भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 497, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 497
  • अध्याय १३६ * ४८७

| भूकम्पश्चाभवत्तत्र रथाङ्गो* भूगतोऽभवत्।<br>दृष्ट्वा क्षोभमगाद्रुद्रः स्वयम्भूश्च पितामहः॥ ५४<br>ताभ्यां देववरिष्ठाभ्यामन्वितः स रथोत्तमः।<br>अनायतनमासाद्य सीदते गुणवानिव॥ ५५<br>धातुक्षये देह इव ग्रीष्मे चाल्पमिवोदकम्।<br>शैथिल्यं याति स रथः स्नेहो विप्रकृतो यथा॥ ५६<br>रथादुत्पत्यात्मभूर्वै सीदन्तं तु रथोत्तमम्।<br>उज्जहार महाप्राणो रथं त्रैलोक्यरूपिणम्॥ ५७<br>तदा शराद् विनिष्पत्य पीतवासा जनार्दनः।<br>वृषरूपं महत्कृत्वा रथं जग्राह दुर्धरम्॥ ५८<br>स विषाणाभ्यां त्रैलोक्यं रथमेव महारथः।<br>प्रगृह्योद्वहते सज्जं कुलं कुलवहो यथा॥ ५९<br>तारकाख्योऽपि दैत्येन्द्रो गिरीन्द्र इव पक्षवान्।<br>अभ्यद्रवत्तदा देवं ब्रह्माणं हतवांश्च सः॥ ६०<br>स तारकाख्याभिहतः प्रतोदं न्यस्य कूबरे।<br>विजज्वाल मुहुर्ब्रह्मा श्वासं वक्त्रात् समुद्गिरन्॥ ६१ | तभी वहाँ ऐसा भयंकर भूकम्प आया, जिससे (शिवजीके) रथका चक्का पृथ्वीमें प्रविष्ट हो गया। यह देखकर भगवान् रुद्र और स्वयम्भू ब्रह्मा क्षुब्ध हो उठे। उन दोनों देवश्रेष्ठोंसे युक्त वह उत्तम रथ कहीं ठहरनेका स्थान न पाकर स्थानरहित गुणी पुरुषकी तरह विपत्तिग्रस्त हो गया। वह रथ वीर्यनाश हो जानेपर शरीर, ग्रीष्म ऋतुमें अल्प जलवाले जलाशय और तिरस्कृत स्नेहकी तरह शिथिलताको प्राप्त हो गया। इस प्रकार जब वह श्रेष्ठ रथ नीचे जाने लगा, तब महाबली स्वयम्भू ब्रह्माने उससे कूदकर उस त्रैलोक्यरूपी रथको ऊपर उठा दिया। इतनेमें ही पीताम्बरधारी भगवान् जनार्दनने बाणसे निकलकर विशाल वृषभका रूप धारण किया और उस दुर्धर रथको उठा लिया। वे महारथी जनार्दन त्रिलोकीरूप उस रथको अपने सींगोंपर उठाकर उसी तरह ढो रहे थे, जैसे कुलपति अपने संगठित कुलका भार वहन करता है। उसी समय पक्षधारी गिरिराजकी तरह विशालकाय दैत्येन्द्र तारकासुरने भी देवेश्वर ब्रह्मापर धावा बोल दिया और उन्हें घायल कर दिया। तब तारकासुरके प्रहारसे घायल हुए ब्रह्मा रथके कूबरपर चाबुक रखकर मुखसे बारंबार लम्बी साँस छोड़ते हुए (क्रोधसे) प्रज्वलित हो उठे॥ ४८–६१॥ | | तत्र दैत्यैर्महानादो दानवैरपि भैरवः।<br>तारकाख्यस्य पूजार्थं कृतो जलधरोपमः॥ ६२<br>रथचरणकरोऽथ महामृधे<br>वृषभवपुर्वृषभेन्द्रपूजितः।<br>दितितनयबलं विमर्द्य सर्वं<br>त्रिपुरपुरं प्रविवेश केशवः॥ ६३<br>सजलजलदराजितां समस्तां<br>कुमुदवरोत्पलफुल्लपङ्कजाढ्याम्।<br>सुरगुरुरपिबत् पयोऽमृतं त-<br>द्रविरिव संचितशार्वरं तमोऽन्धम्॥ ६४<br>वापीं पीत्वासुरेन्द्राणां पीतवासा जनार्दनः।<br>नर्दमानो महाबाहुः प्रविवेश शरं ततः॥ ६५<br>ततोऽसुरा भीमगणेश्वरैर्हताः<br>प्रहारसंवर्धितशोणितापगाः।<br>पराङ्मुखा भीममुखैः कृता रणे<br>यथा नयाभ्युद्यततत्परैर्न रैः ॥ ६६ | वहाँ दैत्य और दानव तारकासुरका सत्कार करनेके लिये मेघकी गर्जनाके समान अत्यन्त भयंकर सिंहनाद करने लगे। यह देखकर वृषभका शरीर धारण करनेवाले एवं शंकरद्वारा पूजित भगवान् केशव हाथमें सुदर्शन चक्र धारण कर उस महासमरमें दैत्योंकी सारी सेनाओंका मर्दन करते हुए त्रिपुरमें प्रविष्ट हुए। वहाँ वे उस बावलीपर जा पहुँचे, जो चारों ओरसे बादलोंसे सुशोभित तथा खिली हुई कुमुदिनी, नीलकमल और अन्यान्य कमलोंसे व्याप्त थी। फिर तो उन देवश्रेष्ठने उसके अमृतरूपी जलको इस प्रकार पी लिया, जैसे सूर्य रात्रिमें संचित हुए घने अन्धकारको पी जाते हैं। इस प्रकार पीताम्बरधारी महाबाहु जनार्दन असुरेन्द्रोंकी बावलीका अमृत पीकर सिंहनाद करते हुए पुनः उसी बाणमें प्रविष्ट हो गये। तत्पश्चात् भयावने मुखवाले भयंकर गणेश्वरोंने असुरोंको मारना प्रारम्भ किया। उनके प्रहारसे घायल हुए दानवोंके रुधिरसे नदियाँ बह चलीं। वे उसी प्रकार युद्धविमुख कर दिये गये, जैसे नयशील पुरुष अन्यायीयोंको विमुख कर देते हैं। |


* कुछ प्रतियोंके अनुसार यहाँ यदि 'शताङ्ग' पाठ भी हो तो भी विष्णु आदि सैकड़ों अङ्गयुक्त रथ ही अभिप्रेत होगा।