भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४७६ * मत्स्यपुराण *


एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय

शङ्करजीकी आज्ञासे इन्द्रका त्रिपुरपर आक्रमण, दोनों सेनाओंमें भीषण संग्राम, विद्युन्मालीका वध, देवताओंकी विजय और दानवोंका युद्ध-विमुख होकर त्रिपुरमें प्रवेश

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—ऋषियो! तदनन्तर नारदजी त्रिपुरसे लौटकर पुनः युद्धस्थलमें देवताओंकी सेनामें सम्मिलित हो गये। वे स्वयं देव-सभामें उपस्थित हुए। इलावृत्त नामसे विख्यात विस्तृत वर्ष, जहाँ बलिकायज्ञ सम्पन्न हुआ था तथा जहाँ बलि बाँधे गये थे, तीनों लोकोंमें देवताओंकी जन्मभूमिके रूपमें प्रसिद्ध है। उसी इलावृत्तमें देवताओंके जातकर्म आदि संस्कार तथा यज्ञ और कन्यादान आदि कर्म सम्पन्न हुए हैं। यहाँ भगवान् शङ्कर अपने पार्षदगणोंको साथ लेकर नित्य विहार करते हैं। यहाँ लोकपालगण मेरुगिरिकी तरह सदा निवास करते हैं। इसी स्थानपर जिनके नेत्र मधुके समान पीले रंगके हैं तथा जो द्वितीयाके चन्द्रमाको भूषणरूपमें धारण करते हैं, उन्हीं भगवान् महेश्वरने देवराज इन्द्र और अपने गणेश्वरोंसे इस प्रकार कहा—'इन्द्र! तुम्हारे शत्रुओंका यह त्रिपुर दिखायी पड़ रहा है। यह विमानों, पताकाओं और ध्वजोंसे सुशोभित है। यह सुदृढ़ है तथा इसके विषयमें ऐसी प्रसिद्धि है कि यह अग्निकी तरह अत्यन्त तापदायक है। इसके निवासी दानव किरीट-कुण्डल धारण किये उन्हीं पर्वतके समान दीख रहे हैं। इन दानवोंकी अङ्ग-कान्ति बादलकी-सी है और इनके मुख टेढ़े-मेढ़े हैं। ये सभी परकोटों, फाटकों और अट्टालिकाओंपर तथा कक्षान्तमें स्थित हैं। (वह देखो) वे सभी दैत्य विजयकी अभिलाषासे हथियारोंसे सुसज्जित हो नगरसे बाहर निकल रहे हैं। इसलिये तुम सहायकोंसहित अपना श्रेष्ठ अस्त्र वज्र लेकर सैकड़ों देवताओं तथा मेरे भृत्योंके साथ आगे बढ़कर इन महासुरोंका संहार करो। मैं इस श्रेष्ठ रथपर निश्चल पर्वतकी तरह स्थित रहकर तुमलोगोंकी विजयके लिये त्रिपुरके सम्मुख उसके छिद्रकी खोजमें खड़ा रहूँगा। वासव! जब पुष्य-नक्षत्रके योगके साथ ये तीनों पुर एक स्थानपर स्थित होंगे, तब मैं एक ही बाणसे इन्हें दग्ध कर डालूँगा'॥ १—१२॥
ततो रणे देवबलं नारदोऽभ्यगमत् पुनः।<br>आगत्य चैव त्रिपुरात् सभायामास्थितः स्वयं॥ १<br>इलावृतमिति ख्यातं तद्वर्षं विस्तृतायतम्।<br>यत्र यज्ञो बलेर्वृत्तो बलिर्यत्र च संयतः॥ २<br>देवानां जन्मभूमिर्या त्रिषु लोकेषु विश्रुता।<br>विवाहाः क्रतवश्चैव जातकर्मादिकाः क्रियाः॥ ३<br>देवानां यत्र वृत्तानि कन्यादानानि यानि च।<br>रेमे नित्यं भवो यत्र सहायैः पार्षदैर्गणैः॥ ४<br>लोकपालाः सदा यत्र तस्थुर्मेरुगिरौ यथा।<br>मधुपिङ्गलनेत्रस्तु चन्द्रावयवभूषणः।<br>देवानामधिपं प्राह गणपांश्च महेश्वरः॥ ५<br>वासवैतदरीणां ते त्रिपुरं परिदृश्यते।<br>विमानैश्च पताकाभिर्ध्वजैश्च समलङ्कृतम्॥ ६<br>इदं वृत्तमिदं ख्यातं वह्निवद् भृशतापनम्।<br>एते जना गिरिप्रख्याः सकुण्डलकिरीटिनः॥ ७<br>प्राकारगोपुराट्टेषु कक्षान्ते दानवाः स्थिताः।<br>इमे च तोयदाभासा दनुजा विकृताननाः॥ ८<br>निर्गच्छन्ति पुरो दैत्याः सायुधा विजयैषिणः॥ ९<br>स त्वं सुरशतैः सार्धं ससहायो वरायुधः।<br>सुहृद्भिर्मामकैर्भृत्यैर्व्यापादय महासुरान्॥ १०<br>अहं च रथवर्येण निश्चलाचलवत्स्थितः।<br>पुरः पुरस्य रन्ध्रार्थी स्थास्यामि विजयाय वः॥ ११<br>यदा तु पुष्ययोगेने एकत्वं स्थास्यते परम्।<br>तदेतन्निर्धहिष्यामि शरेणैकेन वासव॥ १२