भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४८० * मत्स्यपुराण *

रुद्रदत्तं तदा दीप्तं दीप्तानलसमप्रभम्।<br>वज्रं वज्रनिभाङ्गस्य दानवस्य ससर्ज ह॥ ५३<br>तन्नन्दिभुजनिर्मुक्तं मुक्ताफलविभूषितम्।<br>पपात वक्षसि तदा वज्रं दैत्यस्य भीषणम्॥ ५४<br>स वज्रनिहतो दैत्यो वज्रसंहननोपमः।<br>पपात वज्राभिहतः शक्रेणाद्रिरिवाहतः॥ ५५<br>दैत्येश्वरं विनिहतं नन्दिना कुलनन्दिना।<br>चुक्रुशुर्दानवाः प्रेक्ष्य दुद्रुवुश्च गणाधिपाः॥ ५६<br>दुःखामर्षितरोषास्ते विद्युन्मालिनि पातिते।<br>द्रुमशैलमहावृष्टिं पयोदाः ससृजुर्यथा॥ ५७<br>ते पीड्यमाना गुरुभिर्गिरिभिश्च गणेश्वराः।<br>कर्तव्यं न विदुः किंचिद्दुन्मद्याधार्मिका इव॥ ५८<br>ततोऽसुरवरः श्रीमांस्तारकाख्यः प्रतापवान्।<br>स तरूणां गिरीणां वै तुल्यरूपधरो बभौ॥ ५९<br>भिन्नोत्तमाङ्गा गणपा भिन्नपादाङ्किताननाः।<br>विरेजुर्भुजगा मन्त्रैर्वार्यमाणा यथा तथा॥ ६०<br>मयेन मायावीर्येण वध्यमाना गणेश्वराः।<br>भ्रमन्ति बहुशब्दालाः पञ्जरे शकुनो इव॥ ६१<br>तथासुरवरः श्रीमांस्तारकाख्यः प्रतापवान्।<br>ददाह च बलं सर्वं शुष्केन्धनमिवानलः॥ ६२<br>तारकाख्येण वार्यन्ते शरवर्षैस्तदा गणाः।<br>मयेन मायानिहतास्तारकाख्येण चेषुभिः॥ ६३<br>गणेशा विधुरा जाता जीर्णमूला यथा द्रुमाः॥ ६४<br>भूयः सम्पतते चाग्निर्गृहान् ग्राहान् भुजङ्गमान्।<br>गिरीन्द्रांश्च हरीन् व्याघ्रान् वृक्षान् सूमरवर्णकान्॥ ६५<br>शरभानष्टपादांश्च आपः पवनमेव च।<br>मयो मायाबलेनैव पातयत्येव शत्रुषु॥ ६६<br>ते तारकाक्षेण मयेन मायया<br>सम्मुह्यमाना विवशा गणेश्वराः।<br>न शक्नुवंस्ते मनसापि चेष्टितुं<br>यथेन्द्रियार्था मुनिनाभिसंयताः॥ ६७उस समय उन्होंने रुद्रद्वारा दिये गये एवं प्रज्वलित अग्निके समान प्रभावशाली चमकते हुए वज्रको वज्रतुल्य कठोर शरीरवाले दानवके ऊपर चला दिया। तब नन्दीके हाथसे छूटा हुआ मोतियोंसे विभूषित वह भयंकर वज्र विद्युन्मालीके वक्षःस्थलपर जा गिरा। फिर तो वज्रके समान ठोस शरीरवाला दैत्य विद्युन्माली उस वज्रसे आहत होकर उसी प्रकार धराशायी हो गया, मानो इन्द्रके प्रहारसे पर्वत गिर पड़ा हो। अपने कुल (वर्ग)-को आनन्दित करनेवाले नन्दीद्वारा दैत्यराज विद्युन्मालीको मारा गया देखकर दानवलोग चीत्कार करने लगे। तब गणेश्वरोंने उनपर धावा बोल दिया। विद्युन्मालीके मारे जानेपर दानव दुःख और अमर्षके कारण क्रोधसे भरे हुए थे। वे गणेश्वरोंने ऊपर बादलकी भाँति वृक्षों और पर्वतोंकी महान् वृष्टि करने लगे। विशाल पर्वतोंके प्रहारसे पीड़ित हुए सभी गणेश्वर ऐसे किंकर्तव्यविमूढ हो गये, जैसे अधार्मिक जन वन्दनीय गुरुजनोंके प्रति हो जाते हैं। तदनन्तर असुरनायक प्रतापी श्रीमान् तारकाक्ष वृक्षों एवं पर्वतोंके समान रूप धारण करके रणभूमिमें उपस्थित हुआ॥ ४९-६०॥<br><br>उस समय बहुतेरे गणेश्वरोंके मस्तक फट गये थे, किन्हींके पैर टूट गये थे और कुछके मुखोंपर घाव लगा था। वे सभी मन्त्रोंद्वारा रोके गये सर्पकी तरह शोभा पा रहे थे। मायावी मयद्वारा मारे जाते हुए गणेश्वर पिंजरेमें बंद पक्षीकी तरह अनेकों प्रकारका शब्द करते हुए चक्कर काट रहे थे। तत्पश्चात् असुरश्रेष्ठ प्रतापी श्रीमान् तारकाक्षने पार्षदोंकी सारी सेनाको उसी प्रकार जलाना प्रारम्भ किया, जैसे आग सूखे इन्धनको जला देती है। तारकाक्ष बाणोंकी वर्षा करके पार्षदगणोंको रोक देता था। इस प्रकार मयकी माया और तारकाक्षके बाणोंद्वारा गणेश्वर मारे जा रहे थे। वे पुरानी जड़वाले वृक्षोंकी तरह व्याकुल हो गये। पुनः मयने अपनी मायाके बलपर शत्रुओंके ऊपर अग्निकी वर्षा की तथा ग्रह, मकर, सर्प, विशाल पर्वत, सिंह, बाघ, वृक्ष, काले हिरन और आठ पैरोंवाले शरभों (गैंडों)-को भी गिराया, जलकी घनघोर वृष्टि की और झंझावातका भी प्रकोप उत्पन्न किया। इस प्रकार तारकाक्ष और मयकी मायासे मोहित होकर वे गणेश्वर मनसे भी चेष्टा करनेमें असमर्थ हो गये। वे ऐसे निरुद्ध हो गये जैसे मुनियोंद्वारा रोके गये इन्द्रियोंके विषय।