भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

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पृष्ठ 487
* अध्याय १३५ *४७७
SanskritHindi
इत्युक्तो वै भगवता रुद्रेणेह सुरेश्वरः।<br>ययौ तत्त्रिपुरं जेतुं तेन सैन्येन संवृतः ॥ १३<br><br>प्रक्रान्तरथभीमैस्तैः सदेवैः पार्षदां गणैः।<br>कृतसिंहरवोपेतेरुद्गच्छद्भिरिवाम्बुदैः ॥ १४<br><br>तेन नादेन त्रिपुराद् दानवा युद्धलालसाः।<br>उत्पत्य दुद्रुवुश्चेलुः सायुधाः खे गणेश्वरान् ॥ १५<br><br>अन्ये पयोधररावाः पयोधरसमा बभुः।<br>ससिंहनादं वादित्रं वादयामासुरुद्धताः ॥ १६<br><br>देवानां सिंहनादश्च सर्वतूर्यरवो महान्।<br>ग्रस्तोऽभूद् दैत्यनादैश्च चन्द्रस्तोयधरैरिव ॥ १७<br><br>चन्द्रोदयात् समुद्भूतः पौर्णमास इवार्णवः।<br>त्रिपुरं प्रभवत् तद्वद् भीमरूपमहासुरैः ॥ १८<br><br>प्राकारेषु पुरे तत्र गोपुरेष्वपि चापरे।<br>अट्टालकान् समारुह्य केचिच्चलितवादिनः ॥ १९<br><br>स्वर्णमालाधराः शूराः प्रभासितवराम्बराः।<br>केचिन्नदन्ति दनुजास्तोयमत्ता इवाम्बुदाः ॥ २०<br><br>इतश्चेतश्च धावन्तः केचिदुद्धूतवाससः।<br>किमेतदिति पप्रच्छुरन्योऽन्यं गृहमाश्रिताः ॥ २१<br><br>किमेतन्नैनं जानामि ज्ञानमन्तर्हितं हि मे।<br>ज्ञास्यसेऽनन्तरेणेति कालो विस्तारतो महान् ॥ २२<br><br>सोऽप्यसौ पृथ्वीसारं सिंहश्च रथमास्थितः।<br>तिष्ठते त्रिपुरं पीड्य देहव्याधिरिवोच्छ्रितः ॥ २३<br><br>य एषोऽस्ति स एषोऽस्तु का चिन्ता सम्भ्रमे सति।<br>एहि ह्यायुधमादाय क्व मे पृच्छा भविष्यति ॥ २४<br><br>इति तेऽन्योन्यमाविद्धा उत्तरोत्तरभाषिणः।<br>आसाद्य पृच्छन्ति तदा दानवास्त्रिपुरालयाः ॥ २५<br><br>तारकाख्यपुरे दैत्यास्तारकाख्यपुरःसराः।<br>निर्गताः कुपितास्तूर्णं बिलादिव महोरगाः ॥ २६भगवान् रुद्रद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर देवराज इन्द्र उस विशाल सेनाके साथ उस त्रिपुरको जीतनेके लिये आगे बढ़े। चलते समय देवताओं और पार्षदगणोंके रथोंसे भीषण शब्द हो रहा था और वे सभी मेघकी गर्जनाके समान सिंहनाद कर रहे थे। उस शब्दको सुनकर दानवगण युद्धकी लालसासे अस्त्र लेकर त्रिपुरसे बाहर निकले और आकाशमें छलाँग मारते हुए गणेश्वरोंपर टूट पड़े। उनमें कुछ अन्य उद्दण्ड दानव, जो काले मेघके समान शोभा पा रहे थे, मेघकी तरह गर्जना कर रहे थे और सिंहनाद करते हुए बाजा बजा रहे थे। उस समय दैत्योंके सिंहनादसे देवताओंका सिंहनाद और सभी प्रकारके तुरही आदि बाजोंका महान् शब्द उसी प्रकार अभिभूत हो गया, जैसे बादलोंके बीच चन्द्रमा छिप जाते हैं। जैसे चन्द्रमाके उदय होनेपर पूर्णिमा तिथिको समुद्र वृद्धिंगत हो जाता है, वैसे ही उन भयंकर रूपवाले महान् असुरोंसे त्रिपुर उद्दीप्त हो उठा। उस पुरमें कुछ दानव परकोटोंपर तथा कुछ फाटकों और अट्टालिकाओंपर चढ़कर 'चलो, निकलो' ऐसा कहकर ललकार रहे थे। कुछ शूर-वीर दानव सुन्दर एवं श्रेष्ठ वस्त्र धारण किये हुए थे, उनके गलेमें स्वर्णकी जंजीर शोभा पा रही थी और वे जलसे भरे हुए बादलकी भाँति सिंहनाद कर रहे थे। कुछ वस्त्र फहराते हुए इधर-उधर दौड़ रहे थे और घरपर आकर परस्पर एक-दूसरेसे पूछ रहे थे—'यह क्या हो रहा है?' (दूसरा उत्तर देता था कि) 'क्या हो रहा है, यह तो मैं नहीं जानता; क्योंकि उसकी जानकारी मुझसे छिपी हुई है। कुछ समयके बाद तुम्हें भी ज्ञात हो जायगा। अभी तो बहुत समय शेष है। (देखो न) वहाँ पृथ्वीके सारभूत रथपर बैठा हुआ वह जो सिंह खड़ा है, वह त्रिपुरको उसी प्रकार पीड़ा दे रहा है, जैसे बढ़ी हुई व्याधि शरीरको कष्ट देती है। वह जो हो, सो रहे; ऐसे हलचलके उपस्थित होनेपर चिन्ता करना व्यर्थ है। अब हथियार लेकर मैदानमें आ जाओ, फिर मुझसे पूछनेकी आवश्यकता नहीं रह जायगी।' उसी समय त्रिपुरनिवासी दानव परस्पर एक-दूसरेको पकड़कर इसी प्रकार पूछते थे और परस्पर उत्तर-प्रत्युत्तर देते थे ॥ १३–२५ ॥<br><br>इधर तारकाक्षपुरके निवासी दैत्य क्रोधसे भरे हुए तारकाक्षको आगे करके तुरंत नगरसे उसी प्रकार बाहर निकले, मानो बिलसे विषधर सर्प निकल रहे हों।