मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| निर्यावन्तस्तु ते दैत्याः प्रमथाधिपयूथपैः।<br>निरुद्धा गजराजानो यथा केसरियूथपैः॥ २७<br><br>दर्पितानां ततश्चैषां दर्पितानामिवाग्निनाम्।<br>रूपाणि जज्वलुस्तेषामग्नीनामिव धम्यताम्॥ २८<br><br>ततो बृहन्ति चापानि भीमनादानि सर्वशः।<br>निकृष्य जघ्नुरन्योऽन्यमिषुभिः प्राणभोजनैः॥ २९<br><br>मार्जारमृगभीमास्यान् पार्षदान् विकृताननान्।<br>दृष्ट्वा दृष्ट्वा हसन्नुच्चैर्दानवा रूपसम्पदा॥ ३०<br><br>बाहुभिः परिघाकारैः कृष्यतां धनुषां शराः।<br>भटवर्मेषु विविशुस्तडागानीव पक्षिणः॥ ३१<br><br>मृताः स्थ क्व नु यास्यध्वं हनिष्यामो निवर्तताम्।<br>इत्येवं परुषाण्युक्त्वा दानवाः पार्षदर्षभान्॥ ३२<br><br>बिभिदुः सायकैस्तीक्ष्णैः सूर्यपादा इवाम्बुदान्।<br>प्रमथा अपि सिंहाक्षाः सिंहविक्रान्तविक्रमाः।<br>खण्डशैलशिलावृक्षैर्बिभिदुर्देत्यदानवान् ॥ ३३<br><br>अम्बुदैराकुलमिव हंसाकुलमिवाम्बरम्।<br>दानवाकुलमत्यर्थं तत्पुरं सकलं बभौ॥ ३४<br><br>विकृष्टचापा दैत्येन्द्राः सृजन्ति शरदुर्दिनम्।<br>इन्द्रचापाङ्कितोरस्का जलदा इव दुर्दिनम्॥ ३५<br><br>इषुभिस्ताड्यमानास्ते भूयो भूयो गणेश्वराः।<br>चक्रूस्ते देहनिर्यासं स्वर्णधातुमिवाचलाः॥ ३६<br><br>तेऽथ वृक्षशिलावज्रशूलपट्टिशपरश्वधैः।<br>चूर्ण्यन्तेऽभिहता दैत्याः काचाष्टङ्कहता इव॥ ३७<br><br>तारकाख्यो जयत्येष इति दैत्या अघोषयन्।<br>जयतीन्द्रश्च रुद्रश्च इत्येव च गणेश्वराः॥ ३८ | बाहर निकलकर उन दैत्योंने देवसेनापर धावा बोल दिया, परंतु प्रमथगणोंके यूथपतियोंने उन्हें ऐसा रोक दिया, जैसे सिंहसमूह गजराजोंके दलको स्तम्भित कर देते हैं। उन गर्वीले दानवोंका रूप तो यों ही (क्रोधके कारण) अग्निकी तरह उद्दीप्त हो उठा था, इधर रोक दिये जानेपर वे धौंकी जाती हुई आगकी तरह जल उठे। फिर तो सब ओर भयंकर सिंहनाद होने लगा। दानवगण बड़े-बड़े धनुषोंपर प्रत्यञ्चा चढ़ाकर प्राण-हरण करनेवाले बाणोंद्वारा एक-दूसरेपर प्रहार करने लगे। प्रमथगणोंमें किन्हींके मुख बिलाव और किन्हींके मृगके समान भयंकर थे तथा किन्हींके मुख टेढ़े-मेढ़े थे। उन्हें देख-देखकर ठहाका मारकर सौन्दर्यशाली दानव हँसने लगे। परिघकी-सी आकारवाली भुजाओंद्वारा खींचे जाते हुए धनुषोंसे छूटे हुए बाण योद्धाओंके कवचोंमें उसी प्रकार घुस जाते थे, जैसे पक्षी तालाबोंमें प्रवेश करते हैं। उस समय दानवगण पार्षदयूथपतियोंको ललकारकर कह रहे थे—'अरे! अब तो तुमलोग मरे ही हो। हमारे हाथोंसे छूटकर कहाँ जाओगे! लौट आओ। हमलोग तुम्हें मार डालेंगे।' ऐसी कठोर बातें कहकर वे अपने तीखे बाणोंसे उन्हें इस प्रकार विदीर्ण कर रहे थे, जैसे सूर्यकी किरणें बादलोंको भेदकर पार कर जाती हैं। उधरसे सिंहके समान पराक्रमी एवं सिंह-सदृश नेत्रोंवाले प्रमथगण भी शिलाओं, शिलाखण्डों और वृक्षोंके प्रहारसे दैत्यों और दानवोंको चूर्ण-सा कर दे रहे थे। उस समय बादलोंसे आच्छादित एवं हंसोंसे व्याप्त आकाशकी तरह वह सारा पुर दानवोंसे व्याप्त होकर अत्यन्त सुशोभित हो रहा था। जैसे इन्द्र-धनुषसे चिह्नित मध्यभागवाले बादल जलकी वृष्टि कर दुर्दिन (मेघाच्छन्न दिवस) उत्पन्न कर लेते हैं, उसी प्रकार दैत्येन्द्रगण अपने धनुषोंकी प्रत्यञ्चाको कानतक खींचकर बाणोंकी वर्षा कर अन्धकार उत्पन्न कर रहे थे। दानवोंके बाणोंसे बारम्बार घायल होनेके कारण गणेश्वरोंके शरीरोंसे रक्तकी धार बह रही थी, जो ऐसी प्रतीत होती थी, मानो पर्वतोंसे सुवर्णधातु निकल रही हो। उधर गणेश्वरोंद्वारा चलाये गये वृक्ष, शिला, वज्र, शूल, पट्टिश और कुठारके प्रहारसे दैत्यगण ऐसे चूर-चूर कर दिये जा रहे थे जैसे कुल्हाड़ी या छेनीके प्रहारसे काच छिन्न-भिन्न हो जाता है। उधर दैत्यगण 'यह देखो, तारकाक्ष जीत रहा है'—ऐसी घोषणा कर रहे थे। तभी इधरसे गणेश्वर सिंहनाद करते हुए बोल रहे थे—'देखो-देखो, इन्द्र और रुद्र विजयी हो रहे हैं'॥ २६–३८॥ |