मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| गर्जन्ति सहसा हृष्टाः प्रमथा भीमगर्जनाः।<br>साधयन्त्यपरे सिद्धास्त युद्धगान्धर्वमद्भुतम्॥ ४०<br><br>बलवान् भासि प्रमथ दर्पितो भासि दानव।<br>इति चोच्चारयन् वाचं चारणा रणधूर्गताः ॥ ४१<br><br>परिघैराहताः केचिद् दानवैः शङ्करानुगाः।<br>वमन्ते रुधिरं वक्त्रैः स्वर्णधातुमिवाचलाः ॥ ४२<br><br>प्रमथैरपि नाराचैरसुराः सुरशत्रवः।<br>द्रुमैश्च गिरिशृङ्गैश्च गाढमेवाहवे हताः ॥ ४३<br><br>सूदितानथ तान् दैत्यानन्ये दानवपुङ्गवाः।<br>उत्क्षिप्य चिक्षिपुर्वाप्यां मयदानवचोदिताः ॥ ४४<br><br>ते चापि भास्वरैर्देहः स्वर्गलोक इवामराः।<br>उत्तस्थुर्वापीमासाद्य सद्रूपाभरणाम्बराः ॥ ४५<br><br>अथैके दानवाः प्राप्य वापीप्रक्षेपणादसून।<br>आस्फोट्य सिंहनादं च कृत्वाधावंस्तथासुराः ॥ ४६<br><br>दानवाः प्रमथानेतान प्रसर्पत किमासथ।<br>हतानपि हि वो वापी पुनरुज्जीवयिष्यति ॥ ४७ | सहसा भयंकर गर्जना करनेवाले प्रमथगण हर्षपूर्वक गर्जना करने लगते तो इधर सिद्धगण अद्भुत युद्ध-कौशल दिखाते थे। रणभूमिमें आगे चलनेवाले चारण— 'प्रमथ ! तुम तो बलवान् मालूम पड़ते हो,' 'दानव ! तुम गर्वीले दीख रहे हो'—इस प्रकारके वचन बोल रहे थे। दानवोंद्वारा चलाये गये लोहनिर्मित गदाके आघातसे कुछ पार्षदगण मुखसे रक्त उगल रहे थे, जो ऐसे लगते थे, मानो पर्वत सुवर्णधातु उगल रहे हों। उधर प्रमथगण भी रणभूमिमें बाणों, वृक्षों और पर्वत-शिखरोंके प्रहारसे बहुतेरे देवशत्रु असुरोंको पूर्णरूपसे घायल कर उन्हें कालके हवाले कर रहे थे। मयदानवकी आज्ञासे दूसरे दानवश्रेष्ठ उन मरे हुए दानवोंको उठाकर उसी बावलीमें डाल देते थे। उस बावलीमें पड़ते ही वे सभी दानव स्वर्गवासी देवताओंकी तरह तेजस्वी शरीर धारण कर उत्तम आभूषणों और वस्त्रोंसे विभूषित हो बाहर निकल आते थे। तदनन्तर बावलीमें डाल देनेसे जीवित हुए कुछ दानव ताल ठोंककर सिंहनाद करते हुए इधर-उधर दौड़ लगा रहे थे और कह रहे थे—'दानवो! इन प्रमथगणोंपर धावा करो। क्यों बैठे हो ? (अब तुमलोगोंको कोई भय नहीं है; क्योंकि) मर जानेपर भी तुमलोगोंको यह बावली पुनः जीवित कर देगी'॥ ३७-४७॥ | | एवं श्रुत्वा शङ्कुकर्णो वचोऽग्रग्रहसंनिभः ।<br>द्रुतमेवैत्य देवेशमिदं वचनमब्रवीत् ॥ ४८<br><br>सूदिताः सूदिता देव प्रमथैरसुरा ह्यमी।<br>उत्तिष्ठन्ति पुनभीमाः सस्या इव जलोक्षिताः ॥ ४९<br><br>अस्मिन् किल पुरे वापी पूर्णामृतरसाम्भसा।<br>निहता निहता यत्र क्षिप्ता जीवन्ति दानवाः ॥ ५०<br><br>इति विज्ञापयद् देवं शङ्कुकर्णो महेश्वरम्।<br>अभवन् दानवबल उत्पाता वै सुदारुणाः ॥ ५१<br><br>तारकाख्यः सुभीमाक्षो दारितास्यो हरैर्यथा।<br>अभ्यधावत् संक्रुद्धो महादेवरथं प्रति ॥ ५२<br><br>त्रिपुरे तु महान् घोरो भेरीशङ्खरवो बभौ।<br>दानवा निःसृता दृष्ट्वा देवदेवरथे सुरम् ॥ ५३ | दानवोंको ऐसा कहते सुनकर सूर्यके समान तेजस्वी शङ्कुकर्णने शीघ्र ही देवेश्वर शंकरजीके निकट जाकर इस प्रकार कहा—'देव! प्रमथगणोंद्वारा बारंबार मारे गये ये भयंकर असुर पुनः उसी प्रकार जी उठते हैं, जैसे जलके सिञ्चनसे सूखी हुई फसल। निश्चय ही इस पुरमें अमृतरूपी जलसे परिपूर्ण कोई बावली है, जिसमें डाल देनेसे बार-बार मारे गये दानव पुनः जीवित हो जाते हैं।' इस प्रकार शङ्कुकर्णने भगवान् महेश्वरको सूचित किया। उसी समय दानवोंकी सेनामें अत्यन्त भीषण उत्पात होने लगे। तब परम भयानक नेत्रोंवाले तारकाक्षने अत्यन्त कुपित होकर सिंहकी तरह मुँह फैलाये हुए महादेवजीके रथपर धावा किया। उस समय त्रिपुरमें भेरियों और शङ्खोंका महान् भीषण निनाद होने लगा। देवाधिदेव शंकरजीके रथपर (शंकर और) ब्रह्माको उपस्थित देखकर दानवगण त्रिपुरसे बाहर निकले। |