भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

४७६ * मत्स्यपुराण *


एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय

शङ्करजीकी आज्ञासे इन्द्रका त्रिपुरपर आक्रमण, दोनों सेनाओंमें भीषण संग्राम, विद्युन्मालीका वध, देवताओंकी विजय और दानवोंका युद्ध-विमुख होकर त्रिपुरमें प्रवेश

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—ऋषियो! तदनन्तर नारदजी त्रिपुरसे लौटकर पुनः युद्धस्थलमें देवताओंकी सेनामें सम्मिलित हो गये। वे स्वयं देव-सभामें उपस्थित हुए। इलावृत्त नामसे विख्यात विस्तृत वर्ष, जहाँ बलिकायज्ञ सम्पन्न हुआ था तथा जहाँ बलि बाँधे गये थे, तीनों लोकोंमें देवताओंकी जन्मभूमिके रूपमें प्रसिद्ध है। उसी इलावृत्तमें देवताओंके जातकर्म आदि संस्कार तथा यज्ञ और कन्यादान आदि कर्म सम्पन्न हुए हैं। यहाँ भगवान् शङ्कर अपने पार्षदगणोंको साथ लेकर नित्य विहार करते हैं। यहाँ लोकपालगण मेरुगिरिकी तरह सदा निवास करते हैं। इसी स्थानपर जिनके नेत्र मधुके समान पीले रंगके हैं तथा जो द्वितीयाके चन्द्रमाको भूषणरूपमें धारण करते हैं, उन्हीं भगवान् महेश्वरने देवराज इन्द्र और अपने गणेश्वरोंसे इस प्रकार कहा—'इन्द्र! तुम्हारे शत्रुओंका यह त्रिपुर दिखायी पड़ रहा है। यह विमानों, पताकाओं और ध्वजोंसे सुशोभित है। यह सुदृढ़ है तथा इसके विषयमें ऐसी प्रसिद्धि है कि यह अग्निकी तरह अत्यन्त तापदायक है। इसके निवासी दानव किरीट-कुण्डल धारण किये उन्हीं पर्वतके समान दीख रहे हैं। इन दानवोंकी अङ्ग-कान्ति बादलकी-सी है और इनके मुख टेढ़े-मेढ़े हैं। ये सभी परकोटों, फाटकों और अट्टालिकाओंपर तथा कक्षान्तमें स्थित हैं। (वह देखो) वे सभी दैत्य विजयकी अभिलाषासे हथियारोंसे सुसज्जित हो नगरसे बाहर निकल रहे हैं। इसलिये तुम सहायकोंसहित अपना श्रेष्ठ अस्त्र वज्र लेकर सैकड़ों देवताओं तथा मेरे भृत्योंके साथ आगे बढ़कर इन महासुरोंका संहार करो। मैं इस श्रेष्ठ रथपर निश्चल पर्वतकी तरह स्थित रहकर तुमलोगोंकी विजयके लिये त्रिपुरके सम्मुख उसके छिद्रकी खोजमें खड़ा रहूँगा। वासव! जब पुष्य-नक्षत्रके योगके साथ ये तीनों पुर एक स्थानपर स्थित होंगे, तब मैं एक ही बाणसे इन्हें दग्ध कर डालूँगा'॥ १—१२॥
ततो रणे देवबलं नारदोऽभ्यगमत् पुनः।<br>आगत्य चैव त्रिपुरात् सभायामास्थितः स्वयं॥ १<br>इलावृतमिति ख्यातं तद्वर्षं विस्तृतायतम्।<br>यत्र यज्ञो बलेर्वृत्तो बलिर्यत्र च संयतः॥ २<br>देवानां जन्मभूमिर्या त्रिषु लोकेषु विश्रुता।<br>विवाहाः क्रतवश्चैव जातकर्मादिकाः क्रियाः॥ ३<br>देवानां यत्र वृत्तानि कन्यादानानि यानि च।<br>रेमे नित्यं भवो यत्र सहायैः पार्षदैर्गणैः॥ ४<br>लोकपालाः सदा यत्र तस्थुर्मेरुगिरौ यथा।<br>मधुपिङ्गलनेत्रस्तु चन्द्रावयवभूषणः।<br>देवानामधिपं प्राह गणपांश्च महेश्वरः॥ ५<br>वासवैतदरीणां ते त्रिपुरं परिदृश्यते।<br>विमानैश्च पताकाभिर्ध्वजैश्च समलङ्कृतम्॥ ६<br>इदं वृत्तमिदं ख्यातं वह्निवद् भृशतापनम्।<br>एते जना गिरिप्रख्याः सकुण्डलकिरीटिनः॥ ७<br>प्राकारगोपुराट्टेषु कक्षान्ते दानवाः स्थिताः।<br>इमे च तोयदाभासा दनुजा विकृताननाः॥ ८<br>निर्गच्छन्ति पुरो दैत्याः सायुधा विजयैषिणः॥ ९<br>स त्वं सुरशतैः सार्धं ससहायो वरायुधः।<br>सुहृद्भिर्मामकैर्भृत्यैर्व्यापादय महासुरान्॥ १०<br>अहं च रथवर्येण निश्चलाचलवत्स्थितः।<br>पुरः पुरस्य रन्ध्रार्थी स्थास्यामि विजयाय वः॥ ११<br>यदा तु पुष्ययोगेने एकत्वं स्थास्यते परम्।<br>तदेतन्निर्धहिष्यामि शरेणैकेन वासव॥ १२
* अध्याय १३५ *४७७
SanskritHindi
इत्युक्तो वै भगवता रुद्रेणेह सुरेश्वरः।<br>ययौ तत्त्रिपुरं जेतुं तेन सैन्येन संवृतः ॥ १३<br><br>प्रक्रान्तरथभीमैस्तैः सदेवैः पार्षदां गणैः।<br>कृतसिंहरवोपेतेरुद्गच्छद्भिरिवाम्बुदैः ॥ १४<br><br>तेन नादेन त्रिपुराद् दानवा युद्धलालसाः।<br>उत्पत्य दुद्रुवुश्चेलुः सायुधाः खे गणेश्वरान् ॥ १५<br><br>अन्ये पयोधररावाः पयोधरसमा बभुः।<br>ससिंहनादं वादित्रं वादयामासुरुद्धताः ॥ १६<br><br>देवानां सिंहनादश्च सर्वतूर्यरवो महान्।<br>ग्रस्तोऽभूद् दैत्यनादैश्च चन्द्रस्तोयधरैरिव ॥ १७<br><br>चन्द्रोदयात् समुद्भूतः पौर्णमास इवार्णवः।<br>त्रिपुरं प्रभवत् तद्वद् भीमरूपमहासुरैः ॥ १८<br><br>प्राकारेषु पुरे तत्र गोपुरेष्वपि चापरे।<br>अट्टालकान् समारुह्य केचिच्चलितवादिनः ॥ १९<br><br>स्वर्णमालाधराः शूराः प्रभासितवराम्बराः।<br>केचिन्नदन्ति दनुजास्तोयमत्ता इवाम्बुदाः ॥ २०<br><br>इतश्चेतश्च धावन्तः केचिदुद्धूतवाससः।<br>किमेतदिति पप्रच्छुरन्योऽन्यं गृहमाश्रिताः ॥ २१<br><br>किमेतन्नैनं जानामि ज्ञानमन्तर्हितं हि मे।<br>ज्ञास्यसेऽनन्तरेणेति कालो विस्तारतो महान् ॥ २२<br><br>सोऽप्यसौ पृथ्वीसारं सिंहश्च रथमास्थितः।<br>तिष्ठते त्रिपुरं पीड्य देहव्याधिरिवोच्छ्रितः ॥ २३<br><br>य एषोऽस्ति स एषोऽस्तु का चिन्ता सम्भ्रमे सति।<br>एहि ह्यायुधमादाय क्व मे पृच्छा भविष्यति ॥ २४<br><br>इति तेऽन्योन्यमाविद्धा उत्तरोत्तरभाषिणः।<br>आसाद्य पृच्छन्ति तदा दानवास्त्रिपुरालयाः ॥ २५<br><br>तारकाख्यपुरे दैत्यास्तारकाख्यपुरःसराः।<br>निर्गताः कुपितास्तूर्णं बिलादिव महोरगाः ॥ २६भगवान् रुद्रद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर देवराज इन्द्र उस विशाल सेनाके साथ उस त्रिपुरको जीतनेके लिये आगे बढ़े। चलते समय देवताओं और पार्षदगणोंके रथोंसे भीषण शब्द हो रहा था और वे सभी मेघकी गर्जनाके समान सिंहनाद कर रहे थे। उस शब्दको सुनकर दानवगण युद्धकी लालसासे अस्त्र लेकर त्रिपुरसे बाहर निकले और आकाशमें छलाँग मारते हुए गणेश्वरोंपर टूट पड़े। उनमें कुछ अन्य उद्दण्ड दानव, जो काले मेघके समान शोभा पा रहे थे, मेघकी तरह गर्जना कर रहे थे और सिंहनाद करते हुए बाजा बजा रहे थे। उस समय दैत्योंके सिंहनादसे देवताओंका सिंहनाद और सभी प्रकारके तुरही आदि बाजोंका महान् शब्द उसी प्रकार अभिभूत हो गया, जैसे बादलोंके बीच चन्द्रमा छिप जाते हैं। जैसे चन्द्रमाके उदय होनेपर पूर्णिमा तिथिको समुद्र वृद्धिंगत हो जाता है, वैसे ही उन भयंकर रूपवाले महान् असुरोंसे त्रिपुर उद्दीप्त हो उठा। उस पुरमें कुछ दानव परकोटोंपर तथा कुछ फाटकों और अट्टालिकाओंपर चढ़कर 'चलो, निकलो' ऐसा कहकर ललकार रहे थे। कुछ शूर-वीर दानव सुन्दर एवं श्रेष्ठ वस्त्र धारण किये हुए थे, उनके गलेमें स्वर्णकी जंजीर शोभा पा रही थी और वे जलसे भरे हुए बादलकी भाँति सिंहनाद कर रहे थे। कुछ वस्त्र फहराते हुए इधर-उधर दौड़ रहे थे और घरपर आकर परस्पर एक-दूसरेसे पूछ रहे थे—'यह क्या हो रहा है?' (दूसरा उत्तर देता था कि) 'क्या हो रहा है, यह तो मैं नहीं जानता; क्योंकि उसकी जानकारी मुझसे छिपी हुई है। कुछ समयके बाद तुम्हें भी ज्ञात हो जायगा। अभी तो बहुत समय शेष है। (देखो न) वहाँ पृथ्वीके सारभूत रथपर बैठा हुआ वह जो सिंह खड़ा है, वह त्रिपुरको उसी प्रकार पीड़ा दे रहा है, जैसे बढ़ी हुई व्याधि शरीरको कष्ट देती है। वह जो हो, सो रहे; ऐसे हलचलके उपस्थित होनेपर चिन्ता करना व्यर्थ है। अब हथियार लेकर मैदानमें आ जाओ, फिर मुझसे पूछनेकी आवश्यकता नहीं रह जायगी।' उसी समय त्रिपुरनिवासी दानव परस्पर एक-दूसरेको पकड़कर इसी प्रकार पूछते थे और परस्पर उत्तर-प्रत्युत्तर देते थे ॥ १३–२५ ॥<br><br>इधर तारकाक्षपुरके निवासी दैत्य क्रोधसे भरे हुए तारकाक्षको आगे करके तुरंत नगरसे उसी प्रकार बाहर निकले, मानो बिलसे विषधर सर्प निकल रहे हों।

