भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४८२ * मत्स्यपुराण *


| दण्डेन चोग्रेण च धर्मराजः<br>पाशेन चोग्रेण च वारिगोप्ता।<br>शूलेन कालेन च यक्षराजो<br>वीर्येण तेजस्वितया सुकेशः॥ ७७<br>गणेश्वरास्ते सुरसंनिकाशाः<br>पूर्णाहुतीसिक्तशिखिप्रकाशाः ।<br>उत्सादयन्ते दनुपुत्रवृन्दान्<br>यथैव इन्द्राशनयः पतन्त्यः॥ ७८<br>मयस्तु देवान् परिरक्षितार-<br>मुमात्मजं देववरं कुमारम्।<br>शरेण भित्त्वा स हि तारकासुतं<br>स तारकाख्यासुरमभाषे॥ ७९<br>कृत्वा प्रहारं प्रविशामि वीरं<br>पुरं हि दैत्येन्द्र बलेन युक्तः।<br>विश्राममूर्जस्करमप्यवाप्य<br>पुनः करिष्यामि रणं प्रपन्नैः॥ ८०<br>वयं हि शस्त्रक्षतविक्षताङ्गा<br>विशीर्णशस्त्रध्वजवर्मवाहाः ।<br>जयैषिणस्ते जयकाशिनश्च<br>गणेश्वरा लोकवराधिपाश्च॥ ८१<br>मयस्य श्रुत्वा दिवि तारकाख्यो<br>वचोऽभिकाङ्क्षन् क्षतजोपमाक्षः।<br>विवेश तूर्णं त्रिपुरं दितेः सुतैः<br>सुतैरदित्या युधि वृद्धहर्षैः ॥ ८२<br>ततः सशङ्खानकभेरिभीमं<br>ससिंहनादं हरसैन्यमाभौ।<br>मयानुगं घोरगभीरगह्वरं<br>यथा हिमाद्रेर्गजसिंहनादितम्॥ ८३ | धर्मराज अपने भयंकर दण्डसे, वरुण अपने उग्र पाशसे और पराक्रम एवं तेजसे सम्पन्न सुन्दर बालोंवाले यक्षराज कुबेर अपने काल-सदृश शूलसे प्रहार कर रहे थे। देवताओंके समान तेजस्वी एवं पूर्णाहुतिसे सिक्त हुई अग्निके समान प्रकाशमान गणेश्वर दानववृन्दपर उसी प्रकार झपटते थे मानो बिजलियाँ गिर रही हों। तत्पश्चात् मयने देवताओंकी रक्षामें तत्पर पार्वती-नन्दन एवं तारका-पुत्र सर्वश्रेष्ठ कुमार कार्तिकेयको बाणसे घायल कर तारकाक्षसे कहा—'दैत्येन्द्र! हमलोगोंके शरीर शस्त्रोंके आघातसे क्षत-विक्षत हो गये हैं तथा हमारे शस्त्रास्त्र, ध्वज, कवच और वाहन आदि भी छिन्न-भिन्न हो गये हैं। इधर गणेश्वरों तथा लोकनायक देवोंके मनमें जयकी अभिलाषा विशेषरूपसे जागरूक हो उठी है, साथ ही वे विजयी भी हो रहे हैं, अतः अब मैं इस वीरपर प्रहार करके सेनासहित नगरमें प्रवेश कर जाता हूँ और वहाँ कुछ देर विश्राम कर शक्ति-सम्पन्न होकर पुनः अनुचरोंसहित युद्ध करूँगा।' मयकी ऐसी बात सुनकर उसका पालन करता हुआ रुधिर-सरीखे लाल नेत्रोंवाला तारकाक्ष तुरंत ही आकाशमार्गसे दिति-पुत्रोंके साथ त्रिपुरमें प्रवेश कर गया। उस समय देवगण रणभूमिमें हर्षके मारे उछल पड़े। फिर तो मयका पीछा करते हुए भगवान् शंकरके सैनिक विशेष शोभा पा रहे थे। उनके शङ्ख, नगाड़े और भेरियाँ बजने लगीं तथा वे सिंहनाद करने लगे। उस समय ऐसा भीषण शब्द हो रहा था मानो हिमालय पर्वतकी भयंकर एवं गहरी गुफामें गजराज और सिंह दहाड़ रहे हों ॥ ७४-८३ ॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे त्रिपुरदाहे इलावृते देवदानवयुद्धवर्णने प्रहारकृतं नाम पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १३५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरदाहप्रसङ्गमें इलावृतमें देव-दानव-युद्ध-प्रसङ्गमें परस्पर प्रहार नामक एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १३५॥