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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

४९० * मत्स्यपुराण *

संस्कृतहिन्दी अनुवाद
सागरे जलगम्भीर उत्पपात पुरं वरम्।<br>अवतस्थुः पुराण्य्येव गोपुराभरणानि च॥ २३तो वह श्रेष्ठ त्रिपुर नामक नगर अगाध जलवाले सागरके ऊपर मँडराने लगा। उसके फाटक और आभूषणादि-सहित तीनों पुर यथास्थान स्थित हो गये॥ १०—२३॥
अपक्रान्ते तु त्रिपुरे त्रिपुरारिस्त्रिलोचनः।<br>पितामहमुवाचेदं वेदवादविशारदम्॥ २४<br>पितामह दृढं भीता भगवन् दानवा हि नः।<br>विपुलं सागरं ते तु दानवाः समुपाश्रिताः॥ २५<br>यत एव हि ते यातास्त्रिपुरेण तु दानवाः।<br>तत एव रथं तूर्णं प्रापयस्व पितामह॥ २६इस प्रकार त्रिपुरके दूर हट जानेपर त्रिपुरारि भगवान् शंकरने वेदवादमें निपुण ब्रह्मासे इस प्रकार कहा—'ऐश्वर्यशाली पितामह! दानवगण हमलोगोंसे भलीभाँति डर गये हैं, इसलिये वे भागकर विशाल सागरकी शरणमें चले गये। पितामह! त्रिपुरसहित वे दानव जिस मार्गसे गये हैं, उसी मार्गसे आप शीघ्र ही मेरे रथको वहाँ पहुँचाइये।'
सिंहनादं ततः कृत्वा देवा देवरथं च तम्।<br>परिवार्य ययुर्हृष्टाः सायुधाः पश्चिमोदधिम्॥ २७<br>ततोऽमरामरगुरुं परिवार्य भवं हरम्।<br>नर्दयन्तो ययुस्तूर्णं सागरं दानवालयम्॥ २८तब आयुधधारी देवगण हर्षपूर्वक सिंहनाद करके और उस देवरथको चारों ओरसे घेरकर पश्चिम सागरकी ओर चल पड़े। तत्पश्चात् देवगण देवश्रेष्ठ भगवान् शंकरको चारों ओरसे घेरकर सिंहनाद करते हुए शीघ्र ही दानवोंके निवासस्थान सागरकी ओर प्रस्थित हुए।
अथ चारुपताकभूषितं<br>पटहाडम्बरशङ्खनादितम्।<br>त्रिपुरमभिसमीक्ष्य देवता<br>विविधबला ननदुर्यथा घनाः॥ २९वहाँ पहुँचनेपर सुन्दर पताकाओंसे विभूषित तथा ढोल, नगारे और शङ्खके शब्दोंसे निनादित त्रिपुरको देखकर अनेकों सेनाओंसे सम्पन्न देवगण बादलोंकी तरह गर्जना करने लगे।
असुरवरपुरेऽपि दारुणो<br>जलधररावमृदङ्गगह्वरः।<br>दनुतनयनिनादमिश्रितः<br>प्रतिनिधिः संक्षुभितार्णवोपमः॥ ३०उधर असुरश्रेष्ठ मयके पुरमें भी दानवोंके सिंहनादके साथ-साथ मेघ-गर्जनाके सदृश मृदंगोंका भयंकर एवं गम्भीर शब्द हो रहा था, जो क्षुब्ध हुए महासागरकी गर्जनाके समान प्रतीत हो रहा था।
अथ भुवनपतिर्गतिः सुराणा-<br>मरिमृगयाम्मददात् सुलब्धबुद्धिः।<br>त्रिदशगणपतिं ह्युवाच शक्रं<br>त्रिपुरगतं सहसा निरीक्ष्य शत्रुम्॥ ३१तदनन्तर देवताओंके आश्रयस्थान प्रत्युत्पन्नमति त्रिभुवनपति शंकर शत्रुओंका शिकार करनेके लिये उद्यत हो गये। तब उन्होंने सहसा शत्रुओंको त्रिपुरमें प्रवेश करते देखकर देवताओं और गणोंके सेनानायक इन्द्रसे इस प्रकार कहा—
त्रिदशगणपते निशामयैतत्<br>त्रिपुरनिकेतनं दानवाः प्रविष्टाः।<br>यमवरुणकुबेरषण्मुखैस्तत्<br>सह गणपैरपि हन्मि तावदेव॥ ३२<br>विहितपरबलाभिघातभूतं<br>व्रज जलधेस्तु यतः पुराणि तस्थुः।<br>स रथवरगतो भवः समर्थो<br>ह्युदधिमगात् त्रिपुरं पुनर्निहन्तुम्॥ ३३<br>इति परिगणयन्तो दितेः सुता<br>ह्यावतस्थुर्लवणार्णवोपरिष्टात्।<br>अभिभवत् त्रिपुरं सदानवेन्द्रं<br>शरवर्षैर्मुसलैश्च वज्रमिश्रैः॥ ३४'देवताओं और गणेश्वरोंके नायक इन्द्र! आपलोग मेरी यह बात सुनें। दानवलोग अपने निवासस्थान त्रिपुरमें घुस गये हैं, अतः आप यम, वरुण, कुबेर, कार्तिकेय तथा गणेश्वरोंको साथ लेकर इनका संहार करें। तबतक मैं भी इन्हें मार रहा हूँ। आप शत्रुसेनापर प्रहार करते हुए समुद्रके उस स्थानतक बढ़ते चलें, जहाँ तीनों पुर स्थित हैं। यह देखकर जब उन दैत्योंको यह विदित हो जायगा कि सामर्थ्यशाली शंकर उस श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हो पुनः त्रिपुरका विनाश करनेके लिये समुद्रतटपर आ गये हैं, तब वे लवणसागरके ऊपर निकल आयेंगे। तब आप वज्रसहित मुसलों एवं बाणोंकी वर्षा करते हुए दानवेन्द्रोंसहित त्रिपुरपर आक्रमण कर दें।
* अध्याय १३८ *४९१
अहमपि रथवर्यमास्थितः<br>सुरवरवर्य भवेय पृष्ठतः ।<br>असुरवरवधार्थमुद्यतानां<br>प्रतिविदधामि सुखाय तेऽनघ ॥ ३५<br>इति भववचनप्रचोदितो<br>दशशतनयनवपुः समुद्यतः ।<br>त्रिपुरपुरजिघांसया हरिः<br>प्रविकसिताम्बुजलोचनो ययौ ॥ ३६सुरश्रेष्ठ ! उस समय मैं भी इस श्रेष्ठ रथपर बैठा हुआ असुरेन्द्रोंका वध करनेके लिये उद्यत आपलोगोंके पीछे रहूँगा। अनघ ! मैं सर्वथा आपलोगोंके सुखका विधान करता रहूँगा।' इस प्रकार शंकरजीके वचनोंसे प्रेरित होकर एक हजार नेत्रोंवाले इन्द्र, जिनके नेत्र प्रफुल्ल कमलके सदृश सुन्दर थे, त्रिपुरके विनाशकी इच्छासे उद्यत होकर आगे बढ़े ॥ २४—३६ ॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे त्रिपुराक्रमणं नाम सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३७ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें त्रिपुराक्रमण नामक एक सौ सैंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १३७ ॥