४७८ * मत्स्यपुराण *


| निर्यावन्तस्तु ते दैत्याः प्रमथाधिपयूथपैः।<br>निरुद्धा गजराजानो यथा केसरियूथपैः॥ २७<br><br>दर्पितानां ततश्चैषां दर्पितानामिवाग्निनाम्।<br>रूपाणि जज्वलुस्तेषामग्नीनामिव धम्यताम्॥ २८<br><br>ततो बृहन्ति चापानि भीमनादानि सर्वशः।<br>निकृष्य जघ्नुरन्योऽन्यमिषुभिः प्राणभोजनैः॥ २९<br><br>मार्जारमृगभीमास्यान् पार्षदान् विकृताननान्।<br>दृष्ट्वा दृष्ट्वा हसन्नुच्चैर्दानवा रूपसम्पदा॥ ३०<br><br>बाहुभिः परिघाकारैः कृष्यतां धनुषां शराः।<br>भटवर्मेषु विविशुस्तडागानीव पक्षिणः॥ ३१<br><br>मृताः स्थ क्व नु यास्यध्वं हनिष्यामो निवर्तताम्।<br>इत्येवं परुषाण्युक्त्वा दानवाः पार्षदर्षभान्॥ ३२<br><br>बिभिदुः सायकैस्तीक्ष्णैः सूर्यपादा इवाम्बुदान्।<br>प्रमथा अपि सिंहाक्षाः सिंहविक्रान्तविक्रमाः।<br>खण्डशैलशिलावृक्षैर्बिभिदुर्देत्यदानवान् ॥ ३३<br><br>अम्बुदैराकुलमिव हंसाकुलमिवाम्बरम्।<br>दानवाकुलमत्यर्थं तत्पुरं सकलं बभौ॥ ३४<br><br>विकृष्टचापा दैत्येन्द्राः सृजन्ति शरदुर्दिनम्।<br>इन्द्रचापाङ्कितोरस्का जलदा इव दुर्दिनम्॥ ३५<br><br>इषुभिस्ताड्यमानास्ते भूयो भूयो गणेश्वराः।<br>चक्रूस्ते देहनिर्यासं स्वर्णधातुमिवाचलाः॥ ३६<br><br>तेऽथ वृक्षशिलावज्रशूलपट्टिशपरश्वधैः।<br>चूर्ण्यन्तेऽभिहता दैत्याः काचाष्टङ्कहता इव॥ ३७<br><br>तारकाख्यो जयत्येष इति दैत्या अघोषयन्।<br>जयतीन्द्रश्च रुद्रश्च इत्येव च गणेश्वराः॥ ३८ | बाहर निकलकर उन दैत्योंने देवसेनापर धावा बोल दिया, परंतु प्रमथगणोंके यूथपतियोंने उन्हें ऐसा रोक दिया, जैसे सिंहसमूह गजराजोंके दलको स्तम्भित कर देते हैं। उन गर्वीले दानवोंका रूप तो यों ही (क्रोधके कारण) अग्निकी तरह उद्दीप्त हो उठा था, इधर रोक दिये जानेपर वे धौंकी जाती हुई आगकी तरह जल उठे। फिर तो सब ओर भयंकर सिंहनाद होने लगा। दानवगण बड़े-बड़े धनुषोंपर प्रत्यञ्चा चढ़ाकर प्राण-हरण करनेवाले बाणोंद्वारा एक-दूसरेपर प्रहार करने लगे। प्रमथगणोंमें किन्हींके मुख बिलाव और किन्हींके मृगके समान भयंकर थे तथा किन्हींके मुख टेढ़े-मेढ़े थे। उन्हें देख-देखकर ठहाका मारकर सौन्दर्यशाली दानव हँसने लगे। परिघकी-सी आकारवाली भुजाओंद्वारा खींचे जाते हुए धनुषोंसे छूटे हुए बाण योद्धाओंके कवचोंमें उसी प्रकार घुस जाते थे, जैसे पक्षी तालाबोंमें प्रवेश करते हैं। उस समय दानवगण पार्षदयूथपतियोंको ललकारकर कह रहे थे—'अरे! अब तो तुमलोग मरे ही हो। हमारे हाथोंसे छूटकर कहाँ जाओगे! लौट आओ। हमलोग तुम्हें मार डालेंगे।' ऐसी कठोर बातें कहकर वे अपने तीखे बाणोंसे उन्हें इस प्रकार विदीर्ण कर रहे थे, जैसे सूर्यकी किरणें बादलोंको भेदकर पार कर जाती हैं। उधरसे सिंहके समान पराक्रमी एवं सिंह-सदृश नेत्रोंवाले प्रमथगण भी शिलाओं, शिलाखण्डों और वृक्षोंके प्रहारसे दैत्यों और दानवोंको चूर्ण-सा कर दे रहे थे। उस समय बादलोंसे आच्छादित एवं हंसोंसे व्याप्त आकाशकी तरह वह सारा पुर दानवोंसे व्याप्त होकर अत्यन्त सुशोभित हो रहा था। जैसे इन्द्र-धनुषसे चिह्नित मध्यभागवाले बादल जलकी वृष्टि कर दुर्दिन (मेघाच्छन्न दिवस) उत्पन्न कर लेते हैं, उसी प्रकार दैत्येन्द्रगण अपने धनुषोंकी प्रत्यञ्चाको कानतक खींचकर बाणोंकी वर्षा कर अन्धकार उत्पन्न कर रहे थे। दानवोंके बाणोंसे बारम्बार घायल होनेके कारण गणेश्वरोंके शरीरोंसे रक्तकी धार बह रही थी, जो ऐसी प्रतीत होती थी, मानो पर्वतोंसे सुवर्णधातु निकल रही हो। उधर गणेश्वरोंद्वारा चलाये गये वृक्ष, शिला, वज्र, शूल, पट्टिश और कुठारके प्रहारसे दैत्यगण ऐसे चूर-चूर कर दिये जा रहे थे जैसे कुल्हाड़ी या छेनीके प्रहारसे काच छिन्न-भिन्न हो जाता है। उधर दैत्यगण 'यह देखो, तारकाक्ष जीत रहा है'—ऐसी घोषणा कर रहे थे। तभी इधरसे गणेश्वर सिंहनाद करते हुए बोल रहे थे—'देखो-देखो, इन्द्र और रुद्र विजयी हो रहे हैं'॥ २६–३८॥ |

* अध्याय १३५ *४७९

| वारिता दारिता बाणैर्योधास्तस्मिन् बलोभये।<br>निःस्वनन्तोऽम्बुसमये जलगर्भा इवाम्बुदाः ॥ ३९<br>करैश्छिन्नैः शिरोभिश्च ध्वजैश्छत्रैश्च पाण्डुरैः ।<br>युद्धभूमिर्भयवती मांसशोणितपूरिता ॥ ४०<br>व्योम्नि चोत्प्लुत्य सहसा तालमात्रं वरायुधैः ।<br>दृढाहताः पतन पूर्वं दानवाः प्रमथास्तथा ॥ ४१<br>सिद्धाश्चाप्सरसश्चैव चारणाश्च नभोगताः ।<br>दृढप्रहारहर्षिताः साधु साध्विति चुक्रुशुः ॥ ४२<br>अनाहताश्च वियति देवदुन्दुभयस्तथा।<br>नदन्तो मेघशब्देन शरभा इव रोषिताः ॥ ४३<br>ते तस्मिंस्त्रिपुरे दैत्या नद्यः सिन्धुपताविव ।<br>विशन्ति क्रुद्धवदना वल्मीकमिव पन्नगाः ॥ ४४<br>तारकाख्यपुरे तस्मिन् सुराः शूराः समन्ततः ।<br>सशस्त्रा निपतन्ति स्म सपक्षा इव भूधराः ॥ ४५<br>योधयन्ति त्रिभागेन त्रिपुरे तु गणेश्वराः ।<br>विद्युन्माली मयश्चैव मग्नौ च द्रुमवद्रणे ॥ ४६<br>विद्युन्माली स दैत्येन्द्रो गिरीन्द्रसदृशद्युतिः ।<br>आदाय परिघं घोरं ताडयामास नन्दिनम् ॥ ४७<br>स नन्दी दानवेन्द्रेण परिघेण दृढाहतः ।<br>भ्रमते मधुनाऽव्यक्तः पुरा नारायणो यथा ॥ ४८ | उन दोनों सेनाओंमें बाणोंद्वारा रोके एवं घायल किये गये वीर इतने जोरसे सिंहनाद कर रहे थे जैसे वर्षाकालमें जलसे भरे हुए बादल गरजते हैं। कटे हुए हाथों, मस्तकों, पीले रंगकी पताकाओं और छत्रोंसे तथा मांस और रुधिरसे भरी हुई युद्धभूमि बड़ी भयावनी लग रही थी। दानव तथा प्रमथगण उत्तम अस्त्र धारण कर पहले तो सहसा ताड़-वृक्षकी ऊँचाई-बराबर आकाशमें उछल पड़ते थे और पुनः सुदृढ़रूपसे घायल होकर भूतलपर गिर पड़ते थे। गगनमण्डलमें स्थित सिद्ध, अप्सरा और चारणोंके समूह (दानवोंपर) सुदृढ़ प्रहार होनेसे हर्षित होकर 'ठीक है, ठीक है', ऐसा कहते हुए चिल्लाने लगते थे। उस समय आकाशमें देवताओंकी दुन्दुभियाँ बिना चोट किये ही बज रही थीं। उनसे मेघकी गर्जना तथा क्रुद्ध हुए शरभ (अष्टपदी)-की दहाड़के समान शब्द हो रहे थे। दैत्यगण उस त्रिपुरमें इस प्रकार प्रविष्ट हो रहे थे जैसे नदियाँ समुद्रमें और क्रुद्ध मुखवाले सर्प बिमवटमें प्रवेश करते हैं। इधर अस्त्रधारी, शूरवीर देवगण तारकाक्षके उस नगरके ऊपर चारों ओर इस प्रकार छाये हुए थे, मानो पंखधारी पर्वत मँडरा रहे हों। गणेश्वर त्रिपुरमें तीन भागोंमें विभक्त होकर युद्ध कर रहे थे। उस समय विद्युन्माली और मय—ये दोनों युद्धस्थलमें वृक्षकी भाँति डटे हुए थे। इसी बीच हिमालय-तुल्य कान्तिमान् दैत्येन्द्र विद्युन्मालीने अपना भयंकर परिघ उठाकर नन्दीपर प्रहार किया। दानवेन्द्रके उस परिघके आघातसे नन्दी विशेषरूपसे घायल हो गये और वे ऐसा चक्कर काटने लगे, जैसे पूर्वकालमें दैत्यराज मधुके प्रहारसे अव्यक्तस्वरूप भगवान् नारायण भ्रमित हो गये थे ॥ ३९–४८ ॥ | | नन्दीश्वरे गते तत्र गणपाः ख्यातविक्रमाः ।<br>दुद्रुवुर्जातसंरम्भा विद्युन्मालिनमासुरम् ॥ ४९<br>घण्टाकर्णः शङ्कुकर्णो महाकालश्च पार्षदाः ।<br>ततश्च सायकैः सर्वान् गणपान् गणपाकृतीन् ॥ ५०<br>भूयो भूयः स विव्याध गणेश्वरमहत्तमान् ।<br>भित्त्वा भित्त्वा रुरावोच्चैर्नभस्यम्बुधरो यथा ॥ ५१<br>तस्यारम्भितशब्देन नन्दी दिनकरप्रभः ।<br>संज्ञां लभ्य ततः सोऽपि विद्युन्मालिनमाद्रवत् ॥ ५२ | नन्दीश्वरके घायल होकर रणभूमिसे हट जानेपर विख्यातपराक्रमी घण्टाकर्ण, शङ्कुकर्ण और महाकाल आदि प्रधान पार्षदगण क्रुद्ध होकर एक साथ राक्षस विद्युन्मालीके ऊपर टूट पड़े। तब विद्युन्मालीने उन सभी गणेश्वरोंको जो गणेश-सदृश आकृतिवाले तथा गणेश्वरोंमें प्रधान थे, बाणोंद्वारा लगातार बींधना आरम्भ किया। वह उन्हें घायल करके इतने उच्च स्वरसे सिंहनाद करता था मानो आकाशमें बादल गरज रहे हों। उसके उस सिंहनादसे सूर्य-सरीखे प्रभाशाली नन्दीकी मूर्च्छा भंग हो गयी, तब वे भी विद्युन्मालीपर चढ़ धाये। |

१३७- वापी-शोषणसे मयको चिन्ता, मय आदि दानवोंका त्रिपुरसहित समुद्रमें प्रवेश तथा शङ्करजीका इन्द्रको युद्ध करनेका आदेश

