भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४८४* मत्स्यपुराण *

| इति संचिन्त्य बलवान् मयो मायाविनां वरः।<br>मायया ससृजे वापीं रम्भामिव पितामहः॥ ११<br><br>द्वियोजनायतां दीर्घां पूर्णयोजनविस्तृताम्।<br>आरोहसंक्रमवतीं चित्ररूपां कथामिव॥ १२<br><br>इन्दोः किरणकल्पेन मृष्टेनामृतगन्धिना।<br>पूर्णां परमतोयेन गुणपूर्णामिवाङ्गनाम्॥ १३<br><br>उत्पलैः कुमुदैः पद्मैर्वृतां कादम्बकैस्तथा।<br>चन्द्रभास्करवर्णाभैर्भीमैरावरणेर्वृताम् ॥ १४<br><br>खगैर्मधुररावैश्च चारुचामीकरप्रभैः।<br>कामैषिभिरिवाकीर्णां जीवनाभरणीमिव॥ १५<br><br>संसृज्य स मयो वापीं गङ्गामिव महेश्वरः।<br>तस्यां प्रक्षालयामास विद्युन्मालिनमादितः॥ १६<br><br>स वाप्यां मज्जितो दैत्यो देवशत्रुर्महाबलः।<br>उत्तस्थाविन्धनैरिद्धः सद्यो हुत इवानलः॥ १७<br><br>मयस्य चाञ्जलिं कृत्वा तारकाख्योऽभिवादितः।<br>विद्युन्मालीति वचनं मयमुत्थाय चाब्रवीत्॥ १८<br><br>क्व नन्दी सह रुद्रेण वृतः प्रमथजम्बुकैः।<br>युध्यामोऽरीन् विनिष्पिष्य दयादेहेषु का हि नः॥ १९<br><br>अन्वास्यैव च रुद्रस्य भवामः प्र भविष्णवः।<br>तैर्वा विनिहता युद्धे भविष्यामो यमाशनाः॥ २०<br><br>विद्युन्मालेर्निशम्यैतन्मयो वचनमूर्जितम्।<br>तं परिष्वज्य सार्द्राक्ष इदमह महासुरः॥ २१<br><br>विद्युन्मालिन् न मे राज्यमभिप्रेतं न जीवितम्।<br>त्वया विना महाबाहो किमन्येन महासुर॥ २२<br><br>महामृतमयी वापी ह्येषा मायाभिरीश्वर।<br>सृष्टा दानवदैत्यानां हतानां जीववर्धिनी॥ २३<br><br>दिष्ट्या त्वां दैत्य पश्यामि यमलोकादिहागतम्।<br>दुर्गतावनयग्रस्तं भोक्ष्यामोऽद्य महानिधिम्॥ २४ | ऐसा विचारकर मायावियोंमें श्रेष्ठ बलवान् मयने एक (सुन्दर) बावलीकी रचना की, जैसे ब्रह्माजीने मायासे रम्भा अप्सराकी रचना कर डाली थी। वह (बावली) दो योजन लम्बी और एक योजन चौड़ी थी। उसमें चित्र-विचित्र प्रसङ्गोंवाली कथाकी भाँति क्रमशः चढ़ाव-उतारवाली सीढ़ियाँ बनी थीं। वह चन्द्रमाकी किरणोंके समान उज्ज्वल, अमृत-सदृश मधुर एवं सुगन्धित उत्तम जलसे भरी हुई ऐसी लग रही थी, मानो सम्पूर्ण सद्गुणोंसे पूर्ण कोई वनिता हो। उसमें नील कमल, कुमुदिनी और अनेकों प्रकारके कमल खिले हुए थे। वह चन्द्रमा और सूर्यके समान चमकीले रंगवाले भयंकर डैनोंसे युक्त कलहंसोंसे व्याप्त थी। उसमें सुन्दर सुनहली कान्तिवाले पक्षी मधुर शब्दोंमें कूज रहे थे। वह जलाभिलाषी जीवोंसे व्याप्त उन्हें प्राणदान करनेवालीकी तरह दीख रही थी। जैसे महेश्वरने (अपनी जटासे) गङ्गाको उत्पन्न किया था, उसी प्रकार मयने उस बावलीकी रचना कर उसके जलसे सर्वप्रथम विद्युन्मालीके शवको धोया। उस बावलीमें डुबोये जानेपर देवशत्रु महाबली दैत्य विद्युन्माली उसी प्रकार उठ खड़ा हुआ, जैसे इन्धन पड़नेसे हवन की गयी अग्नि तुरंत उद्दीप्त हो उठती है। उठते ही विद्युन्मालीने हाथ जोड़कर मय और तारकासुरका अभिवादन किया और मयसे इस प्रकार कहा—'प्रमथरूपी शृगालोंसे घिरा हुआ रुद्रके साथ नन्दी कहाँ खड़ा है? अब हमलोग शत्रुओंको पीसते हुए युद्ध करेंगे। हमलोगोंके शरीरमें दया कहाँ? हमलोग या तो रुद्रको खदेड़कर प्रभावशाली होंगे अथवा उनके द्वारा युद्धस्थलमें मारे जाकर यमराजके ग्रास बन जायँगे।' विद्युन्मालीके ऐसे उत्साहपूर्ण वचन सुनकर महासुर मयके नेत्रोंमें आँसू छलक आये। तब उसने विद्युन्मालीका आलिङ्गन कर इस प्रकार कहा—'महाबाहु विद्युन्माली! तुम्हारे बिना न तो मुझे राज्य अभीष्ट है, न जीवनकी ही अभिलाषा है। महासुर! अन्य पदार्थोंकी तो बात ही क्या है? ऐश्वर्यशाली वीर! मैंने मायाद्वारा अमृतसे भरी हुई इस बावलीकी रचना की है। यह मरे हुए दानवों और दैत्योंको जीवन-दान देगी। दैत्य! सौभाग्यवश (इसीके प्रभावसे) मैं तुम्हें यमलोकसे लौटा हुआ देख रहा हूँ। अब हमलोग आपत्तिके समय अन्यायसे अपहरण की हुई महानिधिका उपभोग करेंगे'॥११—२४॥ |