भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४८८ * मत्स्यपुराण *


| स तारकाख्यस्तडिमालिरेव च<br>मयेन सार्धं प्रमथैरभिद्रुताः।<br>पुरं परावृत्य नु ते शरार्दिता<br>यथा शरीरं पवनोदये गताः॥ ६७<br>गणेश्वराभ्युद्यतदर्पकाशिनो<br>महेन्द्रनन्दीश्वरषण्मुखा युधि।<br>विनेदुरुच्चैर्जहसुश्च दुर्मदा<br>जयेम चन्द्रादिदिगीश्वरैः सह॥ ६८ | इस प्रकार प्रमथगणोंद्वारा खदेड़े गये एवं बाणोंके प्रहारसे घायल मयके साथ तारकासुर और विद्युन्माली त्रिपुरमें ऐसे लौट आये, मानो उनके शरीरसे प्राण ही निकल गये हों। उस समय युद्धस्थलमें महेन्द्र, नन्दीश्वर और स्वामिकार्तिक गणेश्वरोंके साथ दर्पसे सुशोभित हो रहे थे। वे उन्मत्त होकर सिंहनाद एवं अट्टहास करते हुए कहने लगे कि अब चन्द्रमा आदि दिक्पालोंसहित हमलोग अवश्य विजयी होंगे॥ ६२—६८॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे त्रिपुरदाहे षट्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १३६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणे त्रिपुरदाहप्रसङ्गमें एक सौ छत्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १३६॥


एक सौ सैंतीसवाँ अध्याय

वापी-शोषणसे मयको चिन्ता, मय आदि दानवोंका त्रिपुरसहित समुद्रमें प्रवेश तथा शंकरजीका इन्द्रको युद्ध करनेका आदेश

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
प्रमथैः समरे भिन्नास्त्रैपुरास्ते सुरारयः।<br>पुरं प्रविविशुर्भीताः प्रमथैर्भग्नगोपुरम्॥ १<br>शीर्णदंष्ट्रा यथा नागा भग्नशृङ्गा यथा वृषाः।<br>यथा विपक्षाः शकुना नद्यः क्षीणोदका यथा॥ २<br>मृतप्रायास्तथा दैत्या दैवत्तैर्विकृताननाः।<br>बभूवुस्ते विमनसः कथं कार्यमिति ब्रुवन्॥ ३<br>अथ तान् म्लानमनसस्तदा तामरसाननः।<br>उवाच दैत्यो दैत्यानां परमाधिपतिर्मयः॥ ४<br>कृत्वा युद्धानि घोराणि प्रमथैः सह सामरैः।<br>तोषयित्वा तथा युद्धे प्रमथानमरैः सह॥ ५<br>यूयं यत् प्रथमं दैत्याः पश्चाच्च बलपीडिताः।<br>प्रविष्टा नगरं त्रासात् प्रमथैर्भृशमर्दिताः॥ ६<br>अप्रियं क्रियते व्यक्तं देवैर्नास्त्यत्र संशयः।<br>यत्र नाम महाभागाः प्रविशन्ति गिरेर्वनम्॥ ७<br>अहो हि कालस्य बलमहो कालो हि दुर्जयः।<br>यत्रेद्दृशस्य दुर्गस्य उपरोधोऽयमागतः॥ ८ऋषियो! इस प्रकार समरभूमिमें प्रमथगणोंद्वारा घायल किये गये त्रिपुरवासी देवशत्रु दानव भयभीत होकर त्रिपुरमें लौट गये। उस समय प्रमथोंने त्रिपुरके फाटकको भी नष्ट-भ्रष्ट कर दिया था। जैसे नष्ट हुए दाँतोंवाले सर्प, टूटे हुए सींगोंवाले साँड़, डैनारहित पक्षी और क्षीण जलवाली नदियाँ शोभाहीन हो जाती हैं, उसी प्रकार देवताओंके प्रहारसे दैत्यवृन्द मृतप्राय हो गये थे। उनके मुख विकृत हो गये थे और वे खिन्न मनसे कह रहे थे कि अब क्या किया जाय? तब कमल-सदृश मुखवाले दैत्योंके चक्रवर्ती सम्राट् मय दैत्यने उन मलिन मनवाले दैत्योंसे कहा—'दैत्यो! इसमें सन्देह नहीं है कि तुमलोगोंने पहले युद्धभूमिमें देवताओंसहित प्रमथगणोंके साथ भयंकर युद्ध करके उन्हें संतुष्ट किया है, किंतु पीछे तुमलोग देवसेनासे पीड़ित और प्रमथोंके प्रहारसे अत्यन्त घायल होकर भयवश नगरमें भाग आये हो। निस्संदेह देवगण प्रकटरूपमें हमलोगोंका अप्रिय कर रहे हैं, इसी कारण ये महान् भाग्यशाली दैत्य इस समय भागकर पर्वतीय वनोंमें छिप रहे हैं। अहो! कालका बल महान् है! अहो! यह काल किसी प्रकार जीता नहीं जा सकता। कालके ही प्रभावसे त्रिपुर-जैसे दुर्गपर यह अवरोध उत्पन्न हो गया है।'