भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 489
* अध्याय १३५ *४७९

| वारिता दारिता बाणैर्योधास्तस्मिन् बलोभये।<br>निःस्वनन्तोऽम्बुसमये जलगर्भा इवाम्बुदाः ॥ ३९<br>करैश्छिन्नैः शिरोभिश्च ध्वजैश्छत्रैश्च पाण्डुरैः ।<br>युद्धभूमिर्भयवती मांसशोणितपूरिता ॥ ४०<br>व्योम्नि चोत्प्लुत्य सहसा तालमात्रं वरायुधैः ।<br>दृढाहताः पतन पूर्वं दानवाः प्रमथास्तथा ॥ ४१<br>सिद्धाश्चाप्सरसश्चैव चारणाश्च नभोगताः ।<br>दृढप्रहारहर्षिताः साधु साध्विति चुक्रुशुः ॥ ४२<br>अनाहताश्च वियति देवदुन्दुभयस्तथा।<br>नदन्तो मेघशब्देन शरभा इव रोषिताः ॥ ४३<br>ते तस्मिंस्त्रिपुरे दैत्या नद्यः सिन्धुपताविव ।<br>विशन्ति क्रुद्धवदना वल्मीकमिव पन्नगाः ॥ ४४<br>तारकाख्यपुरे तस्मिन् सुराः शूराः समन्ततः ।<br>सशस्त्रा निपतन्ति स्म सपक्षा इव भूधराः ॥ ४५<br>योधयन्ति त्रिभागेन त्रिपुरे तु गणेश्वराः ।<br>विद्युन्माली मयश्चैव मग्नौ च द्रुमवद्रणे ॥ ४६<br>विद्युन्माली स दैत्येन्द्रो गिरीन्द्रसदृशद्युतिः ।<br>आदाय परिघं घोरं ताडयामास नन्दिनम् ॥ ४७<br>स नन्दी दानवेन्द्रेण परिघेण दृढाहतः ।<br>भ्रमते मधुनाऽव्यक्तः पुरा नारायणो यथा ॥ ४८ | उन दोनों सेनाओंमें बाणोंद्वारा रोके एवं घायल किये गये वीर इतने जोरसे सिंहनाद कर रहे थे जैसे वर्षाकालमें जलसे भरे हुए बादल गरजते हैं। कटे हुए हाथों, मस्तकों, पीले रंगकी पताकाओं और छत्रोंसे तथा मांस और रुधिरसे भरी हुई युद्धभूमि बड़ी भयावनी लग रही थी। दानव तथा प्रमथगण उत्तम अस्त्र धारण कर पहले तो सहसा ताड़-वृक्षकी ऊँचाई-बराबर आकाशमें उछल पड़ते थे और पुनः सुदृढ़रूपसे घायल होकर भूतलपर गिर पड़ते थे। गगनमण्डलमें स्थित सिद्ध, अप्सरा और चारणोंके समूह (दानवोंपर) सुदृढ़ प्रहार होनेसे हर्षित होकर 'ठीक है, ठीक है', ऐसा कहते हुए चिल्लाने लगते थे। उस समय आकाशमें देवताओंकी दुन्दुभियाँ बिना चोट किये ही बज रही थीं। उनसे मेघकी गर्जना तथा क्रुद्ध हुए शरभ (अष्टपदी)-की दहाड़के समान शब्द हो रहे थे। दैत्यगण उस त्रिपुरमें इस प्रकार प्रविष्ट हो रहे थे जैसे नदियाँ समुद्रमें और क्रुद्ध मुखवाले सर्प बिमवटमें प्रवेश करते हैं। इधर अस्त्रधारी, शूरवीर देवगण तारकाक्षके उस नगरके ऊपर चारों ओर इस प्रकार छाये हुए थे, मानो पंखधारी पर्वत मँडरा रहे हों। गणेश्वर त्रिपुरमें तीन भागोंमें विभक्त होकर युद्ध कर रहे थे। उस समय विद्युन्माली और मय—ये दोनों युद्धस्थलमें वृक्षकी भाँति डटे हुए थे। इसी बीच हिमालय-तुल्य कान्तिमान् दैत्येन्द्र विद्युन्मालीने अपना भयंकर परिघ उठाकर नन्दीपर प्रहार किया। दानवेन्द्रके उस परिघके आघातसे नन्दी विशेषरूपसे घायल हो गये और वे ऐसा चक्कर काटने लगे, जैसे पूर्वकालमें दैत्यराज मधुके प्रहारसे अव्यक्तस्वरूप भगवान् नारायण भ्रमित हो गये थे ॥ ३९–४८ ॥ | | नन्दीश्वरे गते तत्र गणपाः ख्यातविक्रमाः ।<br>दुद्रुवुर्जातसंरम्भा विद्युन्मालिनमासुरम् ॥ ४९<br>घण्टाकर्णः शङ्कुकर्णो महाकालश्च पार्षदाः ।<br>ततश्च सायकैः सर्वान् गणपान् गणपाकृतीन् ॥ ५०<br>भूयो भूयः स विव्याध गणेश्वरमहत्तमान् ।<br>भित्त्वा भित्त्वा रुरावोच्चैर्नभस्यम्बुधरो यथा ॥ ५१<br>तस्यारम्भितशब्देन नन्दी दिनकरप्रभः ।<br>संज्ञां लभ्य ततः सोऽपि विद्युन्मालिनमाद्रवत् ॥ ५२ | नन्दीश्वरके घायल होकर रणभूमिसे हट जानेपर विख्यातपराक्रमी घण्टाकर्ण, शङ्कुकर्ण और महाकाल आदि प्रधान पार्षदगण क्रुद्ध होकर एक साथ राक्षस विद्युन्मालीके ऊपर टूट पड़े। तब विद्युन्मालीने उन सभी गणेश्वरोंको जो गणेश-सदृश आकृतिवाले तथा गणेश्वरोंमें प्रधान थे, बाणोंद्वारा लगातार बींधना आरम्भ किया। वह उन्हें घायल करके इतने उच्च स्वरसे सिंहनाद करता था मानो आकाशमें बादल गरज रहे हों। उसके उस सिंहनादसे सूर्य-सरीखे प्रभाशाली नन्दीकी मूर्च्छा भंग हो गयी, तब वे भी विद्युन्मालीपर चढ़ धाये। |