४८० * मत्स्यपुराण *

रुद्रदत्तं तदा दीप्तं दीप्तानलसमप्रभम्।<br>वज्रं वज्रनिभाङ्गस्य दानवस्य ससर्ज ह॥ ५३<br>तन्नन्दिभुजनिर्मुक्तं मुक्ताफलविभूषितम्।<br>पपात वक्षसि तदा वज्रं दैत्यस्य भीषणम्॥ ५४<br>स वज्रनिहतो दैत्यो वज्रसंहननोपमः।<br>पपात वज्राभिहतः शक्रेणाद्रिरिवाहतः॥ ५५<br>दैत्येश्वरं विनिहतं नन्दिना कुलनन्दिना।<br>चुक्रुशुर्दानवाः प्रेक्ष्य दुद्रुवुश्च गणाधिपाः॥ ५६<br>दुःखामर्षितरोषास्ते विद्युन्मालिनि पातिते।<br>द्रुमशैलमहावृष्टिं पयोदाः ससृजुर्यथा॥ ५७<br>ते पीड्यमाना गुरुभिर्गिरिभिश्च गणेश्वराः।<br>कर्तव्यं न विदुः किंचिद्दुन्मद्याधार्मिका इव॥ ५८<br>ततोऽसुरवरः श्रीमांस्तारकाख्यः प्रतापवान्।<br>स तरूणां गिरीणां वै तुल्यरूपधरो बभौ॥ ५९<br>भिन्नोत्तमाङ्गा गणपा भिन्नपादाङ्किताननाः।<br>विरेजुर्भुजगा मन्त्रैर्वार्यमाणा यथा तथा॥ ६०<br>मयेन मायावीर्येण वध्यमाना गणेश्वराः।<br>भ्रमन्ति बहुशब्दालाः पञ्जरे शकुनो इव॥ ६१<br>तथासुरवरः श्रीमांस्तारकाख्यः प्रतापवान्।<br>ददाह च बलं सर्वं शुष्केन्धनमिवानलः॥ ६२<br>तारकाख्येण वार्यन्ते शरवर्षैस्तदा गणाः।<br>मयेन मायानिहतास्तारकाख्येण चेषुभिः॥ ६३<br>गणेशा विधुरा जाता जीर्णमूला यथा द्रुमाः॥ ६४<br>भूयः सम्पतते चाग्निर्गृहान् ग्राहान् भुजङ्गमान्।<br>गिरीन्द्रांश्च हरीन् व्याघ्रान् वृक्षान् सूमरवर्णकान्॥ ६५<br>शरभानष्टपादांश्च आपः पवनमेव च।<br>मयो मायाबलेनैव पातयत्येव शत्रुषु॥ ६६<br>ते तारकाक्षेण मयेन मायया<br>सम्मुह्यमाना विवशा गणेश्वराः।<br>न शक्नुवंस्ते मनसापि चेष्टितुं<br>यथेन्द्रियार्था मुनिनाभिसंयताः॥ ६७उस समय उन्होंने रुद्रद्वारा दिये गये एवं प्रज्वलित अग्निके समान प्रभावशाली चमकते हुए वज्रको वज्रतुल्य कठोर शरीरवाले दानवके ऊपर चला दिया। तब नन्दीके हाथसे छूटा हुआ मोतियोंसे विभूषित वह भयंकर वज्र विद्युन्मालीके वक्षःस्थलपर जा गिरा। फिर तो वज्रके समान ठोस शरीरवाला दैत्य विद्युन्माली उस वज्रसे आहत होकर उसी प्रकार धराशायी हो गया, मानो इन्द्रके प्रहारसे पर्वत गिर पड़ा हो। अपने कुल (वर्ग)-को आनन्दित करनेवाले नन्दीद्वारा दैत्यराज विद्युन्मालीको मारा गया देखकर दानवलोग चीत्कार करने लगे। तब गणेश्वरोंने उनपर धावा बोल दिया। विद्युन्मालीके मारे जानेपर दानव दुःख और अमर्षके कारण क्रोधसे भरे हुए थे। वे गणेश्वरोंने ऊपर बादलकी भाँति वृक्षों और पर्वतोंकी महान् वृष्टि करने लगे। विशाल पर्वतोंके प्रहारसे पीड़ित हुए सभी गणेश्वर ऐसे किंकर्तव्यविमूढ हो गये, जैसे अधार्मिक जन वन्दनीय गुरुजनोंके प्रति हो जाते हैं। तदनन्तर असुरनायक प्रतापी श्रीमान् तारकाक्ष वृक्षों एवं पर्वतोंके समान रूप धारण करके रणभूमिमें उपस्थित हुआ॥ ४९-६०॥<br><br>उस समय बहुतेरे गणेश्वरोंके मस्तक फट गये थे, किन्हींके पैर टूट गये थे और कुछके मुखोंपर घाव लगा था। वे सभी मन्त्रोंद्वारा रोके गये सर्पकी तरह शोभा पा रहे थे। मायावी मयद्वारा मारे जाते हुए गणेश्वर पिंजरेमें बंद पक्षीकी तरह अनेकों प्रकारका शब्द करते हुए चक्कर काट रहे थे। तत्पश्चात् असुरश्रेष्ठ प्रतापी श्रीमान् तारकाक्षने पार्षदोंकी सारी सेनाको उसी प्रकार जलाना प्रारम्भ किया, जैसे आग सूखे इन्धनको जला देती है। तारकाक्ष बाणोंकी वर्षा करके पार्षदगणोंको रोक देता था। इस प्रकार मयकी माया और तारकाक्षके बाणोंद्वारा गणेश्वर मारे जा रहे थे। वे पुरानी जड़वाले वृक्षोंकी तरह व्याकुल हो गये। पुनः मयने अपनी मायाके बलपर शत्रुओंके ऊपर अग्निकी वर्षा की तथा ग्रह, मकर, सर्प, विशाल पर्वत, सिंह, बाघ, वृक्ष, काले हिरन और आठ पैरोंवाले शरभों (गैंडों)-को भी गिराया, जलकी घनघोर वृष्टि की और झंझावातका भी प्रकोप उत्पन्न किया। इस प्रकार तारकाक्ष और मयकी मायासे मोहित होकर वे गणेश्वर मनसे भी चेष्टा करनेमें असमर्थ हो गये। वे ऐसे निरुद्ध हो गये जैसे मुनियोंद्वारा रोके गये इन्द्रियोंके विषय।
* अध्याय १३५ *४८१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
महाजलाग्न्यादिसकुञ्जरोरगै-<br>र्हरीन्द्रव्याघ्रर्क्षतरक्षुराक्षसैः<br>विबाध्यमानास्तमसा विमोहिताः<br>समुद्रमध्येष्विव गाधकाङ्क्षिणः॥ ६८<br>सम्मर्द्यमानेषु गणेश्वरेषु<br>संनर्दमानेषु सुरेतरेषु।<br>ततः सुराणां प्रवराभिरक्षितं<br>रिपोर्बलं संविविशुः सहायुधाः॥ ६९<br>यमो गदास्त्रो वरुणश्च भास्कर-<br>स्तथा कुमारोऽमरकोटिसंयुतः ।<br>स्वयं च शक्रः सितनागवाहनः<br>कुलीशपाणिः सुरलोकपुङ्गवः ॥ ७०<br>स चोडुनाथः ससुतो दिवाकरः<br>स सान्तकस्त्र्यक्षपतिर्महाद्युतिः ।<br>एते रिपूणां प्रवराभिरक्षितं<br>तदा बलं संविविशुर्मदोद्धताः॥ ७१<br>यथा वनं दर्पितकुञ्जराधिपा<br>यथा नभः साम्बुधरं दिवाकरः।<br>यथा च सिंहैर्विजनेषु गोकुलं<br>तथा बलं तत्रिदशैर्भिद्रुतम् ॥ ७२<br>कृतप्रहारातुरदीनदानवं<br>ततस्त्वभज्यन्त बलं हि पार्षदाः।<br>स्वर्ज्योतिषां ज्योतिरिषोष्णवान् हरि-<br>र्यथा तमो घोरतरं नराणाम्॥ ७३<br>विशान्तयामास यथा सदैव<br>निशाकरः संचितशार्वरं तमः।<br>ततोऽपकृष्टे च तमः प्रभावे<br>ह्यस्त्रप्रभावे च विवर्धमाने ॥ ७४<br>दिग्लोकपालैर्गणनायकैश्च<br>कृतो महान् सिंहरवो मुहूर्तम्।<br>संख्ये विभग्ना विकरा विपादा-<br>श्छिन्नोत्तमाङ्गाः शरपूरिताङ्गाः॥ ७५<br>देवेतरा देववरैर्विभिन्नाः<br>सीदन्ति पङ्केषु यथा गजेन्द्राः।<br>वज्रेण भीमेन च वज्रपाणिः<br>शक्त्या च शक्त्या च मयूरकेतुः ॥ ७६उस समय प्रमथगण जल और अग्निकी महान् वृष्टि, हाथी, सर्प, सिंह, व्याघ्र, रीछ, चीते और राक्षसोंद्वारा सताये जा रहे थे। मायाका इतना घना अन्धकार प्रकट हुआ, जिसमें वे ऐसे विमोहित हो गये, जैसे समुद्रके मध्यमें जलकी थाह लगानेवाले विमूढ़ हो जाते हैं। इस प्रकार गणेश्वर पीड़ित किये जा रहे थे और दानवगण सिंहनाद कर रहे थे। इसी बीच प्रधान-प्रधान देवता अस्त्र धारणकर गणेश्वरोंकी रक्षा करनेके लिये शत्रुसेनामें प्रविष्ट हुए। उस अवसरपर गदाधारी यमराज, वरुण, भास्कर, एक करोड़ देवताओंके साथ कुमार कार्तिकेय, श्वेत हाथी ऐरावतपर सवार हो हाथमें वज्र लिये हुए स्वयं देवराज इन्द्र, चन्द्रमा और अपने पुत्र शनैश्चरके साथ सूर्य तथा अन्तकसहित परम तेजस्वी त्रिलोचन रुद्र—ये सभी मदोद्धत देवता उत्कृष्ट बलवानोंद्वारा सुरक्षित शत्रुओंकी सेनामें प्रविष्ट हुए। जिस प्रकार मतवाले गजेन्द्र वनमें, बादलोंसे घिरे हुए आकाशमें सूर्य और निर्जन स्थानमें स्थित गोष्ठमें सिंह प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार देवताओंने उस सेनापर धावा बोल दिया। फिर तो पार्षदगणोंने शस्त्रप्रहार करके दानवोंको ऐसा व्याकुल और दीन कर दिया कि उनका वह विशाल सेना-व्यूह उसी प्रकार छिन्न-भिन्न हो गया जैसे स्वर्गीय ज्योतिःपुञ्जोंके महान् ज्योति उष्णरश्मि सूर्य मनुष्योंके अन्धकारका विनाश कर देते हैं तथा चन्द्रमा रात्रिके घने अन्धकारका प्रशमन कर देते हैं॥ ६१—७३ १/२ ॥<br><br>तदनन्तर अन्धकारका प्रभाव नष्ट हो जाने और अस्त्रका प्रभाव बढ़नेपर दिक्पालों, लोकपालों और गणनायकोंने दो घड़ीतक महान् सिंहनाद किया। फिर तो वे युद्धमें दानवोंको विदीर्ण करने लगे। वहाँ किन्हींके हाथ कट गये तो किन्हींके पैर खण्डित हो गये, किन्हींके मस्तक कट गये तो किन्हींके शरीर बाणोंसे घिर गये। इस प्रकार देवश्रेष्ठोंद्वारा घायल किये गये दानव ऐसा कष्ट पा रहे थे, जैसे दलदलमें फँसे हुए गजराज विवश हो जाते हैं। उस समय वज्रपाणि इन्द्र अपने भयंकर वज्रसे, मयूरध्वज स्वामिकार्तिक शक्तिपूर्वक अपनी शक्तिसे,

४८२ * मत्स्यपुराण *


| दण्डेन चोग्रेण च धर्मराजः<br>पाशेन चोग्रेण च वारिगोप्ता।<br>शूलेन कालेन च यक्षराजो<br>वीर्येण तेजस्वितया सुकेशः॥ ७७<br>गणेश्वरास्ते सुरसंनिकाशाः<br>पूर्णाहुतीसिक्तशिखिप्रकाशाः ।<br>उत्सादयन्ते दनुपुत्रवृन्दान्<br>यथैव इन्द्राशनयः पतन्त्यः॥ ७८<br>मयस्तु देवान् परिरक्षितार-<br>मुमात्मजं देववरं कुमारम्।<br>शरेण भित्त्वा स हि तारकासुतं<br>स तारकाख्यासुरमभाषे॥ ७९<br>कृत्वा प्रहारं प्रविशामि वीरं<br>पुरं हि दैत्येन्द्र बलेन युक्तः।<br>विश्राममूर्जस्करमप्यवाप्य<br>पुनः करिष्यामि रणं प्रपन्नैः॥ ८०<br>वयं हि शस्त्रक्षतविक्षताङ्गा<br>विशीर्णशस्त्रध्वजवर्मवाहाः ।<br>जयैषिणस्ते जयकाशिनश्च<br>गणेश्वरा लोकवराधिपाश्च॥ ८१<br>मयस्य श्रुत्वा दिवि तारकाख्यो<br>वचोऽभिकाङ्क्षन् क्षतजोपमाक्षः।<br>विवेश तूर्णं त्रिपुरं दितेः सुतैः<br>सुतैरदित्या युधि वृद्धहर्षैः ॥ ८२<br>ततः सशङ्खानकभेरिभीमं<br>ससिंहनादं हरसैन्यमाभौ।<br>मयानुगं घोरगभीरगह्वरं<br>यथा हिमाद्रेर्गजसिंहनादितम्॥ ८३ | धर्मराज अपने भयंकर दण्डसे, वरुण अपने उग्र पाशसे और पराक्रम एवं तेजसे सम्पन्न सुन्दर बालोंवाले यक्षराज कुबेर अपने काल-सदृश शूलसे प्रहार कर रहे थे। देवताओंके समान तेजस्वी एवं पूर्णाहुतिसे सिक्त हुई अग्निके समान प्रकाशमान गणेश्वर दानववृन्दपर उसी प्रकार झपटते थे मानो बिजलियाँ गिर रही हों। तत्पश्चात् मयने देवताओंकी रक्षामें तत्पर पार्वती-नन्दन एवं तारका-पुत्र सर्वश्रेष्ठ कुमार कार्तिकेयको बाणसे घायल कर तारकाक्षसे कहा—'दैत्येन्द्र! हमलोगोंके शरीर शस्त्रोंके आघातसे क्षत-विक्षत हो गये हैं तथा हमारे शस्त्रास्त्र, ध्वज, कवच और वाहन आदि भी छिन्न-भिन्न हो गये हैं। इधर गणेश्वरों तथा लोकनायक देवोंके मनमें जयकी अभिलाषा विशेषरूपसे जागरूक हो उठी है, साथ ही वे विजयी भी हो रहे हैं, अतः अब मैं इस वीरपर प्रहार करके सेनासहित नगरमें प्रवेश कर जाता हूँ और वहाँ कुछ देर विश्राम कर शक्ति-सम्पन्न होकर पुनः अनुचरोंसहित युद्ध करूँगा।' मयकी ऐसी बात सुनकर उसका पालन करता हुआ रुधिर-सरीखे लाल नेत्रोंवाला तारकाक्ष तुरंत ही आकाशमार्गसे दिति-पुत्रोंके साथ त्रिपुरमें प्रवेश कर गया। उस समय देवगण रणभूमिमें हर्षके मारे उछल पड़े। फिर तो मयका पीछा करते हुए भगवान् शंकरके सैनिक विशेष शोभा पा रहे थे। उनके शङ्ख, नगाड़े और भेरियाँ बजने लगीं तथा वे सिंहनाद करने लगे। उस समय ऐसा भीषण शब्द हो रहा था मानो हिमालय पर्वतकी भयंकर एवं गहरी गुफामें गजराज और सिंह दहाड़ रहे हों ॥ ७४-८३ ॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे त्रिपुरदाहे इलावृते देवदानवयुद्धवर्णने प्रहारकृतं नाम पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १३५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरदाहप्रसङ्गमें इलावृतमें देव-दानव-युद्ध-प्रसङ्गमें परस्पर प्रहार नामक एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १३५॥

१३८- देवताओं और दानवोंमें घमासान युद्ध तथा तारकासुरका वध

* अध्याय १३६ *४८३

एक सौ छत्तीसवॉँ अध्याय

मयका चिन्तित होकर अद्भुत बावलीका निर्माण करना, नन्दिकेश्वर और तारकासुरका भीषण युद्ध तथा प्रमथगणोंकी मारसे विमुख होकर दानवोंका त्रिपुर-प्रवेश


