमलोगोंको किसी प्रकारका भय नहीं मानना चाहिये। असुरो! देवताओंको जीतकर हमलोग देवसभाके सभासद हो जायेंगे, अर्थात् देवसभा अपने अधिकारमें आ जायगी। तब इन्द्रसहित देवताओंका वध करके हमलोग लोकोंका उपभोग करेंगे। तुमलोग युद्धकी साज-सज्जासे विभूषित हो कवच धारण कर लो और हथियार लेकर तैयार हो जाओ तथा हाथमें शस्त्र धारण कर अट्टालिकाओंपर चढ़ जाओ। दानवो! तुमलोग इन तीनों पुरोंपर यथास्थान (सजग होकर) बैठ जाओ; क्योंकि देवगण इन तीनों पुरोंपर आक्रमण करेंगे। शूरवीरो! यदि देवता आकाशमार्गसे धावा करें तो तुमलोग तो उन्हें पहचानते ही हो, तुरंत उन्हें प्रयत्नपूर्वक रोक दो और बाणोंके प्रहारसे विदीर्ण कर दो।' इस प्रकार दानवराज मय दनु-पुत्रोंसे सुरगणरूपी हाथियोंको रोकनेके लिये बातें बताकर सहसा उस त्रिपुर-पुरमें प्रविष्ट हुआ, जहाँकी स्त्रियोंका मन भयके कारण उद्विग्न हो उठा था। तदनन्तर वह चाँदीके समान निर्मल भावसे भावित होकर सुन्दर वाणीद्वारा दिगम्बर भगवान् शङ्करकी पूजा कर उन कामदेवके शत्रु तथा अन्धक और दक्ष-यज्ञके विनाशक देवदेवेश्वरकी शरणमें गया। यद्यपि शङ्करजीके तृतीय नेत्रमें उद्दीप्त अग्निका वास है, तथापि उन चन्द्रशेखरके ध्यानमें यह बात न आयी कि यह मयदानव शरणागत होकर अभयपद प्राप्त करना चाहता है, अतः उन्होंने उसे अभीष्ट वरदान दे दिया, जिससे वह दानव निर्भय हो गया और आगसे भी सुरक्षित रहकर जीवित बच गया॥२५—३३॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे त्रिपुरदाहे नारदागमनं नाम चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १३४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरदाह-प्रसङ्गमें नारदागमन नामक एक सौ चौंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १३४॥

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