मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय १३६ * | ४८५ |
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| दृष्ट्वा दृष्ट्वा च तां वापीं मायया मयनिर्मिताम्।<br>हृष्टाननाक्षा दैत्येन्द्रा इदं वचनमब्रुवन्॥ २५<br>दानवा युध्यतेदानीं प्रमथैः सह निर्भयाः।<br>मयेन निर्मिता वापी हतान् संजीवयिष्यति॥ २६<br>ततः क्षुब्धाम्बुधिनिभा भेरी सा तु भयंकरी।<br>वाद्यमाना ननादोच्चै रौरवी सा पुनः पुनः॥ २७<br>श्रुत्वा भेरीरवं घोरं मेघारम्भितसंनिभम्।<br>न्यपतन्नसुरास्तूर्णं त्रिपुराद् युद्धलालसाः॥ २८<br>लोहरजतसौवर्णैः कटकैर्मणिराजितैः।<br>आमुक्तैः कुण्डलैर्हारैर्मुुकुटैरपि चोत्कटैः॥ २९<br>धूमायिता ह्यविरमा ज्वलन्त इव पावकाः।<br>आयुधानि समादाय काशिनो दृढविक्रमाः॥ ३०<br>नृत्यमाना इव नटा गर्जन्त इव तोयदाः।<br>करोच्छ्रया इव गजाः सिंहा इव च निर्भयाः॥ ३१<br>ह्रदा इव च गम्भीराः सूर्या इव प्रतापिताः।<br>द्रुमा इव च दैत्येन्द्रास्त्रासयन्तो बलं महत्॥ ३२<br>प्रमथा अपि सोत्साहा गरुडोत्पातपातिनः।<br>युयुत्सवोऽभिधावन्ति दानवान् दानवारयः॥ ३३<br>नन्दीश्वरेण प्रमथास्तारकाख्येन दानवाः।<br>चक्रुः संहत्य संग्रामं चोद्यमाना बलेन च॥ ३४<br>तेऽसिभिश्चन्द्रसंकाशैः शूलैश्चानलपिङ्गलैः।<br>बाणैश्च दृढनिर्मुक्तैरभिजघ्नुः परस्परम्॥ ३५<br>शराणां सृज्यमानानामसीनां च निपात्यताम्।<br>रूपाण्यासन् महोल्कानां पतन्तीनामिवाम्बरात्॥ ३६<br><br>शक्तिभिर्भिन्नहृदया निर्दया इव पातिताः।<br>निरयेष्विव निर्मग्नाः कूजन्ते प्रमथासुराः॥ ३७<br><br>हेमकुण्डलयुक्तानि किरीटोत्कटवन्ति च।<br>शिरांस्युर्व्यां पतन्ति स्म गिरिकूटा इवात्यये॥ ३८<br><br>परश्वधैः पट्टिशैश्च खड्गैश्च परिघैस्तथा।<br>छिन्नाः करिवराकारा निपेतुस्ते धरातले॥ ३९ | मायाके प्रभावसे मयद्वारा निर्मित उस बावलीको देख-देखकर दैत्येन्द्रोंके नेत्र और मुख हर्षके कारण उत्फुल्ल हो उठे थे। तब वे (दानवोंको ललकारते हुए) इस प्रकार बोले—'दानवो! अब तुमलोग निर्भय होकर प्रमथगणोंके साथ युद्ध करो। मयद्वारा निर्मित यह बावली मरे हुए तुमलोगोंको जीवित कर देगी।' फिर तो क्षुब्ध हुए सागरके समान भय उत्पन्न करनेवाली दानवोंकी भेरी बज उठी। वह बड़े जोरसे भयंकर शब्द कर रही थी। मेघकी गर्जनाके समान उस भयंकर भेरीके शब्दको सुनकर युद्धके लिये लालायित हुए असुरगण तुरंत ही त्रिपुरसे बाहर निकल पड़े। वे लोहे, चाँदी, सुवर्ण और मणियोंके बने हुए कड़े, कुण्डल, हार और उत्तम मुकुट धारण किये हुए थे। वे अनवरत जलते हुए धूमसे युक्त प्रज्वलित अग्निके समान दीख रहे थे। वे सुदृढ़ पराक्रमी दैत्य अपने-अपने अस्त्र लेकर (उछलते-कूदते हुए) ऐसे लग रहे थे, जैसे रंगमंचपर नाचते हुए नट हों। वे सूँड़ उठाये हुए हाथीके समान हाथ उठाकर और सिंह-सदृश निर्भय होकर बादलकी तरह गर्जना कर रहे थे। कुण्डके समान गम्भीर, सूर्यके सदृश तेजस्वी और वृक्षोंके-से धैर्यशाली दैत्येन्द्र प्रमथोंकी विशाल सेनाको पीड़ित करने लगे। तत्पश्चात् गरुड़की भाँति झपट्टा मारनेवाले दानव-शत्रु प्रमथगण भी उत्साहपूर्वक युद्ध करनेकी अभिलाषासे दानवोंपर टूट पड़े। उस समय नन्दीश्वरकी अध्यक्षतामें प्रमथगण और तारकासुरकी अध्यक्षतामें दानवयूथ समवेतरूपसे युद्ध करने लगे। उन्हें सेनाएँ भी प्रेरित कर रही थीं। वे चन्द्रमाके समान चमकीली तलवारों, अग्नि-सदृश पीले शूलों और सुदृढ़रूपसे छोड़े गये बाणोंसे परस्पर एक-दूसरेपर प्रहार कर रहे थे। उस समय छोड़े जाते हुए बाणों तथा प्रहार की जाती हुई तलवारोंके रूप ऐसे दीख रहे थे मानो आकाशसे गिरती हुई महोल्काएँ हों॥ २५—३६॥<br><br>शक्तिके आघातसे उनके हृदय छिन्न-भिन्न हो गये थे और वे दयाहीनकी भाँति भूमिपर पड़े हुए थे। इस प्रकार प्रमथगण तथा असुरवृन्द नरकमें पड़े हुए जीवोंकी तरह चीत्कार कर रहे थे। स्वर्णनिर्मित कुण्डलों और प्रभावशाली किरीटोंसे युक्त वीरोंके मस्तक प्रलयकालमें पर्वतशिखरकी भाँति पृथ्वीपर गिर रहे थे। वे कुठार, पट, खड्ग और लोहेकी गदाके आघातसे छिन्न-भिन्न होकर गजेन्द्रोंके समान धराशायी हो रहे थे। कभी |