सूत उवाच
मयः प्रहारं कृत्वा तु मायावी दानवर्षभः।<br>विवेश तूर्णं त्रिपुरमभ्रं नीलमिवाम्बरम्॥ १<br><br>स दीर्घमुष्णं निःश्वस्य दानवान् वीक्ष्य मध्यगान्।<br>दध्यौ लोकक्षये प्राप्ते कालं काल इवापरः॥ २<br><br>इन्द्रोऽपि बिभ्यते यस्य स्थितो युद्धेप्सुरग्रतः।<br>स चापि निधनं प्राप्तो विद्युन्माली महायशाः॥ ३<br><br>दुर्गं वै त्रिपुरस्यास्य न समं विद्यते पुरम्।<br>तस्याप्येषोऽनयः प्राप्तो नादुर्गं कारणं क्वचित्॥ ४<br><br>कालस्यैव वशे सर्वं दुर्गं दुर्गतरं च यत्।<br>काले क्रुद्धे कथं कालात्राणं नोऽद्य भविष्यति॥ ५<br><br>लोकेषु त्रिषु यत्किञ्चिद् बलं वै सर्वजन्तुषु।<br>कालस्य तद्वशं सर्वमिति पैतामहो विधिः॥ ६<br><br>अस्मिन् कः प्रभवेद् यो वै ह्यसंधार्येऽमितात्मनि।<br>लङ्घने कः समर्थः स्यादृते देवं महेश्वरम्॥ ७<br><br>बिभेमि नेन्द्राद्वि यमाद् वरुणान्न च वित्तपात्।<br>स्वामी चैषां तु देवानां दुर्जयः स महेश्वरः॥ ८<br><br>ऐश्वर्यस्य फलं यत्तत्प्रभुत्वस्य च समंततः।<br>तदद्य दर्शयिष्यामि यावद्वीराः समंततः॥ ९<br><br>वापीममृततोयेन पूर्णां स्रक्ष्ये वरौषधीः।<br>जीविष्यन्ति तदा दैत्याः संजीवनवरौषधैः॥ १०**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! दानवश्रेष्ठ मायावी मय स्वामिकार्तिकपर प्रहारकर त्रिपुरमें उसी प्रकार तुरंत प्रवेश कर गया, जैसे नीले आकाशमें बादल प्रविष्ट हो जाते हैं। वहाँ आकर उसने लम्बी और गरम साँस ली तथा त्रिपुरमें भागकर आये हुए दानवोंकी ओर देखकर लोकके विनाशके अवसरपर दूसरे कालके समान मय कालके विषयमें विचार करने लगा—'अहो! रणभूमिमें युद्धकी अभिलाषासे सम्मुख खड़ा हो जानेपर जिससे इन्द्र भी डरते थे वह महायशस्वी विद्युन्माली भी कालका ग्रास बन गया। त्रिलोकीमें इस त्रिपुरकी समतामें अन्य कोई दुर्ग अथवा पुर नहीं है, फिर भी इसपर भी ऐसी आपत्ति आ ही गयी, अतः (प्राणरक्षाके लिये) दुर्ग कोई कारण नहीं है। (इसलिये मैं तो ऐसा समझता हूँ कि) दुर्ग ही क्यों? दुर्गसे भी बढ़कर सभी वस्तुएँ कालके ही वशमें हैं। तब भला कालके कुपित हो जानेपर इस समय हमलोगोंकी कालसे रक्षा कैसे हो सकेगी? तीनों लोकों तथा समस्त प्राणियोंमें जो कुछ बल है, वह सारा-का-सारा कालके वशीभूत है—ऐसा ब्रह्माका विधान है। ऐसे अमित पराक्रमी एवं असाध्य कालके प्रति कौन-सा उद्योग सफल हो सकता है? भगवान् शंकरके अतिरिक्त उस कालपर विजय पानेमें कौन समर्थ हो सकता है? मैं इन्द्र, यम और वरुणसे नहीं डरता, कुबेरसे भी मुझे कोई भय नहीं है, किंतु इन देवताओंके स्वामी जो महेश्वर हैं, उनपर विजय पाना दुष्कर है। फिर भी जबतक ये दानववीर चारों ओर बिखरे हुए हैं, तबतक ऐश्वर्य-प्राप्तिका जो फल होता है तथा स्वामी बननेका जो फल होता है, उसे मैं प्रदर्शित करूँगा। मैं एक ऐसी बावलीका निर्माण करूँगा, जिसमें अमृतरूपी जल भरा होगा। साथ ही कुछ श्रेष्ठ ओषधियोंका भी आविष्कार करूँगा। उन श्रेष्ठ संजीवनी ओषधियोंके प्रयोगसे मरे हुए दैत्य जीवित हो जायेंगे'॥१—१०॥
४८४* मत्स्यपुराण *

| इति संचिन्त्य बलवान् मयो मायाविनां वरः।<br>मायया ससृजे वापीं रम्भामिव पितामहः॥ ११<br><br>द्वियोजनायतां दीर्घां पूर्णयोजनविस्तृताम्।<br>आरोहसंक्रमवतीं चित्ररूपां कथामिव॥ १२<br><br>इन्दोः किरणकल्पेन मृष्टेनामृतगन्धिना।<br>पूर्णां परमतोयेन गुणपूर्णामिवाङ्गनाम्॥ १३<br><br>उत्पलैः कुमुदैः पद्मैर्वृतां कादम्बकैस्तथा।<br>चन्द्रभास्करवर्णाभैर्भीमैरावरणेर्वृताम् ॥ १४<br><br>खगैर्मधुररावैश्च चारुचामीकरप्रभैः।<br>कामैषिभिरिवाकीर्णां जीवनाभरणीमिव॥ १५<br><br>संसृज्य स मयो वापीं गङ्गामिव महेश्वरः।<br>तस्यां प्रक्षालयामास विद्युन्मालिनमादितः॥ १६<br><br>स वाप्यां मज्जितो दैत्यो देवशत्रुर्महाबलः।<br>उत्तस्थाविन्धनैरिद्धः सद्यो हुत इवानलः॥ १७<br><br>मयस्य चाञ्जलिं कृत्वा तारकाख्योऽभिवादितः।<br>विद्युन्मालीति वचनं मयमुत्थाय चाब्रवीत्॥ १८<br><br>क्व नन्दी सह रुद्रेण वृतः प्रमथजम्बुकैः।<br>युध्यामोऽरीन् विनिष्पिष्य दयादेहेषु का हि नः॥ १९<br><br>अन्वास्यैव च रुद्रस्य भवामः प्र भविष्णवः।<br>तैर्वा विनिहता युद्धे भविष्यामो यमाशनाः॥ २०<br><br>विद्युन्मालेर्निशम्यैतन्मयो वचनमूर्जितम्।<br>तं परिष्वज्य सार्द्राक्ष इदमह महासुरः॥ २१<br><br>विद्युन्मालिन् न मे राज्यमभिप्रेतं न जीवितम्।<br>त्वया विना महाबाहो किमन्येन महासुर॥ २२<br><br>महामृतमयी वापी ह्येषा मायाभिरीश्वर।<br>सृष्टा दानवदैत्यानां हतानां जीववर्धिनी॥ २३<br><br>दिष्ट्या त्वां दैत्य पश्यामि यमलोकादिहागतम्।<br>दुर्गतावनयग्रस्तं भोक्ष्यामोऽद्य महानिधिम्॥ २४ | ऐसा विचारकर मायावियोंमें श्रेष्ठ बलवान् मयने एक (सुन्दर) बावलीकी रचना की, जैसे ब्रह्माजीने मायासे रम्भा अप्सराकी रचना कर डाली थी। वह (बावली) दो योजन लम्बी और एक योजन चौड़ी थी। उसमें चित्र-विचित्र प्रसङ्गोंवाली कथाकी भाँति क्रमशः चढ़ाव-उतारवाली सीढ़ियाँ बनी थीं। वह चन्द्रमाकी किरणोंके समान उज्ज्वल, अमृत-सदृश मधुर एवं सुगन्धित उत्तम जलसे भरी हुई ऐसी लग रही थी, मानो सम्पूर्ण सद्गुणोंसे पूर्ण कोई वनिता हो। उसमें नील कमल, कुमुदिनी और अनेकों प्रकारके कमल खिले हुए थे। वह चन्द्रमा और सूर्यके समान चमकीले रंगवाले भयंकर डैनोंसे युक्त कलहंसोंसे व्याप्त थी। उसमें सुन्दर सुनहली कान्तिवाले पक्षी मधुर शब्दोंमें कूज रहे थे। वह जलाभिलाषी जीवोंसे व्याप्त उन्हें प्राणदान करनेवालीकी तरह दीख रही थी। जैसे महेश्वरने (अपनी जटासे) गङ्गाको उत्पन्न किया था, उसी प्रकार मयने उस बावलीकी रचना कर उसके जलसे सर्वप्रथम विद्युन्मालीके शवको धोया। उस बावलीमें डुबोये जानेपर देवशत्रु महाबली दैत्य विद्युन्माली उसी प्रकार उठ खड़ा हुआ, जैसे इन्धन पड़नेसे हवन की गयी अग्नि तुरंत उद्दीप्त हो उठती है। उठते ही विद्युन्मालीने हाथ जोड़कर मय और तारकासुरका अभिवादन किया और मयसे इस प्रकार कहा—'प्रमथरूपी शृगालोंसे घिरा हुआ रुद्रके साथ नन्दी कहाँ खड़ा है? अब हमलोग शत्रुओंको पीसते हुए युद्ध करेंगे। हमलोगोंके शरीरमें दया कहाँ? हमलोग या तो रुद्रको खदेड़कर प्रभावशाली होंगे अथवा उनके द्वारा युद्धस्थलमें मारे जाकर यमराजके ग्रास बन जायँगे।' विद्युन्मालीके ऐसे उत्साहपूर्ण वचन सुनकर महासुर मयके नेत्रोंमें आँसू छलक आये। तब उसने विद्युन्मालीका आलिङ्गन कर इस प्रकार कहा—'महाबाहु विद्युन्माली! तुम्हारे बिना न तो मुझे राज्य अभीष्ट है, न जीवनकी ही अभिलाषा है। महासुर! अन्य पदार्थोंकी तो बात ही क्या है? ऐश्वर्यशाली वीर! मैंने मायाद्वारा अमृतसे भरी हुई इस बावलीकी रचना की है। यह मरे हुए दानवों और दैत्योंको जीवन-दान देगी। दैत्य! सौभाग्यवश (इसीके प्रभावसे) मैं तुम्हें यमलोकसे लौटा हुआ देख रहा हूँ। अब हमलोग आपत्तिके समय अन्यायसे अपहरण की हुई महानिधिका उपभोग करेंगे'॥११—२४॥ |

* अध्याय १३६ *४८५
दृष्ट्वा दृष्ट्वा च तां वापीं मायया मयनिर्मिताम्।<br>हृष्टाननाक्षा दैत्येन्द्रा इदं वचनमब्रुवन्॥ २५<br>दानवा युध्यतेदानीं प्रमथैः सह निर्भयाः।<br>मयेन निर्मिता वापी हतान् संजीवयिष्यति॥ २६<br>ततः क्षुब्धाम्बुधिनिभा भेरी सा तु भयंकरी।<br>वाद्यमाना ननादोच्चै रौरवी सा पुनः पुनः॥ २७<br>श्रुत्वा भेरीरवं घोरं मेघारम्भितसंनिभम्।<br>न्यपतन्नसुरास्तूर्णं त्रिपुराद् युद्धलालसाः॥ २८<br>लोहरजतसौवर्णैः कटकैर्मणिराजितैः।<br>आमुक्तैः कुण्डलैर्हारैर्मुुकुटैरपि चोत्कटैः॥ २९<br>धूमायिता ह्यविरमा ज्वलन्त इव पावकाः।<br>आयुधानि समादाय काशिनो दृढविक्रमाः॥ ३०<br>नृत्यमाना इव नटा गर्जन्त इव तोयदाः।<br>करोच्छ्रया इव गजाः सिंहा इव च निर्भयाः॥ ३१<br>ह्रदा इव च गम्भीराः सूर्या इव प्रतापिताः।<br>द्रुमा इव च दैत्येन्द्रास्त्रासयन्तो बलं महत्॥ ३२<br>प्रमथा अपि सोत्साहा गरुडोत्पातपातिनः।<br>युयुत्सवोऽभिधावन्ति दानवान् दानवारयः॥ ३३<br>नन्दीश्वरेण प्रमथास्तारकाख्येन दानवाः।<br>चक्रुः संहत्य संग्रामं चोद्यमाना बलेन च॥ ३४<br>तेऽसिभिश्चन्द्रसंकाशैः शूलैश्चानलपिङ्गलैः।<br>बाणैश्च दृढनिर्मुक्तैरभिजघ्नुः परस्परम्॥ ३५<br>शराणां सृज्यमानानामसीनां च निपात्यताम्।<br>रूपाण्यासन् महोल्कानां पतन्तीनामिवाम्बरात्॥ ३६<br><br>शक्तिभिर्भिन्नहृदया निर्दया इव पातिताः।<br>निरयेष्विव निर्मग्नाः कूजन्ते प्रमथासुराः॥ ३७<br><br>हेमकुण्डलयुक्तानि किरीटोत्कटवन्ति च।<br>शिरांस्युर्व्यां पतन्ति स्म गिरिकूटा इवात्यये॥ ३८<br><br>परश्वधैः पट्टिशैश्च खड्गैश्च परिघैस्तथा।<br>छिन्नाः करिवराकारा निपेतुस्ते धरातले॥ ३९मायाके प्रभावसे मयद्वारा निर्मित उस बावलीको देख-देखकर दैत्येन्द्रोंके नेत्र और मुख हर्षके कारण उत्फुल्ल हो उठे थे। तब वे (दानवोंको ललकारते हुए) इस प्रकार बोले—'दानवो! अब तुमलोग निर्भय होकर प्रमथगणोंके साथ युद्ध करो। मयद्वारा निर्मित यह बावली मरे हुए तुमलोगोंको जीवित कर देगी।' फिर तो क्षुब्ध हुए सागरके समान भय उत्पन्न करनेवाली दानवोंकी भेरी बज उठी। वह बड़े जोरसे भयंकर शब्द कर रही थी। मेघकी गर्जनाके समान उस भयंकर भेरीके शब्दको सुनकर युद्धके लिये लालायित हुए असुरगण तुरंत ही त्रिपुरसे बाहर निकल पड़े। वे लोहे, चाँदी, सुवर्ण और मणियोंके बने हुए कड़े, कुण्डल, हार और उत्तम मुकुट धारण किये हुए थे। वे अनवरत जलते हुए धूमसे युक्त प्रज्वलित अग्निके समान दीख रहे थे। वे सुदृढ़ पराक्रमी दैत्य अपने-अपने अस्त्र लेकर (उछलते-कूदते हुए) ऐसे लग रहे थे, जैसे रंगमंचपर नाचते हुए नट हों। वे सूँड़ उठाये हुए हाथीके समान हाथ उठाकर और सिंह-सदृश निर्भय होकर बादलकी तरह गर्जना कर रहे थे। कुण्डके समान गम्भीर, सूर्यके सदृश तेजस्वी और वृक्षोंके-से धैर्यशाली दैत्येन्द्र प्रमथोंकी विशाल सेनाको पीड़ित करने लगे। तत्पश्चात् गरुड़की भाँति झपट्टा मारनेवाले दानव-शत्रु प्रमथगण भी उत्साहपूर्वक युद्ध करनेकी अभिलाषासे दानवोंपर टूट पड़े। उस समय नन्दीश्वरकी अध्यक्षतामें प्रमथगण और तारकासुरकी अध्यक्षतामें दानवयूथ समवेतरूपसे युद्ध करने लगे। उन्हें सेनाएँ भी प्रेरित कर रही थीं। वे चन्द्रमाके समान चमकीली तलवारों, अग्नि-सदृश पीले शूलों और सुदृढ़रूपसे छोड़े गये बाणोंसे परस्पर एक-दूसरेपर प्रहार कर रहे थे। उस समय छोड़े जाते हुए बाणों तथा प्रहार की जाती हुई तलवारोंके रूप ऐसे दीख रहे थे मानो आकाशसे गिरती हुई महोल्काएँ हों॥ २५—३६॥<br><br>शक्तिके आघातसे उनके हृदय छिन्न-भिन्न हो गये थे और वे दयाहीनकी भाँति भूमिपर पड़े हुए थे। इस प्रकार प्रमथगण तथा असुरवृन्द नरकमें पड़े हुए जीवोंकी तरह चीत्कार कर रहे थे। स्वर्णनिर्मित कुण्डलों और प्रभावशाली किरीटोंसे युक्त वीरोंके मस्तक प्रलयकालमें पर्वतशिखरकी भाँति पृथ्वीपर गिर रहे थे। वे कुठार, पट, खड्ग और लोहेकी गदाके आघातसे छिन्न-भिन्न होकर गजेन्द्रोंके समान धराशायी हो रहे थे। कभी
४८६* मत्स्यपुराण *