एक सौ अड़तीसवाँ अध्याय

देवताओं और दानवोंमें घमासान युद्ध तथा तारकासुरका वध

सूत उवाच<br>मघवा तु निहन्तुं तानसुरानमनेश्वरः ।<br>लोकपाला ययुः सर्वे गणपालाश्च सर्वशः ॥ १<br>ईश्वरेणोर्जिताः सर्व उत्पेतुरश्चाम्बरे तदा ।<br>खगतास्तु विरेजुस्ते पक्षवन्त इवाचलाः ॥ २<br>प्रययुस्तत्पुरं हन्तुं शरीरमिव व्याधयः ।<br>शङ्खाडम्बरनिर्घोषैः पणवान् पटहानपि ।<br>नादयन्तः पुरो देवा दृष्टास्त्रिपुरवासिभिः ॥ ३<br>हरः प्राप्त इतीवोक्त्वा बलिनस्ते महासुराः ।<br>आजग्मुः परं क्षोभमत्येयेष्विव सागराः ॥ ४<br>सुरतूर्यरवं श्रुत्वा दानवा भीमदर्शनाः ।<br>निनेदुर्वादयन्तश्च नानावाद्यान्यनेकशः ॥ ५<br>भूयोदीरितवीर्यास्ते परस्परकृतागसः ।<br>पूर्वदेवाश्च देवाश्च सूदयन्तः परस्परम् ॥ ६<br>आक्रोशेऽपि समप्रख्ये तेषां देहनिकृन्तनम् ।<br>प्रवृत्तं युद्धमतुलं प्रहारकृतनिःस्वनम् ॥ ७<br>निष्यतन्त इवादित्याः प्रज्वलन्त इवाग्नयः ।<br>शंसन्त इव नागेन्द्रा भ्रमन्त इव पक्षिणः ।<br>गिरीन्द्रा इव कम्पन्तो गर्जन्त इव तोयदाः ॥ ८**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो ! शंकरजीद्वारा उत्साहित किये जानेपर देवराज इन्द्र, सभी लोकपाल और गणपाल सब ओरसे उन असुरोंका वध करनेके लिये चले और आकाशकी ओर उछल पड़े। आकाशमें पहुँचकर वे पंखधारी पर्वतकी तरह शोभा पाने लगे। तत्पश्चात् वे शङ्ख और डंकेके निर्घोषके साथ-साथ ढोलों और नगाड़ोंको पीटते हुए त्रिपुरका विनाश करनेके लिये उसी प्रकार आगे बढ़े, जैसे व्याधियाँ शरीरको नष्ट कर देती हैं। इतनेमें त्रिपुरवासी दानवोंने देवगणोंको आगे बढ़ते हुए देख लिया। फिर तो वे महाबली असुर 'शंकर (यहाँ भी) आ गये'—ऐसा कहकर प्रलयकालीन सागरोंकी तरह परम क्षुब्ध हो उठे। तब भयंकर रूपधारी दानव देवताओंकी तुरहियोंका शब्द सुनकर नाना प्रकारके बाजे बजाते हुए बारंबार उच्च स्वरसे गर्जना करने लगे। तत्पश्चात् पुनः पराक्रम प्रकट करनेवाले वे दानव और देव परस्पर क्रुद्ध होकर एक-दूसरेपर प्रहार करने लगे। दोनों सेनाओंमें समानरूपसे सिंहनाद हो रहे थे। उनके शरीर कट-कटकर गिर रहे थे। फिर तो प्रहार करनेवालोंकी गर्जनाके साथ-साथ अनुपम युद्ध छिड़ गया। उस समय ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो अनेकों सूर्य गिर रहे हैं, अग्नयाँ प्रज्वलित हो उठी हैं, विषधर सर्प फुफकार मार रहे हैं, पक्षी आकाशमें चक्कर काट रहे हैं, पर्वत काँप रहे हैं, बादल
४९२* मत्स्यपुराण *

