भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 491, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 491
* अध्याय १३५ *४८१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
महाजलाग्न्यादिसकुञ्जरोरगै-<br>र्हरीन्द्रव्याघ्रर्क्षतरक्षुराक्षसैः<br>विबाध्यमानास्तमसा विमोहिताः<br>समुद्रमध्येष्विव गाधकाङ्क्षिणः॥ ६८<br>सम्मर्द्यमानेषु गणेश्वरेषु<br>संनर्दमानेषु सुरेतरेषु।<br>ततः सुराणां प्रवराभिरक्षितं<br>रिपोर्बलं संविविशुः सहायुधाः॥ ६९<br>यमो गदास्त्रो वरुणश्च भास्कर-<br>स्तथा कुमारोऽमरकोटिसंयुतः ।<br>स्वयं च शक्रः सितनागवाहनः<br>कुलीशपाणिः सुरलोकपुङ्गवः ॥ ७०<br>स चोडुनाथः ससुतो दिवाकरः<br>स सान्तकस्त्र्यक्षपतिर्महाद्युतिः ।<br>एते रिपूणां प्रवराभिरक्षितं<br>तदा बलं संविविशुर्मदोद्धताः॥ ७१<br>यथा वनं दर्पितकुञ्जराधिपा<br>यथा नभः साम्बुधरं दिवाकरः।<br>यथा च सिंहैर्विजनेषु गोकुलं<br>तथा बलं तत्रिदशैर्भिद्रुतम् ॥ ७२<br>कृतप्रहारातुरदीनदानवं<br>ततस्त्वभज्यन्त बलं हि पार्षदाः।<br>स्वर्ज्योतिषां ज्योतिरिषोष्णवान् हरि-<br>र्यथा तमो घोरतरं नराणाम्॥ ७३<br>विशान्तयामास यथा सदैव<br>निशाकरः संचितशार्वरं तमः।<br>ततोऽपकृष्टे च तमः प्रभावे<br>ह्यस्त्रप्रभावे च विवर्धमाने ॥ ७४<br>दिग्लोकपालैर्गणनायकैश्च<br>कृतो महान् सिंहरवो मुहूर्तम्।<br>संख्ये विभग्ना विकरा विपादा-<br>श्छिन्नोत्तमाङ्गाः शरपूरिताङ्गाः॥ ७५<br>देवेतरा देववरैर्विभिन्नाः<br>सीदन्ति पङ्केषु यथा गजेन्द्राः।<br>वज्रेण भीमेन च वज्रपाणिः<br>शक्त्या च शक्त्या च मयूरकेतुः ॥ ७६उस समय प्रमथगण जल और अग्निकी महान् वृष्टि, हाथी, सर्प, सिंह, व्याघ्र, रीछ, चीते और राक्षसोंद्वारा सताये जा रहे थे। मायाका इतना घना अन्धकार प्रकट हुआ, जिसमें वे ऐसे विमोहित हो गये, जैसे समुद्रके मध्यमें जलकी थाह लगानेवाले विमूढ़ हो जाते हैं। इस प्रकार गणेश्वर पीड़ित किये जा रहे थे और दानवगण सिंहनाद कर रहे थे। इसी बीच प्रधान-प्रधान देवता अस्त्र धारणकर गणेश्वरोंकी रक्षा करनेके लिये शत्रुसेनामें प्रविष्ट हुए। उस अवसरपर गदाधारी यमराज, वरुण, भास्कर, एक करोड़ देवताओंके साथ कुमार कार्तिकेय, श्वेत हाथी ऐरावतपर सवार हो हाथमें वज्र लिये हुए स्वयं देवराज इन्द्र, चन्द्रमा और अपने पुत्र शनैश्चरके साथ सूर्य तथा अन्तकसहित परम तेजस्वी त्रिलोचन रुद्र—ये सभी मदोद्धत देवता उत्कृष्ट बलवानोंद्वारा सुरक्षित शत्रुओंकी सेनामें प्रविष्ट हुए। जिस प्रकार मतवाले गजेन्द्र वनमें, बादलोंसे घिरे हुए आकाशमें सूर्य और निर्जन स्थानमें स्थित गोष्ठमें सिंह प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार देवताओंने उस सेनापर धावा बोल दिया। फिर तो पार्षदगणोंने शस्त्रप्रहार करके दानवोंको ऐसा व्याकुल और दीन कर दिया कि उनका वह विशाल सेना-व्यूह उसी प्रकार छिन्न-भिन्न हो गया जैसे स्वर्गीय ज्योतिःपुञ्जोंके महान् ज्योति उष्णरश्मि सूर्य मनुष्योंके अन्धकारका विनाश कर देते हैं तथा चन्द्रमा रात्रिके घने अन्धकारका प्रशमन कर देते हैं॥ ६१—७३ १/२ ॥<br><br>तदनन्तर अन्धकारका प्रभाव नष्ट हो जाने और अस्त्रका प्रभाव बढ़नेपर दिक्पालों, लोकपालों और गणनायकोंने दो घड़ीतक महान् सिंहनाद किया। फिर तो वे युद्धमें दानवोंको विदीर्ण करने लगे। वहाँ किन्हींके हाथ कट गये तो किन्हींके पैर खण्डित हो गये, किन्हींके मस्तक कट गये तो किन्हींके शरीर बाणोंसे घिर गये। इस प्रकार देवश्रेष्ठोंद्वारा घायल किये गये दानव ऐसा कष्ट पा रहे थे, जैसे दलदलमें फँसे हुए गजराज विवश हो जाते हैं। उस समय वज्रपाणि इन्द्र अपने भयंकर वज्रसे, मयूरध्वज स्वामिकार्तिक शक्तिपूर्वक अपनी शक्तिसे,
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