| गर्जन्ति सहसा हृष्टाः प्रमथा भीमगर्जनाः।<br>साधयन्त्यपरे सिद्धास्त युद्धगान्धर्वमद्भुतम्॥ ४०<br><br>बलवान् भासि प्रमथ दर्पितो भासि दानव।<br>इति चोच्चारयन् वाचं चारणा रणधूर्गताः ॥ ४१<br><br>परिघैराहताः केचिद् दानवैः शङ्करानुगाः।<br>वमन्ते रुधिरं वक्त्रैः स्वर्णधातुमिवाचलाः ॥ ४२<br><br>प्रमथैरपि नाराचैरसुराः सुरशत्रवः।<br>द्रुमैश्च गिरिशृङ्गैश्च गाढमेवाहवे हताः ॥ ४३<br><br>सूदितानथ तान् दैत्यानन्ये दानवपुङ्गवाः।<br>उत्क्षिप्य चिक्षिपुर्वाप्यां मयदानवचोदिताः ॥ ४४<br><br>ते चापि भास्वरैर्देहः स्वर्गलोक इवामराः।<br>उत्तस्थुर्वापीमासाद्य सद्रूपाभरणाम्बराः ॥ ४५<br><br>अथैके दानवाः प्राप्य वापीप्रक्षेपणादसून।<br>आस्फोट्य सिंहनादं च कृत्वाधावंस्तथासुराः ॥ ४६<br><br>दानवाः प्रमथानेतान प्रसर्पत किमासथ।<br>हतानपि हि वो वापी पुनरुज्जीवयिष्यति ॥ ४७ | सहसा भयंकर गर्जना करनेवाले प्रमथगण हर्षपूर्वक गर्जना करने लगते तो इधर सिद्धगण अद्भुत युद्ध-कौशल दिखाते थे। रणभूमिमें आगे चलनेवाले चारण— 'प्रमथ ! तुम तो बलवान् मालूम पड़ते हो,' 'दानव ! तुम गर्वीले दीख रहे हो'—इस प्रकारके वचन बोल रहे थे। दानवोंद्वारा चलाये गये लोहनिर्मित गदाके आघातसे कुछ पार्षदगण मुखसे रक्त उगल रहे थे, जो ऐसे लगते थे, मानो पर्वत सुवर्णधातु उगल रहे हों। उधर प्रमथगण भी रणभूमिमें बाणों, वृक्षों और पर्वत-शिखरोंके प्रहारसे बहुतेरे देवशत्रु असुरोंको पूर्णरूपसे घायल कर उन्हें कालके हवाले कर रहे थे। मयदानवकी आज्ञासे दूसरे दानवश्रेष्ठ उन मरे हुए दानवोंको उठाकर उसी बावलीमें डाल देते थे। उस बावलीमें पड़ते ही वे सभी दानव स्वर्गवासी देवताओंकी तरह तेजस्वी शरीर धारण कर उत्तम आभूषणों और वस्त्रोंसे विभूषित हो बाहर निकल आते थे। तदनन्तर बावलीमें डाल देनेसे जीवित हुए कुछ दानव ताल ठोंककर सिंहनाद करते हुए इधर-उधर दौड़ लगा रहे थे और कह रहे थे—'दानवो! इन प्रमथगणोंपर धावा करो। क्यों बैठे हो ? (अब तुमलोगोंको कोई भय नहीं है; क्योंकि) मर जानेपर भी तुमलोगोंको यह बावली पुनः जीवित कर देगी'॥ ३७-४७॥ | | एवं श्रुत्वा शङ्कुकर्णो वचोऽग्रग्रहसंनिभः ।<br>द्रुतमेवैत्य देवेशमिदं वचनमब्रवीत् ॥ ४८<br><br>सूदिताः सूदिता देव प्रमथैरसुरा ह्यमी।<br>उत्तिष्ठन्ति पुनभीमाः सस्या इव जलोक्षिताः ॥ ४९<br><br>अस्मिन् किल पुरे वापी पूर्णामृतरसाम्भसा।<br>निहता निहता यत्र क्षिप्ता जीवन्ति दानवाः ॥ ५०<br><br>इति विज्ञापयद् देवं शङ्कुकर्णो महेश्वरम्।<br>अभवन् दानवबल उत्पाता वै सुदारुणाः ॥ ५१<br><br>तारकाख्यः सुभीमाक्षो दारितास्यो हरैर्यथा।<br>अभ्यधावत् संक्रुद्धो महादेवरथं प्रति ॥ ५२<br><br>त्रिपुरे तु महान् घोरो भेरीशङ्खरवो बभौ।<br>दानवा निःसृता दृष्ट्वा देवदेवरथे सुरम् ॥ ५३ | दानवोंको ऐसा कहते सुनकर सूर्यके समान तेजस्वी शङ्कुकर्णने शीघ्र ही देवेश्वर शंकरजीके निकट जाकर इस प्रकार कहा—'देव! प्रमथगणोंद्वारा बारंबार मारे गये ये भयंकर असुर पुनः उसी प्रकार जी उठते हैं, जैसे जलके सिञ्चनसे सूखी हुई फसल। निश्चय ही इस पुरमें अमृतरूपी जलसे परिपूर्ण कोई बावली है, जिसमें डाल देनेसे बार-बार मारे गये दानव पुनः जीवित हो जाते हैं।' इस प्रकार शङ्कुकर्णने भगवान् महेश्वरको सूचित किया। उसी समय दानवोंकी सेनामें अत्यन्त भीषण उत्पात होने लगे। तब परम भयानक नेत्रोंवाले तारकाक्षने अत्यन्त कुपित होकर सिंहकी तरह मुँह फैलाये हुए महादेवजीके रथपर धावा किया। उस समय त्रिपुरमें भेरियों और शङ्खोंका महान् भीषण निनाद होने लगा। देवाधिदेव शंकरजीके रथपर (शंकर और) ब्रह्माको उपस्थित देखकर दानवगण त्रिपुरसे बाहर निकले। |

  • अध्याय १३६ * ४८७

| भूकम्पश्चाभवत्तत्र रथाङ्गो* भूगतोऽभवत्।<br>दृष्ट्वा क्षोभमगाद्रुद्रः स्वयम्भूश्च पितामहः॥ ५४<br>ताभ्यां देववरिष्ठाभ्यामन्वितः स रथोत्तमः।<br>अनायतनमासाद्य सीदते गुणवानिव॥ ५५<br>धातुक्षये देह इव ग्रीष्मे चाल्पमिवोदकम्।<br>शैथिल्यं याति स रथः स्नेहो विप्रकृतो यथा॥ ५६<br>रथादुत्पत्यात्मभूर्वै सीदन्तं तु रथोत्तमम्।<br>उज्जहार महाप्राणो रथं त्रैलोक्यरूपिणम्॥ ५७<br>तदा शराद् विनिष्पत्य पीतवासा जनार्दनः।<br>वृषरूपं महत्कृत्वा रथं जग्राह दुर्धरम्॥ ५८<br>स विषाणाभ्यां त्रैलोक्यं रथमेव महारथः।<br>प्रगृह्योद्वहते सज्जं कुलं कुलवहो यथा॥ ५९<br>तारकाख्योऽपि दैत्येन्द्रो गिरीन्द्र इव पक्षवान्।<br>अभ्यद्रवत्तदा देवं ब्रह्माणं हतवांश्च सः॥ ६०<br>स तारकाख्याभिहतः प्रतोदं न्यस्य कूबरे।<br>विजज्वाल मुहुर्ब्रह्मा श्वासं वक्त्रात् समुद्गिरन्॥ ६१ | तभी वहाँ ऐसा भयंकर भूकम्प आया, जिससे (शिवजीके) रथका चक्का पृथ्वीमें प्रविष्ट हो गया। यह देखकर भगवान् रुद्र और स्वयम्भू ब्रह्मा क्षुब्ध हो उठे। उन दोनों देवश्रेष्ठोंसे युक्त वह उत्तम रथ कहीं ठहरनेका स्थान न पाकर स्थानरहित गुणी पुरुषकी तरह विपत्तिग्रस्त हो गया। वह रथ वीर्यनाश हो जानेपर शरीर, ग्रीष्म ऋतुमें अल्प जलवाले जलाशय और तिरस्कृत स्नेहकी तरह शिथिलताको प्राप्त हो गया। इस प्रकार जब वह श्रेष्ठ रथ नीचे जाने लगा, तब महाबली स्वयम्भू ब्रह्माने उससे कूदकर उस त्रैलोक्यरूपी रथको ऊपर उठा दिया। इतनेमें ही पीताम्बरधारी भगवान् जनार्दनने बाणसे निकलकर विशाल वृषभका रूप धारण किया और उस दुर्धर रथको उठा लिया। वे महारथी जनार्दन त्रिलोकीरूप उस रथको अपने सींगोंपर उठाकर उसी तरह ढो रहे थे, जैसे कुलपति अपने संगठित कुलका भार वहन करता है। उसी समय पक्षधारी गिरिराजकी तरह विशालकाय दैत्येन्द्र तारकासुरने भी देवेश्वर ब्रह्मापर धावा बोल दिया और उन्हें घायल कर दिया। तब तारकासुरके प्रहारसे घायल हुए ब्रह्मा रथके कूबरपर चाबुक रखकर मुखसे बारंबार लम्बी साँस छोड़ते हुए (क्रोधसे) प्रज्वलित हो उठे॥ ४८–६१॥ | | तत्र दैत्यैर्महानादो दानवैरपि भैरवः।<br>तारकाख्यस्य पूजार्थं कृतो जलधरोपमः॥ ६२<br>रथचरणकरोऽथ महामृधे<br>वृषभवपुर्वृषभेन्द्रपूजितः।<br>दितितनयबलं विमर्द्य सर्वं<br>त्रिपुरपुरं प्रविवेश केशवः॥ ६३<br>सजलजलदराजितां समस्तां<br>कुमुदवरोत्पलफुल्लपङ्कजाढ्याम्।<br>सुरगुरुरपिबत् पयोऽमृतं त-<br>द्रविरिव संचितशार्वरं तमोऽन्धम्॥ ६४<br>वापीं पीत्वासुरेन्द्राणां पीतवासा जनार्दनः।<br>नर्दमानो महाबाहुः प्रविवेश शरं ततः॥ ६५<br>ततोऽसुरा भीमगणेश्वरैर्हताः<br>प्रहारसंवर्धितशोणितापगाः।<br>पराङ्मुखा भीममुखैः कृता रणे<br>यथा नयाभ्युद्यततत्परैर्न रैः ॥ ६६ | वहाँ दैत्य और दानव तारकासुरका सत्कार करनेके लिये मेघकी गर्जनाके समान अत्यन्त भयंकर सिंहनाद करने लगे। यह देखकर वृषभका शरीर धारण करनेवाले एवं शंकरद्वारा पूजित भगवान् केशव हाथमें सुदर्शन चक्र धारण कर उस महासमरमें दैत्योंकी सारी सेनाओंका मर्दन करते हुए त्रिपुरमें प्रविष्ट हुए। वहाँ वे उस बावलीपर जा पहुँचे, जो चारों ओरसे बादलोंसे सुशोभित तथा खिली हुई कुमुदिनी, नीलकमल और अन्यान्य कमलोंसे व्याप्त थी। फिर तो उन देवश्रेष्ठने उसके अमृतरूपी जलको इस प्रकार पी लिया, जैसे सूर्य रात्रिमें संचित हुए घने अन्धकारको पी जाते हैं। इस प्रकार पीताम्बरधारी महाबाहु जनार्दन असुरेन्द्रोंकी बावलीका अमृत पीकर सिंहनाद करते हुए पुनः उसी बाणमें प्रविष्ट हो गये। तत्पश्चात् भयावने मुखवाले भयंकर गणेश्वरोंने असुरोंको मारना प्रारम्भ किया। उनके प्रहारसे घायल हुए दानवोंके रुधिरसे नदियाँ बह चलीं। वे उसी प्रकार युद्धविमुख कर दिये गये, जैसे नयशील पुरुष अन्यायीयोंको विमुख कर देते हैं। |


* कुछ प्रतियोंके अनुसार यहाँ यदि 'शताङ्ग' पाठ भी हो तो भी विष्णु आदि सैकड़ों अङ्गयुक्त रथ ही अभिप्रेत होगा।

४८८ * मत्स्यपुराण *


| स तारकाख्यस्तडिमालिरेव च<br>मयेन सार्धं प्रमथैरभिद्रुताः।<br>पुरं परावृत्य नु ते शरार्दिता<br>यथा शरीरं पवनोदये गताः॥ ६७<br>गणेश्वराभ्युद्यतदर्पकाशिनो<br>महेन्द्रनन्दीश्वरषण्मुखा युधि।<br>विनेदुरुच्चैर्जहसुश्च दुर्मदा<br>जयेम चन्द्रादिदिगीश्वरैः सह॥ ६८ | इस प्रकार प्रमथगणोंद्वारा खदेड़े गये एवं बाणोंके प्रहारसे घायल मयके साथ तारकासुर और विद्युन्माली त्रिपुरमें ऐसे लौट आये, मानो उनके शरीरसे प्राण ही निकल गये हों। उस समय युद्धस्थलमें महेन्द्र, नन्दीश्वर और स्वामिकार्तिक गणेश्वरोंके साथ दर्पसे सुशोभित हो रहे थे। वे उन्मत्त होकर सिंहनाद एवं अट्टहास करते हुए कहने लगे कि अब चन्द्रमा आदि दिक्पालोंसहित हमलोग अवश्य विजयी होंगे॥ ६२—६८॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे त्रिपुरदाहे षट्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १३६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणे त्रिपुरदाहप्रसङ्गमें एक सौ छत्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १३६॥


एक सौ सैंतीसवाँ अध्याय

वापी-शोषणसे मयको चिन्ता, मय आदि दानवोंका त्रिपुरसहित समुद्रमें प्रवेश तथा शंकरजीका इन्द्रको युद्ध करनेका आदेश