| जृम्भन्त इव शार्दूलाः प्रवान्त इव वायवः।<br>प्रवृद्धोर्मितरङ्गौघाः क्षुभ्यन्त इव सागराः॥ ९<br>प्रमथाश्च महाशूरा दानवाश्च महाबलाः।<br>युयुधुर्निश्चला भूत्वा वज्रा इव महाचलैः॥ १० | गरज रहे हैं, सिंह जमुहाई ले रहे हैं, भयानक झंझावात चल रहा है और उछलती हुई लहरोंके समूहसे सागर क्षुब्ध हो उठा है। इस प्रकार महान् शूरवीर प्रमथ और महाबली दानव उसी प्रकार डटकर युद्ध कर रहे थे, जैसे महान् पर्वतोंसे टकरानेपर भी वज्र अटल रहता है॥ ९-१०॥ | | कार्मुकाणां विकृष्टानां बभूवुर्दारुणा रवाः।<br>कालानुगानां मेघानां यथा वियति वायुना॥ ११ | जैसे आकाशमें वायुद्वारा प्रेरित किये जानेपर प्रलयकालीन मेघोंकी गर्जना होती है, उसी तरह खींचे जाते हुए धनुषोंके भीषण शब्द हो रहे थे। | | आहुश्च युद्धे मा भैषीः क्व यास्यसि मृतो ह्यसि।<br>प्रहराशु स्थितोऽस्म्यत्र एहि दर्शय पौरुषम्॥ १२<br>गृहाण छिन्धि भिन्धीति खाद मारय दारय।<br>इत्यन्योऽन्यमनूच्चार्य प्रययुर्यमसादनम्॥ १३ | युद्धभूमिमें दोनों ओरके वीर परस्पर 'मत डरो, कहाँ भागकर जाओगे, अब तो तुम मरे ही हो, शीघ्र प्रहार करो, मैं यहाँ खड़ा हूँ, आओ और अपना पुरुषार्थ दिखाओ, पकड़ लो, काट डालो, विदीर्ण कर दो, खा लो, मार डालो, फाड़ डालो'—ऐसा शब्द बोल रहे थे और पुनः शान्त होकर यमलोकके पथिक बन जाते थे। | | खड्गापवर्जिताः केचित् केचिच्छिन्ना परश्वधैः।<br>केचिन्मुद्गरचूर्णांश्च केचिद् बाहुभिराहताः॥ १४<br>पट्टिशैः सूदिताः केचित् केचिच्छूलविदारिताः।<br>दानवाः शरपुष्पाभाः सवना इव पर्वताः।<br>निपतन्त्यर्णवजले भीमनक्रमितिमिङ्गिले॥ १५ | उनमेंसे कुछ वीर तलवारसे काट डाले गये थे, कुछ फरसोंसे छिन्न-भिन्न कर दिये गये थे, कुछ मुद्गरोंकी मारसे चूर्ण-सरीखे हो गये थे, कुछ हाथके चपेटोंसे घायल कर दिये गये, कुछ पट्टिशों (पटों)-के प्रहारसे मार डाले गये और कुछ शूलोंसे विदीर्ण कर दिये गये। सरपतके फूलकी-सी कान्तिवाले दानव वनसहित पर्वतोंकी तरह भयंकर नाक और तिमिंगिलोंसे भरे हुए समुद्रके जलमें गिर रहे थे। | | व्यसुभिः सुनिबद्धाङ्गैः पतमानैः सुरेतरैः।<br>सम्बभूवार्णवे शब्दः सजलाम्बुदनिःस्वनः॥ १६ | दानवोंके कवच आदिसे भलीभाँति बँधे हुए प्राणरहित शरीरोंके समुद्रमें गिरनेसे सजल जलधरकी गर्जनाके समान शब्द हो रहा था। | | तेन शब्देन मकरा नक्रास्तिमितिमिङ्गिलाः।<br>मत्ता लोहितगन्धेन क्षोभयन्तो महार्णवम्॥ १७<br>परस्परेण कलहं कुर्वाणा भीममूर्तयः।<br>भ्रमन्ते भक्षयन्तश्च दानवानां च लोहितम्॥ १८ | उस शब्दसे तथा दानवोंके रुधिरकी गन्धसे मतवाले हुए मगर, नाक, तिमि और तिमिंगिल आदि जन्तु महासागरको क्षुब्ध कर रहे थे। वे भयंकर आकारवाले जलजन्तु परस्पर झगड़ते हुए दानवोंका रुधिर पान कर चक्कर काट रहे थे। | | सरथान् सायुधान् साश्वान् सवस्त्राभरणावृतान्।<br>जग्रसुस्तिमयो दैत्यान् द्रावयन्तो जलेचरान्॥ १९<br>मृधं यथासुराणां च प्रमथानां प्रवर्तते।<br>अम्बरेऽम्भसि च तथा युद्धं चक्रुर्जलेचराः॥ २० | यूथ-के-यूथ मगरमच्छ अन्य जल-जन्तुओंको खदेड़कर रथ, आयुध, अश्व, वस्त्र और आभूषणोंसहित दैत्योंको निगल जाते थे। जिस प्रकार आकाशमें दानवों और प्रमथोंका युद्ध चल रहा था, उसी तरह समुद्रमें जल-जन्तु (शवोंको खानेके लिये) परस्पर लड़ रहे थे॥ ११-२०॥ | | यथा भ्रमन्ति प्रमथाः सदैत्या-<br>  स्तथा भ्रमन्ते तिमयः सनक्राः।<br>यथैव छिन्दन्ति परस्परं तु<br>  तथैव क्रन्दन्ति विभिन्नदेहाः॥ २१ | उस समय जैसे आकाशमें प्रमथगण दैत्योंके साथ युद्ध करते हुए चक्कर काट रहे थे, वैसे ही जलमें मगरमच्छ नाकोंके साथ झगड़ते हुए घूम रहे थे। जैसे देवता और दानव परस्पर एक-दूसरेके शरीरको काट रहे थे, वैसे ही मगरमच्छ और नाक भी एक-दूसरेके शरीरको |

