भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 493, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 493
* अध्याय १३६ *४८३

एक सौ छत्तीसवॉँ अध्याय

मयका चिन्तित होकर अद्भुत बावलीका निर्माण करना, नन्दिकेश्वर और तारकासुरका भीषण युद्ध तथा प्रमथगणोंकी मारसे विमुख होकर दानवोंका त्रिपुर-प्रवेश


सूत उवाच
मयः प्रहारं कृत्वा तु मायावी दानवर्षभः।<br>विवेश तूर्णं त्रिपुरमभ्रं नीलमिवाम्बरम्॥ १<br><br>स दीर्घमुष्णं निःश्वस्य दानवान् वीक्ष्य मध्यगान्।<br>दध्यौ लोकक्षये प्राप्ते कालं काल इवापरः॥ २<br><br>इन्द्रोऽपि बिभ्यते यस्य स्थितो युद्धेप्सुरग्रतः।<br>स चापि निधनं प्राप्तो विद्युन्माली महायशाः॥ ३<br><br>दुर्गं वै त्रिपुरस्यास्य न समं विद्यते पुरम्।<br>तस्याप्येषोऽनयः प्राप्तो नादुर्गं कारणं क्वचित्॥ ४<br><br>कालस्यैव वशे सर्वं दुर्गं दुर्गतरं च यत्।<br>काले क्रुद्धे कथं कालात्राणं नोऽद्य भविष्यति॥ ५<br><br>लोकेषु त्रिषु यत्किञ्चिद् बलं वै सर्वजन्तुषु।<br>कालस्य तद्वशं सर्वमिति पैतामहो विधिः॥ ६<br><br>अस्मिन् कः प्रभवेद् यो वै ह्यसंधार्येऽमितात्मनि।<br>लङ्घने कः समर्थः स्यादृते देवं महेश्वरम्॥ ७<br><br>बिभेमि नेन्द्राद्वि यमाद् वरुणान्न च वित्तपात्।<br>स्वामी चैषां तु देवानां दुर्जयः स महेश्वरः॥ ८<br><br>ऐश्वर्यस्य फलं यत्तत्प्रभुत्वस्य च समंततः।<br>तदद्य दर्शयिष्यामि यावद्वीराः समंततः॥ ९<br><br>वापीममृततोयेन पूर्णां स्रक्ष्ये वरौषधीः।<br>जीविष्यन्ति तदा दैत्याः संजीवनवरौषधैः॥ १०**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! दानवश्रेष्ठ मायावी मय स्वामिकार्तिकपर प्रहारकर त्रिपुरमें उसी प्रकार तुरंत प्रवेश कर गया, जैसे नीले आकाशमें बादल प्रविष्ट हो जाते हैं। वहाँ आकर उसने लम्बी और गरम साँस ली तथा त्रिपुरमें भागकर आये हुए दानवोंकी ओर देखकर लोकके विनाशके अवसरपर दूसरे कालके समान मय कालके विषयमें विचार करने लगा—'अहो! रणभूमिमें युद्धकी अभिलाषासे सम्मुख खड़ा हो जानेपर जिससे इन्द्र भी डरते थे वह महायशस्वी विद्युन्माली भी कालका ग्रास बन गया। त्रिलोकीमें इस त्रिपुरकी समतामें अन्य कोई दुर्ग अथवा पुर नहीं है, फिर भी इसपर भी ऐसी आपत्ति आ ही गयी, अतः (प्राणरक्षाके लिये) दुर्ग कोई कारण नहीं है। (इसलिये मैं तो ऐसा समझता हूँ कि) दुर्ग ही क्यों? दुर्गसे भी बढ़कर सभी वस्तुएँ कालके ही वशमें हैं। तब भला कालके कुपित हो जानेपर इस समय हमलोगोंकी कालसे रक्षा कैसे हो सकेगी? तीनों लोकों तथा समस्त प्राणियोंमें जो कुछ बल है, वह सारा-का-सारा कालके वशीभूत है—ऐसा ब्रह्माका विधान है। ऐसे अमित पराक्रमी एवं असाध्य कालके प्रति कौन-सा उद्योग सफल हो सकता है? भगवान् शंकरके अतिरिक्त उस कालपर विजय पानेमें कौन समर्थ हो सकता है? मैं इन्द्र, यम और वरुणसे नहीं डरता, कुबेरसे भी मुझे कोई भय नहीं है, किंतु इन देवताओंके स्वामी जो महेश्वर हैं, उनपर विजय पाना दुष्कर है। फिर भी जबतक ये दानववीर चारों ओर बिखरे हुए हैं, तबतक ऐश्वर्य-प्राप्तिका जो फल होता है तथा स्वामी बननेका जो फल होता है, उसे मैं प्रदर्शित करूँगा। मैं एक ऐसी बावलीका निर्माण करूँगा, जिसमें अमृतरूपी जल भरा होगा। साथ ही कुछ श्रेष्ठ ओषधियोंका भी आविष्कार करूँगा। उन श्रेष्ठ संजीवनी ओषधियोंके प्रयोगसे मरे हुए दैत्य जीवित हो जायेंगे'॥१—१०॥