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
प्रमथैः समरे भिन्नास्त्रैपुरास्ते सुरारयः।<br>पुरं प्रविविशुर्भीताः प्रमथैर्भग्नगोपुरम्॥ १<br>शीर्णदंष्ट्रा यथा नागा भग्नशृङ्गा यथा वृषाः।<br>यथा विपक्षाः शकुना नद्यः क्षीणोदका यथा॥ २<br>मृतप्रायास्तथा दैत्या दैवत्तैर्विकृताननाः।<br>बभूवुस्ते विमनसः कथं कार्यमिति ब्रुवन्॥ ३<br>अथ तान् म्लानमनसस्तदा तामरसाननः।<br>उवाच दैत्यो दैत्यानां परमाधिपतिर्मयः॥ ४<br>कृत्वा युद्धानि घोराणि प्रमथैः सह सामरैः।<br>तोषयित्वा तथा युद्धे प्रमथानमरैः सह॥ ५<br>यूयं यत् प्रथमं दैत्याः पश्चाच्च बलपीडिताः।<br>प्रविष्टा नगरं त्रासात् प्रमथैर्भृशमर्दिताः॥ ६<br>अप्रियं क्रियते व्यक्तं देवैर्नास्त्यत्र संशयः।<br>यत्र नाम महाभागाः प्रविशन्ति गिरेर्वनम्॥ ७<br>अहो हि कालस्य बलमहो कालो हि दुर्जयः।<br>यत्रेद्दृशस्य दुर्गस्य उपरोधोऽयमागतः॥ ८ऋषियो! इस प्रकार समरभूमिमें प्रमथगणोंद्वारा घायल किये गये त्रिपुरवासी देवशत्रु दानव भयभीत होकर त्रिपुरमें लौट गये। उस समय प्रमथोंने त्रिपुरके फाटकको भी नष्ट-भ्रष्ट कर दिया था। जैसे नष्ट हुए दाँतोंवाले सर्प, टूटे हुए सींगोंवाले साँड़, डैनारहित पक्षी और क्षीण जलवाली नदियाँ शोभाहीन हो जाती हैं, उसी प्रकार देवताओंके प्रहारसे दैत्यवृन्द मृतप्राय हो गये थे। उनके मुख विकृत हो गये थे और वे खिन्न मनसे कह रहे थे कि अब क्या किया जाय? तब कमल-सदृश मुखवाले दैत्योंके चक्रवर्ती सम्राट् मय दैत्यने उन मलिन मनवाले दैत्योंसे कहा—'दैत्यो! इसमें सन्देह नहीं है कि तुमलोगोंने पहले युद्धभूमिमें देवताओंसहित प्रमथगणोंके साथ भयंकर युद्ध करके उन्हें संतुष्ट किया है, किंतु पीछे तुमलोग देवसेनासे पीड़ित और प्रमथोंके प्रहारसे अत्यन्त घायल होकर भयवश नगरमें भाग आये हो। निस्संदेह देवगण प्रकटरूपमें हमलोगोंका अप्रिय कर रहे हैं, इसी कारण ये महान् भाग्यशाली दैत्य इस समय भागकर पर्वतीय वनोंमें छिप रहे हैं। अहो! कालका बल महान् है! अहो! यह काल किसी प्रकार जीता नहीं जा सकता। कालके ही प्रभावसे त्रिपुर-जैसे दुर्गपर यह अवरोध उत्पन्न हो गया है।'

बुझाकर त्रिपुरकी रक्षामें नियुक्त करना तथा त्रिपुरकौमुदीका वर्णन

* अध्याय १३७ *४८९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मये विवदमाने तु नर्दमान इवाम्बुदे।<br>बभूवुर्निष्प्रभा दैत्या ग्रहा इन्दूदये यथा॥ ९मेघकी भाँति कड़कते हुए मयके इस प्रकार विषाद करनेपर सभी दैत्य उसी प्रकार निस्तेज हो गये, जैसे चन्द्रमाके उदय होनेपर अन्य ग्रह मलिन हो जाते हैं॥ १—९॥
वापीपालास्ततोऽभ्येत्य नभः काल इवाम्बुदाः।<br>मयमाहुर्यमप्रख्यं साञ्जलिप्रग्रहाः स्थिताः॥ १०<br><br>या सामृतरसा गूढा वापी वै निर्मिता त्वया।<br>समाकुलोत्पलवना समीनाकुलपङ्कजा॥ ११<br><br>पीता सा वृषरूपेण केनचिद् दैत्यनायक।<br>वापी सा साम्प्रतं दृष्टा मृतसंज्ञा इवाङ्गना॥ १२<br><br>वापीपालवचः श्रुत्वा मयोऽसौ दानवप्रभुः।<br>कष्टमित्यसकृत् प्रोच्य दितिजानिदमब्रवीत्॥ १३इसी समय वर्षाकालीन मेघकी तरह शरीरधारी बावलीके रक्षक दैत्य यमराज-सदृश भयंकर मयके निकट आकर हाथ जोड़कर (अभिवादन करके) खड़े हो गये और इस प्रकार बोले—'दैत्यनायक! आपने अमृतरूपी जलसे भरी हुई जिस गुप्त बावलीका निर्माण किया था, जो नील कमल-वनसे व्याप्त थी तथा जिसमें मछलियाँ और विभिन्न प्रकारके भी कमल भरे हुए थे, उसे वृषभरूपधारी किसी देवताने पी लिया। इस समय वह बावली मूर्च्छित हुई सुन्दरी स्त्रीकी भाँति दीख रही है।' बावलीके रक्षकोंकी बात सुनकर दानवराज मय 'कष्ट है'—ऐसा कई बार कहकर दैत्योंसे इस प्रकार बोला—
मया मायाबलकृता वापी पीता त्वियं यदि।<br>विनष्टाः स्म न संदेहस्त्रिपुरं दानवा गतम्॥ १४<br><br>निहतान् निहतान् दैत्यानाजीवयति दैवतैः।<br>पीता वा यदि वा वापी पीता वै पीतवाससा॥ १५<br><br>कोऽन्यो मन्मायया गुप्तां वापीममृततोयिनीम्।<br>पास्यते विष्णुमजितं वर्जयित्वा गदाधरम्॥ १६<br><br>सुगुह्यमपि दैत्यानां नास्त्यस्याविदितं भुवि।<br>यत्र मद्वरकौशल्यं विज्ञानं न वृतं बुधैः॥ १७'दानवो! मेरे द्वारा मायाके बलसे रची हुई बावलीको यदि किसीने पी लिया तो निश्चय समझो कि हमलोग नष्ट हो गये और त्रिपुरको भी गया हुआ ही समझो। हाय! जो देवताओंद्वारा बार-बार मारे गये दैत्योंको जीवन-दान देती थी, वह बावली पी ली गयी! यदि वह सचमुच पी ली गयी तो (निश्चय ही) उसे पीताम्बरधारी विष्णुने ही पीया होगा। भला, गदाधारी अजेय विष्णुको छोड़कर दूसरा कौन ऐसा समर्थ है, जो मेरी मायाद्वारा गुप्त एवं अमृतरूपी जलसे भरी हुई बावलीको पी सकेगा? भूतलपर दैत्योंकी गुप्त-से-गुप्त बात विष्णुसे अज्ञात नहीं है। मेरी वरप्राप्तिकी कुशलता, जिसे विद्वान् लोग नहीं जान सके, विष्णुसे छिपी नहीं है।
समोऽयं रुचिरो देशो निर्द्रुमो निर्द्रुमाचलः।<br>नवाम्भःपूरितं कृत्वा बाधन्तेऽस्मान् मरुद्गणाः॥ १८<br><br>ते यूयं यदि मन्यध्वं सागरोपरि धिष्ठिताः।<br>प्रमथानां महावेगं सहामः श्वसनोपमम्॥ १९<br><br>एतेषां च समारम्भास्तस्मिन् सागरसम्प्लवे।<br>निरुत्साहा भविष्यन्ति एतद्रथपथावृताः॥ २०हमारा यह देश सुन्दर और समतल है। यह वृक्ष और पर्वतसे रहित है। फिर भी मरुद्गण इसे नूतन जलसे परिपूर्ण करके हमलोगोंको बाधा पहुँचा रहे हैं। इसलिये यदि तुमलोगोंको स्वीकार हो तो हमलोग सागरके ऊपर स्थित हो जायँ और वहींसे प्रमथोंके वायुके समान महान् वेगको सहन करें। सागरकी उस बाढ़में इनका सारा उद्योग उत्साहहीन हो जायगा और उस विशाल रथका मार्ग रुक जायगा।
युध्यतां निघ्नतां शत्रून् भीतानां च द्रविष्यताम्।<br>सागरोऽम्बरसङ्काशः शरणं नो भविष्यति॥ २१इसलिये युद्ध करते समय, शत्रुओंको मारते समय और भयभीत होकर भागते समय हमलोगोंके लिये यह सागर आकाशकी भाँति शरणदाता हो जायगा।'
इत्युक्त्वा स मयो दैत्यो दैत्यानामधिपस्तदा।<br>त्रिपुरेण ययौ तूर्णं सागरं सिन्धुबान्धवम्॥ २२ऐसा कहकर दैत्यराज मयदानव तुरंत त्रिपुरसहित नदियोंके बन्धुस्वरूप सागरकी ओर प्रस्थित हुआ। फिर

४९० * मत्स्यपुराण *

संस्कृतहिन्दी अनुवाद
सागरे जलगम्भीर उत्पपात पुरं वरम्।<br>अवतस्थुः पुराण्य्येव गोपुराभरणानि च॥ २३तो वह श्रेष्ठ त्रिपुर नामक नगर अगाध जलवाले सागरके ऊपर मँडराने लगा। उसके फाटक और आभूषणादि-सहित तीनों पुर यथास्थान स्थित हो गये॥ १०—२३॥
अपक्रान्ते तु त्रिपुरे त्रिपुरारिस्त्रिलोचनः।<br>पितामहमुवाचेदं वेदवादविशारदम्॥ २४<br>पितामह दृढं भीता भगवन् दानवा हि नः।<br>विपुलं सागरं ते तु दानवाः समुपाश्रिताः॥ २५<br>यत एव हि ते यातास्त्रिपुरेण तु दानवाः।<br>तत एव रथं तूर्णं प्रापयस्व पितामह॥ २६इस प्रकार त्रिपुरके दूर हट जानेपर त्रिपुरारि भगवान् शंकरने वेदवादमें निपुण ब्रह्मासे इस प्रकार कहा—'ऐश्वर्यशाली पितामह! दानवगण हमलोगोंसे भलीभाँति डर गये हैं, इसलिये वे भागकर विशाल सागरकी शरणमें चले गये। पितामह! त्रिपुरसहित वे दानव जिस मार्गसे गये हैं, उसी मार्गसे आप शीघ्र ही मेरे रथको वहाँ पहुँचाइये।'
सिंहनादं ततः कृत्वा देवा देवरथं च तम्।<br>परिवार्य ययुर्हृष्टाः सायुधाः पश्चिमोदधिम्॥ २७<br>ततोऽमरामरगुरुं परिवार्य भवं हरम्।<br>नर्दयन्तो ययुस्तूर्णं सागरं दानवालयम्॥ २८तब आयुधधारी देवगण हर्षपूर्वक सिंहनाद करके और उस देवरथको चारों ओरसे घेरकर पश्चिम सागरकी ओर चल पड़े। तत्पश्चात् देवगण देवश्रेष्ठ भगवान् शंकरको चारों ओरसे घेरकर सिंहनाद करते हुए शीघ्र ही दानवोंके निवासस्थान सागरकी ओर प्रस्थित हुए।
अथ चारुपताकभूषितं<br>पटहाडम्बरशङ्खनादितम्।<br>त्रिपुरमभिसमीक्ष्य देवता<br>विविधबला ननदुर्यथा घनाः॥ २९वहाँ पहुँचनेपर सुन्दर पताकाओंसे विभूषित तथा ढोल, नगारे और शङ्खके शब्दोंसे निनादित त्रिपुरको देखकर अनेकों सेनाओंसे सम्पन्न देवगण बादलोंकी तरह गर्जना करने लगे।
असुरवरपुरेऽपि दारुणो<br>जलधररावमृदङ्गगह्वरः।<br>दनुतनयनिनादमिश्रितः<br>प्रतिनिधिः संक्षुभितार्णवोपमः॥ ३०उधर असुरश्रेष्ठ मयके पुरमें भी दानवोंके सिंहनादके साथ-साथ मेघ-गर्जनाके सदृश मृदंगोंका भयंकर एवं गम्भीर शब्द हो रहा था, जो क्षुब्ध हुए महासागरकी गर्जनाके समान प्रतीत हो रहा था।
अथ भुवनपतिर्गतिः सुराणा-<br>मरिमृगयाम्मददात् सुलब्धबुद्धिः।<br>त्रिदशगणपतिं ह्युवाच शक्रं<br>त्रिपुरगतं सहसा निरीक्ष्य शत्रुम्॥ ३१तदनन्तर देवताओंके आश्रयस्थान प्रत्युत्पन्नमति त्रिभुवनपति शंकर शत्रुओंका शिकार करनेके लिये उद्यत हो गये। तब उन्होंने सहसा शत्रुओंको त्रिपुरमें प्रवेश करते देखकर देवताओं और गणोंके सेनानायक इन्द्रसे इस प्रकार कहा—
त्रिदशगणपते निशामयैतत्<br>त्रिपुरनिकेतनं दानवाः प्रविष्टाः।<br>यमवरुणकुबेरषण्मुखैस्तत्<br>सह गणपैरपि हन्मि तावदेव॥ ३२<br>विहितपरबलाभिघातभूतं<br>व्रज जलधेस्तु यतः पुराणि तस्थुः।<br>स रथवरगतो भवः समर्थो<br>ह्युदधिमगात् त्रिपुरं पुनर्निहन्तुम्॥ ३३<br>इति परिगणयन्तो दितेः सुता<br>ह्यावतस्थुर्लवणार्णवोपरिष्टात्।<br>अभिभवत् त्रिपुरं सदानवेन्द्रं<br>शरवर्षैर्मुसलैश्च वज्रमिश्रैः॥ ३४'देवताओं और गणेश्वरोंके नायक इन्द्र! आपलोग मेरी यह बात सुनें। दानवलोग अपने निवासस्थान त्रिपुरमें घुस गये हैं, अतः आप यम, वरुण, कुबेर, कार्तिकेय तथा गणेश्वरोंको साथ लेकर इनका संहार करें। तबतक मैं भी इन्हें मार रहा हूँ। आप शत्रुसेनापर प्रहार करते हुए समुद्रके उस स्थानतक बढ़ते चलें, जहाँ तीनों पुर स्थित हैं। यह देखकर जब उन दैत्योंको यह विदित हो जायगा कि सामर्थ्यशाली शंकर उस श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हो पुनः त्रिपुरका विनाश करनेके लिये समुद्रतटपर आ गये हैं, तब वे लवणसागरके ऊपर निकल आयेंगे। तब आप वज्रसहित मुसलों एवं बाणोंकी वर्षा करते हुए दानवेन्द्रोंसहित त्रिपुरपर आक्रमण कर दें।
* अध्याय १३८ *४९१
अहमपि रथवर्यमास्थितः<br>सुरवरवर्य भवेय पृष्ठतः ।<br>असुरवरवधार्थमुद्यतानां<br>प्रतिविदधामि सुखाय तेऽनघ ॥ ३५<br>इति भववचनप्रचोदितो<br>दशशतनयनवपुः समुद्यतः ।<br>त्रिपुरपुरजिघांसया हरिः<br>प्रविकसिताम्बुजलोचनो ययौ ॥ ३६सुरश्रेष्ठ ! उस समय मैं भी इस श्रेष्ठ रथपर बैठा हुआ असुरेन्द्रोंका वध करनेके लिये उद्यत आपलोगोंके पीछे रहूँगा। अनघ ! मैं सर्वथा आपलोगोंके सुखका विधान करता रहूँगा।' इस प्रकार शंकरजीके वचनोंसे प्रेरित होकर एक हजार नेत्रोंवाले इन्द्र, जिनके नेत्र प्रफुल्ल कमलके सदृश सुन्दर थे, त्रिपुरके विनाशकी इच्छासे उद्यत होकर आगे बढ़े ॥ २४—३६ ॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे त्रिपुराक्रमणं नाम सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३७ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें त्रिपुराक्रमण नामक एक सौ सैंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १३७ ॥


