मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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४९० * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| सागरे जलगम्भीर उत्पपात पुरं वरम्।<br>अवतस्थुः पुराण्य्येव गोपुराभरणानि च॥ २३ | तो वह श्रेष्ठ त्रिपुर नामक नगर अगाध जलवाले सागरके ऊपर मँडराने लगा। उसके फाटक और आभूषणादि-सहित तीनों पुर यथास्थान स्थित हो गये॥ १०—२३॥ |
| अपक्रान्ते तु त्रिपुरे त्रिपुरारिस्त्रिलोचनः।<br>पितामहमुवाचेदं वेदवादविशारदम्॥ २४<br>पितामह दृढं भीता भगवन् दानवा हि नः।<br>विपुलं सागरं ते तु दानवाः समुपाश्रिताः॥ २५<br>यत एव हि ते यातास्त्रिपुरेण तु दानवाः।<br>तत एव रथं तूर्णं प्रापयस्व पितामह॥ २६ | इस प्रकार त्रिपुरके दूर हट जानेपर त्रिपुरारि भगवान् शंकरने वेदवादमें निपुण ब्रह्मासे इस प्रकार कहा—'ऐश्वर्यशाली पितामह! दानवगण हमलोगोंसे भलीभाँति डर गये हैं, इसलिये वे भागकर विशाल सागरकी शरणमें चले गये। पितामह! त्रिपुरसहित वे दानव जिस मार्गसे गये हैं, उसी मार्गसे आप शीघ्र ही मेरे रथको वहाँ पहुँचाइये।' |
| सिंहनादं ततः कृत्वा देवा देवरथं च तम्।<br>परिवार्य ययुर्हृष्टाः सायुधाः पश्चिमोदधिम्॥ २७<br>ततोऽमरामरगुरुं परिवार्य भवं हरम्।<br>नर्दयन्तो ययुस्तूर्णं सागरं दानवालयम्॥ २८ | तब आयुधधारी देवगण हर्षपूर्वक सिंहनाद करके और उस देवरथको चारों ओरसे घेरकर पश्चिम सागरकी ओर चल पड़े। तत्पश्चात् देवगण देवश्रेष्ठ भगवान् शंकरको चारों ओरसे घेरकर सिंहनाद करते हुए शीघ्र ही दानवोंके निवासस्थान सागरकी ओर प्रस्थित हुए। |
| अथ चारुपताकभूषितं<br>पटहाडम्बरशङ्खनादितम्।<br>त्रिपुरमभिसमीक्ष्य देवता<br>विविधबला ननदुर्यथा घनाः॥ २९ | वहाँ पहुँचनेपर सुन्दर पताकाओंसे विभूषित तथा ढोल, नगारे और शङ्खके शब्दोंसे निनादित त्रिपुरको देखकर अनेकों सेनाओंसे सम्पन्न देवगण बादलोंकी तरह गर्जना करने लगे। |
| असुरवरपुरेऽपि दारुणो<br>जलधररावमृदङ्गगह्वरः।<br>दनुतनयनिनादमिश्रितः<br>प्रतिनिधिः संक्षुभितार्णवोपमः॥ ३० | उधर असुरश्रेष्ठ मयके पुरमें भी दानवोंके सिंहनादके साथ-साथ मेघ-गर्जनाके सदृश मृदंगोंका भयंकर एवं गम्भीर शब्द हो रहा था, जो क्षुब्ध हुए महासागरकी गर्जनाके समान प्रतीत हो रहा था। |
| अथ भुवनपतिर्गतिः सुराणा-<br>मरिमृगयाम्मददात् सुलब्धबुद्धिः।<br>त्रिदशगणपतिं ह्युवाच शक्रं<br>त्रिपुरगतं सहसा निरीक्ष्य शत्रुम्॥ ३१ | तदनन्तर देवताओंके आश्रयस्थान प्रत्युत्पन्नमति त्रिभुवनपति शंकर शत्रुओंका शिकार करनेके लिये उद्यत हो गये। तब उन्होंने सहसा शत्रुओंको त्रिपुरमें प्रवेश करते देखकर देवताओं और गणोंके सेनानायक इन्द्रसे इस प्रकार कहा— |
| त्रिदशगणपते निशामयैतत्<br>त्रिपुरनिकेतनं दानवाः प्रविष्टाः।<br>यमवरुणकुबेरषण्मुखैस्तत्<br>सह गणपैरपि हन्मि तावदेव॥ ३२<br>विहितपरबलाभिघातभूतं<br>व्रज जलधेस्तु यतः पुराणि तस्थुः।<br>स रथवरगतो भवः समर्थो<br>ह्युदधिमगात् त्रिपुरं पुनर्निहन्तुम्॥ ३३<br>इति परिगणयन्तो दितेः सुता<br>ह्यावतस्थुर्लवणार्णवोपरिष्टात्।<br>अभिभवत् त्रिपुरं सदानवेन्द्रं<br>शरवर्षैर्मुसलैश्च वज्रमिश्रैः॥ ३४ | 'देवताओं और गणेश्वरोंके नायक इन्द्र! आपलोग मेरी यह बात सुनें। दानवलोग अपने निवासस्थान त्रिपुरमें घुस गये हैं, अतः आप यम, वरुण, कुबेर, कार्तिकेय तथा गणेश्वरोंको साथ लेकर इनका संहार करें। तबतक मैं भी इन्हें मार रहा हूँ। आप शत्रुसेनापर प्रहार करते हुए समुद्रके उस स्थानतक बढ़ते चलें, जहाँ तीनों पुर स्थित हैं। यह देखकर जब उन दैत्योंको यह विदित हो जायगा कि सामर्थ्यशाली शंकर उस श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हो पुनः त्रिपुरका विनाश करनेके लिये समुद्रतटपर आ गये हैं, तब वे लवणसागरके ऊपर निकल आयेंगे। तब आप वज्रसहित मुसलों एवं बाणोंकी वर्षा करते हुए दानवेन्द्रोंसहित त्रिपुरपर आक्रमण कर दें। |