एक सौ अड़तीसवाँ अध्याय

देवताओं और दानवोंमें घमासान युद्ध तथा तारकासुरका वध

सूत उवाच<br>मघवा तु निहन्तुं तानसुरानमनेश्वरः ।<br>लोकपाला ययुः सर्वे गणपालाश्च सर्वशः ॥ १<br>ईश्वरेणोर्जिताः सर्व उत्पेतुरश्चाम्बरे तदा ।<br>खगतास्तु विरेजुस्ते पक्षवन्त इवाचलाः ॥ २<br>प्रययुस्तत्पुरं हन्तुं शरीरमिव व्याधयः ।<br>शङ्खाडम्बरनिर्घोषैः पणवान् पटहानपि ।<br>नादयन्तः पुरो देवा दृष्टास्त्रिपुरवासिभिः ॥ ३<br>हरः प्राप्त इतीवोक्त्वा बलिनस्ते महासुराः ।<br>आजग्मुः परं क्षोभमत्येयेष्विव सागराः ॥ ४<br>सुरतूर्यरवं श्रुत्वा दानवा भीमदर्शनाः ।<br>निनेदुर्वादयन्तश्च नानावाद्यान्यनेकशः ॥ ५<br>भूयोदीरितवीर्यास्ते परस्परकृतागसः ।<br>पूर्वदेवाश्च देवाश्च सूदयन्तः परस्परम् ॥ ६<br>आक्रोशेऽपि समप्रख्ये तेषां देहनिकृन्तनम् ।<br>प्रवृत्तं युद्धमतुलं प्रहारकृतनिःस्वनम् ॥ ७<br>निष्यतन्त इवादित्याः प्रज्वलन्त इवाग्नयः ।<br>शंसन्त इव नागेन्द्रा भ्रमन्त इव पक्षिणः ।<br>गिरीन्द्रा इव कम्पन्तो गर्जन्त इव तोयदाः ॥ ८**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो ! शंकरजीद्वारा उत्साहित किये जानेपर देवराज इन्द्र, सभी लोकपाल और गणपाल सब ओरसे उन असुरोंका वध करनेके लिये चले और आकाशकी ओर उछल पड़े। आकाशमें पहुँचकर वे पंखधारी पर्वतकी तरह शोभा पाने लगे। तत्पश्चात् वे शङ्ख और डंकेके निर्घोषके साथ-साथ ढोलों और नगाड़ोंको पीटते हुए त्रिपुरका विनाश करनेके लिये उसी प्रकार आगे बढ़े, जैसे व्याधियाँ शरीरको नष्ट कर देती हैं। इतनेमें त्रिपुरवासी दानवोंने देवगणोंको आगे बढ़ते हुए देख लिया। फिर तो वे महाबली असुर 'शंकर (यहाँ भी) आ गये'—ऐसा कहकर प्रलयकालीन सागरोंकी तरह परम क्षुब्ध हो उठे। तब भयंकर रूपधारी दानव देवताओंकी तुरहियोंका शब्द सुनकर नाना प्रकारके बाजे बजाते हुए बारंबार उच्च स्वरसे गर्जना करने लगे। तत्पश्चात् पुनः पराक्रम प्रकट करनेवाले वे दानव और देव परस्पर क्रुद्ध होकर एक-दूसरेपर प्रहार करने लगे। दोनों सेनाओंमें समानरूपसे सिंहनाद हो रहे थे। उनके शरीर कट-कटकर गिर रहे थे। फिर तो प्रहार करनेवालोंकी गर्जनाके साथ-साथ अनुपम युद्ध छिड़ गया। उस समय ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो अनेकों सूर्य गिर रहे हैं, अग्नयाँ प्रज्वलित हो उठी हैं, विषधर सर्प फुफकार मार रहे हैं, पक्षी आकाशमें चक्कर काट रहे हैं, पर्वत काँप रहे हैं, बादल
४९२* मत्स्यपुराण *

| जृम्भन्त इव शार्दूलाः प्रवान्त इव वायवः।<br>प्रवृद्धोर्मितरङ्गौघाः क्षुभ्यन्त इव सागराः॥ ९<br>प्रमथाश्च महाशूरा दानवाश्च महाबलाः।<br>युयुधुर्निश्चला भूत्वा वज्रा इव महाचलैः॥ १० | गरज रहे हैं, सिंह जमुहाई ले रहे हैं, भयानक झंझावात चल रहा है और उछलती हुई लहरोंके समूहसे सागर क्षुब्ध हो उठा है। इस प्रकार महान् शूरवीर प्रमथ और महाबली दानव उसी प्रकार डटकर युद्ध कर रहे थे, जैसे महान् पर्वतोंसे टकरानेपर भी वज्र अटल रहता है॥ ९-१०॥ | | कार्मुकाणां विकृष्टानां बभूवुर्दारुणा रवाः।<br>कालानुगानां मेघानां यथा वियति वायुना॥ ११ | जैसे आकाशमें वायुद्वारा प्रेरित किये जानेपर प्रलयकालीन मेघोंकी गर्जना होती है, उसी तरह खींचे जाते हुए धनुषोंके भीषण शब्द हो रहे थे। | | आहुश्च युद्धे मा भैषीः क्व यास्यसि मृतो ह्यसि।<br>प्रहराशु स्थितोऽस्म्यत्र एहि दर्शय पौरुषम्॥ १२<br>गृहाण छिन्धि भिन्धीति खाद मारय दारय।<br>इत्यन्योऽन्यमनूच्चार्य प्रययुर्यमसादनम्॥ १३ | युद्धभूमिमें दोनों ओरके वीर परस्पर 'मत डरो, कहाँ भागकर जाओगे, अब तो तुम मरे ही हो, शीघ्र प्रहार करो, मैं यहाँ खड़ा हूँ, आओ और अपना पुरुषार्थ दिखाओ, पकड़ लो, काट डालो, विदीर्ण कर दो, खा लो, मार डालो, फाड़ डालो'—ऐसा शब्द बोल रहे थे और पुनः शान्त होकर यमलोकके पथिक बन जाते थे। | | खड्गापवर्जिताः केचित् केचिच्छिन्ना परश्वधैः।<br>केचिन्मुद्गरचूर्णांश्च केचिद् बाहुभिराहताः॥ १४<br>पट्टिशैः सूदिताः केचित् केचिच्छूलविदारिताः।<br>दानवाः शरपुष्पाभाः सवना इव पर्वताः।<br>निपतन्त्यर्णवजले भीमनक्रमितिमिङ्गिले॥ १५ | उनमेंसे कुछ वीर तलवारसे काट डाले गये थे, कुछ फरसोंसे छिन्न-भिन्न कर दिये गये थे, कुछ मुद्गरोंकी मारसे चूर्ण-सरीखे हो गये थे, कुछ हाथके चपेटोंसे घायल कर दिये गये, कुछ पट्टिशों (पटों)-के प्रहारसे मार डाले गये और कुछ शूलोंसे विदीर्ण कर दिये गये। सरपतके फूलकी-सी कान्तिवाले दानव वनसहित पर्वतोंकी तरह भयंकर नाक और तिमिंगिलोंसे भरे हुए समुद्रके जलमें गिर रहे थे। | | व्यसुभिः सुनिबद्धाङ्गैः पतमानैः सुरेतरैः।<br>सम्बभूवार्णवे शब्दः सजलाम्बुदनिःस्वनः॥ १६ | दानवोंके कवच आदिसे भलीभाँति बँधे हुए प्राणरहित शरीरोंके समुद्रमें गिरनेसे सजल जलधरकी गर्जनाके समान शब्द हो रहा था। | | तेन शब्देन मकरा नक्रास्तिमितिमिङ्गिलाः।<br>मत्ता लोहितगन्धेन क्षोभयन्तो महार्णवम्॥ १७<br>परस्परेण कलहं कुर्वाणा भीममूर्तयः।<br>भ्रमन्ते भक्षयन्तश्च दानवानां च लोहितम्॥ १८ | उस शब्दसे तथा दानवोंके रुधिरकी गन्धसे मतवाले हुए मगर, नाक, तिमि और तिमिंगिल आदि जन्तु महासागरको क्षुब्ध कर रहे थे। वे भयंकर आकारवाले जलजन्तु परस्पर झगड़ते हुए दानवोंका रुधिर पान कर चक्कर काट रहे थे। | | सरथान् सायुधान् साश्वान् सवस्त्राभरणावृतान्।<br>जग्रसुस्तिमयो दैत्यान् द्रावयन्तो जलेचरान्॥ १९<br>मृधं यथासुराणां च प्रमथानां प्रवर्तते।<br>अम्बरेऽम्भसि च तथा युद्धं चक्रुर्जलेचराः॥ २० | यूथ-के-यूथ मगरमच्छ अन्य जल-जन्तुओंको खदेड़कर रथ, आयुध, अश्व, वस्त्र और आभूषणोंसहित दैत्योंको निगल जाते थे। जिस प्रकार आकाशमें दानवों और प्रमथोंका युद्ध चल रहा था, उसी तरह समुद्रमें जल-जन्तु (शवोंको खानेके लिये) परस्पर लड़ रहे थे॥ ११-२०॥ | | यथा भ्रमन्ति प्रमथाः सदैत्या-<br>  स्तथा भ्रमन्ते तिमयः सनक्राः।<br>यथैव छिन्दन्ति परस्परं तु<br>  तथैव क्रन्दन्ति विभिन्नदेहाः॥ २१ | उस समय जैसे आकाशमें प्रमथगण दैत्योंके साथ युद्ध करते हुए चक्कर काट रहे थे, वैसे ही जलमें मगरमच्छ नाकोंके साथ झगड़ते हुए घूम रहे थे। जैसे देवता और दानव परस्पर एक-दूसरेके शरीरको काट रहे थे, वैसे ही मगरमच्छ और नाक भी एक-दूसरेके शरीरको |

१४०- देवताओं और दानवोंका भीषण संग्राम, नन्दीश्वरद्वारा विद्युन्मालीका वध, मयका पलायन तथा शङ्करजीकी त्रिपुरपर विजय

  • अध्याय १३८ * ४९३
व्रणाननैर्ङ्गरसं स्रवद्भिः<br>सुरासुरैर्नक्रतिमिङ्गिलैश्च ।<br>कृतो मुहूर्तेन समुद्रीदेशः<br>सरक्ततोयः समुदीर्णतोयः॥ २२विदीर्ण कर चीत्कार कर रहे थे। देवताओं, असुरों, नाकों और तिमिंगिलोंके घावों और मुखोंसे बहते हुए रुधिरसे समुद्रके उस प्रदेशका जल मुहूर्तमात्रके लिये रक्तयुक्त हो गया और वहाँ बाढ़ आ गयी। उस त्रिपुरका
पूर्वं महाम्भोधरपर्वताभं<br>द्वारं महान्तं त्रिपुरस्य शक्रः।<br>निपीड्य तस्थौ महता बलेन<br>युक्तोऽमराणां महता बलेन॥ २३पूर्वद्वार अत्यन्त विशाल और काले मेघ तथा पर्वतके समान कान्तिमान् था। महान् बलशाली इन्द्र देवताओंकी विशाल सेनाके साथ उस द्वारको अवरुद्ध कर खड़े थे।
तथोत्तरं सोऽन्तरजो हरस्य<br>बालार्कजाम्बूनदतुल्यवर्णः।<br>स्कन्दः पुरद्वारमथारुरोह<br>वृद्धोऽस्तशृङ्गं प्रपतन्निवार्कः॥ २४उसी प्रकार उदयकालीन सूर्य और सुवर्णके तुल्य रंगवाले शंकरजीके आत्मज स्कन्द त्रिपुरके उत्तरद्वारपर ऐसे चढ़े हुए थे मानो बढ़े हुए सूर्य अस्ताचलके शिखरोंपर चढ़ रहे हों।
यमश्च वित्ताधिपतिश्च देवो<br>दण्डान्वितः पाशवरायुधश्च।<br>देवारिणस्तस्य पुरस्य द्वारं<br>ताभ्यां तु तत्पश्चिमतो निरुद्धम्॥ २५दण्डधारी यमराज और अपने श्रेष्ठ अस्त्र पाशको धारण किये हुए कुबेर—ये दोनों देवता उस देवशत्रु मयके पुरके पश्चिमद्वारपर घेरा डाले हुए थे।
दक्षारिरुद्रस्तपनायुताभः<br>स भास्वता देवरथेन देवः।<br>तद्दक्षिणद्वारमरेः पुरस्य<br>रुद्ध्वावतस्थो भगवांस्त्रिनेत्रः॥ २६दस हजार सूर्योंकी-सी आभावाले दक्षके शत्रु त्रिनेत्रधारी भगवान् रुद्रदेव उस उद्दीप्त देवरथपर आरूढ़ होकर शत्रु-नगरके दक्षिणद्वारको रोककर स्थित थे।
तुङ्गानि वेश्मानि सगोपुराणि<br>स्वर्णानि कैलासशशिप्रभाणि।<br>प्रह्लादरूपाः प्रमथावरुद्धा<br>ज्योतींषि मेघा इव चाश्मवर्षाः॥ २७उस त्रिपुरके फाटकोंसहित स्वर्णनिर्मित ऊँचे-ऊँचे महलोंको, जो कैलास और चन्द्रमाके सदृश चमक रहे थे, प्रसन्न मुखवाले प्रमथोंने उसी प्रकार अवरुद्ध कर रखा था, जैसे उपलोंकी वर्षा करनेवाले मेघ ज्योतिर्गणोंको घेर लेते हैं।
उत्पाट्य चोत्पाट्य गृहाणि तेषां<br>सशैलमालासमवेदिकानि ।<br>प्रक्षिप्य प्रक्षिप्य समुद्रमध्ये<br>कालाम्बुदाभाः प्रमथा विनेदुः॥ २८काले मेघकी-सी कान्तिवाले प्रमथगण दानवोंके पर्वतमालाके सदृश ऊँची-ऊँची वेदिकाओंसे युक्त गृहोंको, जो लाल वर्णवाले तथा अशोक-वृक्षों एवं अन्यान्य वनोंसे युक्त थे और जिनमें कोयलें कूक रही थीं, उखाड़-उखाड़कर लगातार समुद्रमें फेंक रहे थे और उच्च स्वरसे गर्जना कर रहे थे।
रक्तानि चाशेषवनैर्युतानि<br>साशोकखण्डानि सकोकिलानि।<br>गृहाणि हे नाथ पितः सुतेति<br>भ्रातेति कान्तेति प्रियेति चापि।<br>उत्पाट्यमानेषु गृहेषु नार्य-<br>स्त्वनार्यशब्दान् विविधान् प्रचक्रुः॥ २९गृहोंको उखाड़ते समय उनमें रहनेवाली स्त्रियाँ—'हे नाथ! हा पिता! अरे पुत्र! हाय भाई! हाय कान्त! हे प्रियतम!' आदि अनेक प्रकारके अनार्योचित शब्द बोल रही थीं।
४९४* मत्स्यपुराण *
मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कलत्रपुत्रक्षयप्राणनाशे<br>तस्मिन् पुरे युद्धमतिप्रवृत्ते।<br>महासुराः सागरतुल्यवेगा<br>गणेश्वराः कोपवृताः प्रतीयुः॥ ३०<br><br>परश्वधैस्तत्र शिलोपलैश्च<br>त्रिशूलवज्रोत्तमकम्पनेश्च ।<br>शरीरसद्मक्षपणं सुघोरं<br>युद्धं प्रवृत्तं दृढवैरबद्धम्॥ ३१<br><br>अन्योन्यमुद्दिश्य विमर्दतां च<br>प्रधावतां चैव विनिघ्नतां च।<br>शब्दो बभूवामरदानवानां<br>युगान्तकालेष्विव सागराणाम्॥ ३२<br><br>व्रणैरजस्रं क्षतजं वमन्तः<br>कोपोपरक्ता बहुधा नदन्तः।<br>गणेश्वरास्तेऽसुरपुङ्गवाश्च<br>युध्यन्ति शब्दं च महदुद्धिरन्तः॥ ३३<br><br>मार्गाः पुरे लोहितकर्दमाक्ताः<br>स्वर्णेष्टकास्फाटिकभिन्नचित्राः ।<br>कृता मुहूर्तेन सुखेन गन्तुं<br>छिन्नोत्तमाङ्गाङ्घ्रिकराः करालाः॥ ३४<br><br>कोपावृताक्षः स तु तारकाख्यः<br>संख्ये सवृक्षः सगिरिर्निलीनः।<br>तस्मिन् क्षणे द्वारवरं रिरक्षो<br>रुद्रं भवेनाद्भुतविक्रमेण॥ ३५<br><br>स तत्र प्राकारगतांश्च भूतान्-<br>शान्तान् महानद्भुतवीर्यसत्त्वः।<br>चचार चासेन्द्रियगर्वदृप्तः<br>पुराद् विनिष्क्रम्य ररास घोरम्॥ ३६<br><br>ततः स दैत्योत्तमपर्वताभो<br>यथाञ्जसा नाग इवाभिमत्तः।<br>निवारितो रुद्ररथं जिघृक्षु-<br>र्यथार्णवः सर्पति चातिवेलः॥ ३७<br><br>शेषः सुधन्वा गिरिशश्च देव-<br>श्चतुर्मुखो यः स त्रिलोचनश्च।<br>ते तारकाख्याभिगतागताभौ<br>क्षोभं यथा वायुवशात् समुद्राः॥ ३८इस प्रकार जब उस पुरमें स्त्री, पुत्र तथा प्राणका विनाश करनेवाला अत्यन्त भीषण युद्ध होने लगा, तब सागरतुल्य वेगशाली महान् असुर और गणेश्वर क्रोधसे भर गये। फिर तो कुठार, शिलाखण्ड, त्रिशूल, श्रेष्ठ वज्र और कम्पन* (एक प्रकारका शस्त्र) आदिके प्रहारसे शरीर और गृहको विनष्ट करनेवाला अत्यन्त घोर युद्ध आरम्भ हो गया; क्योंकि दोनों सेनाओंमें सुदृढ़ वैर बँधा हुआ था। परस्पर एक-दूसरेको लक्ष्य करके मर्दन, आक्रमण और प्रहार करनेवाले देवताओं और दानवोंका प्रलयकालमें सागरोंकी गर्जनाकी भाँति भीषण शब्द होने लगा॥ २९-३२॥<br><br>उस समय वे गणेश्वर और असुरश्रेष्ठ घावोंसे निरन्तर रक्तकी धारा बहाते हुए, बारंबार गरजते हुए और भयंकर शब्द बोलते हुए युद्ध कर रहे थे। उस पुरमें स्वर्ण और स्फटिक मणिकी ईंटोंसे बने हुए जो चित्र-विचित्र मार्ग थे, वे दो ही घड़ीमें रुधिरयुक्त कीचड़से भर दिये गये। जो सुखपूर्वक चलनेयोग्य थे, वे कटे हुए मस्तकों, पादों और पैरोंसे व्याप्त हो जानेके कारण दुर्गम हो गये। तब तारकासुर क्रोधसे आँखें तरेरता हुआ वृक्ष और पर्वत हाथमें लेकर युद्धस्थलमें आ पहुँचा। वह उस समय अद्भुत पराक्रमी शंकरद्वारा अवरुद्ध किये गये दक्षिणद्वारकी रक्षा करना चाहता था। महान् पराक्रमी एवं अद्भुत सत्त्वशाली तारकासुर अपनी इन्द्रियोंके गर्वसे उन्मत्त होकर परकोटोंपर चढ़े हुए भूतगणोंको काटकर वहाँ विचरण करने लगा। पुनः नगरसे बाहर निकलकर उसने घोर गर्जना की। पर्वतकी-सी आभावाला दैत्येन्द्र तारक मतवाले हाथीकी तरह शीघ्र ही शंकरजीके रथको पकड़ लेना चाहता था, परंतु प्रमथोंद्वारा इस प्रकार रोक दिया गया, जैसे बढ़ते हुए समुद्रको उसका तट रोक देता है। उस समय शेषनाग, ब्रह्मा तथा सुन्दर धनुष धारण करनेवाले और पर्वतपर शयन करनेवाले त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकर युद्धस्थलमें तारकासुरके आ जानेसे उसी प्रकार क्षुब्ध हो गये, जैसे वायुके वेगसे सागर उद्वेलित हो उठते हैं।

* यह एक शस्त्र है। इसका वर्णन महाभारत १।६९।२३ में है।

* अध्याय १३८ * ४९५

शेषो गिरीशः सपितामहेश-<br>श्रोत्क्षुभ्यमाणः स रथेऽम्बरस्थः।<br>बिभेद संधीषु बलाभिपन्नः<br>कूजन्निनादांश्च करोति घोरान्॥ ३९<br><br>एकं तु ऋग्वेदतुरङ्गमस्य<br>पृष्ठे पदं न्यस्य वृषस्य चैकम्।<br>तस्थौ भवः सोद्यतबाणचापः<br>पुरस्य तत्सङ्गममीक्षमाणः॥ ४०<br><br>तदा भवपादन्यासाद्द्वयस्य वृषभस्य च।<br>पेतुः स्तनाश्च दन्ताश्च पीडिताभ्यां त्रिशूलिना ॥ ४१<br><br>ततःप्रभृति चाश्वानां स्तना दन्ता गवां तथा।<br>गूढाः समभवंस्तेन चादृश्यत्वमुपागताः ॥ ४२<br><br>तारकाख्यस्तु भीमाक्षो रौद्ररक्तान्तरेक्षणीः।<br>रुद्रान्तिके सुसंरुद्धो नन्दिना कुलनन्दिना ॥ ४३<br><br>परश्वधेन तीक्ष्णेन स नन्दी दानवेश्वरम्।<br>तक्षयामास वै तक्षा चन्दनं गन्धदो यथा ॥ ४४<br><br>परश्वधहतः शूरः शैलादिः शरभो यथा।<br>दुद्राव खड्गं निष्कृष्य तारकाख्यो गणेश्वरम्॥ ४५<br><br>यज्ञोपवीतमार्गेण चिच्छेद च ननाद च।<br>ततः सिंहरवो घोरः शङ्खशब्दश्च भैरवः।<br>गणेश्वरैः कृतस्तत्र तारकाख्ये निषूदिते ॥ ४६<br><br>प्रमथारसितं श्रुत्वा वादित्रस्वनमेव च।<br>पार्श्वस्थः सुमहापार्श्वं विद्युन्मालिं मयोऽब्रवीत् ॥ ४७<br><br>बहुवदनवतां किमेष शब्दो<br>नदतां श्रूयते भिन्नसागराभः।<br>वद वद त्वं तडिन्मालिन् किमेत-<br>दृणपा युयुधुर्यथा गजेन्द्राः॥ ४८<br><br>इति मयवचनाङ्कुशार्दित-<br>स्तं तडिन्माली रविरिवांशुमाली।<br>रणशिरसि समागतः सुराणां<br>निजगादेदमरिन्दमोऽतिदुःखात् ॥ ४९<br><br>यमवरुणमहेन्द्ररुद्रवीर्य-<br>स्तव यशसो निधिर्धीर्ः तारकाख्यः।<br>सकलसमरशीर्षपर्वतेन्द्रो<br>युद्ध्वा यस्तपति हि तारको गणेन्द्रैः ॥ ५०आकाशस्थित रथपर बैठे हुए बलसम्पन्न शेषनाग, शंकर और ब्रह्माने विशेष क्षुब्ध होकर पृथक्-पृथक् तारकासुरके शरीरकी संधियोंको बींध दिया और वे घोर गर्जना करने लगे। उस समय हाथमें धनुष-बाण लिये हुए भगवान् शंकर अपना एक पैर ऋग्वेदसूप घोड़ेकी तथा दूसरा पैर नन्दीश्वरकी पीठपर रखकर त्रिपुरोंके परस्पर सम्मिलनकी प्रतीक्षा करते हुए खड़े हो गये। उस समय शंकरजीके पैर रखनेसे उन त्रिशूलधारीके भारसे पीड़ित हुए अश्वके स्तन और वृषभके दाँत टूटकर गिर पड़े। तभीसे घोड़ोंके स्तन और गो-वंशके (ऊपरी जबड़ेके) दाँत गुप्त हो गये। इसी कारण वे दिखायी नहीं पड़ते। उसी समय जिसके नेत्रोंके अन्तर्भाग भयंकर और लाल थे, उस भीषण नेत्रोंवाले तारकासुरको भगवान् रुद्रके निकट आते देखकर कुलको आनन्दित करनेवाले नन्दीने रोक दिया तथा उन्होंने अपने तीखे कुठारसे उस दानवेश्वरके शरीरको इस प्रकार छील डाला, जैसे गन्धकी इच्छावाला (अथवा इत्र बनानेवाला) बढ़ई चन्दन-वृक्षको छाँट देता है। कुठारके आघातसे आहत हुए शूरवीर तारकासुरने पर्वतीय सिंहकी तरह क्रुद्ध होकर म्यानसे तलवार खींचकर गणेश्वर नन्दीपर आक्रमण किया। तब नन्दीश्वरने यज्ञोपवीत-मार्गसे (अर्थात् जनेऊ पहननेकी जगह—बाएँ कंधेसे लेकर दाहिने कटितटतक) तिरछे रूपमें तारकासुरके शरीरको विदीर्ण कर दिया और भयंकर गर्जना की। फिर तो वहाँ तारकासुरके मारे जानेपर गणेश्वरोंके भयंकर सिंहनाद गूँज उठे और उनके शङ्खोंके भीषण शब्द होने लगे॥ ३३—४६ ॥<br><br>तब प्रमथगणोंके सिंहनाद और उनके बाजोंके भीषण शब्दको सुनकर बगलमें ही स्थित मयदानवने महान् बलशाली विद्युन्मालीसे पूछा—'विद्युन्मालिन्! बताओ तो सही, अनेकों मुखोंवाले प्रमथगणोंका सागरकी गर्जनाके समान यह भयंकर सिंहनाद क्यों सुनायी पड़ रहा है? ये गणेश्वर क्यों गजराज-से गरजते हुए इतने उत्साहसे युद्ध कर रहे हैं?' इस प्रकार मयके वचनरूपी अङ्कुशसे पीड़ित हुआ किरणमाली सूर्यकी तरह तेजस्वी शत्रुदमन विद्युन्माली, जो तुरंत ही देवताओंके युद्धके मुहानेसे लौटकर आया था, अत्यन्त दुःखके साथ मयसे इस प्रकार बोला—'धैर्यशाली राजन्! जो यम, वरुण, महेन्द्र और रुद्रके समान पराक्रमी, आपकी कीर्तिका निधिस्वरूप, समस्त युद्धोंके मुहानेपर पर्वतराजकी भाँति डटा रहनेवाला