१४०- देवताओं और दानवोंका भीषण संग्राम, नन्दीश्वरद्वारा विद्युन्मालीका वध, मयका पलायन तथा शङ्करजीकी त्रिपुरपर विजय

  • अध्याय १३८ * ४९३
व्रणाननैर्ङ्गरसं स्रवद्भिः<br>सुरासुरैर्नक्रतिमिङ्गिलैश्च ।<br>कृतो मुहूर्तेन समुद्रीदेशः<br>सरक्ततोयः समुदीर्णतोयः॥ २२विदीर्ण कर चीत्कार कर रहे थे। देवताओं, असुरों, नाकों और तिमिंगिलोंके घावों और मुखोंसे बहते हुए रुधिरसे समुद्रके उस प्रदेशका जल मुहूर्तमात्रके लिये रक्तयुक्त हो गया और वहाँ बाढ़ आ गयी। उस त्रिपुरका
पूर्वं महाम्भोधरपर्वताभं<br>द्वारं महान्तं त्रिपुरस्य शक्रः।<br>निपीड्य तस्थौ महता बलेन<br>युक्तोऽमराणां महता बलेन॥ २३पूर्वद्वार अत्यन्त विशाल और काले मेघ तथा पर्वतके समान कान्तिमान् था। महान् बलशाली इन्द्र देवताओंकी विशाल सेनाके साथ उस द्वारको अवरुद्ध कर खड़े थे।
तथोत्तरं सोऽन्तरजो हरस्य<br>बालार्कजाम्बूनदतुल्यवर्णः।<br>स्कन्दः पुरद्वारमथारुरोह<br>वृद्धोऽस्तशृङ्गं प्रपतन्निवार्कः॥ २४उसी प्रकार उदयकालीन सूर्य और सुवर्णके तुल्य रंगवाले शंकरजीके आत्मज स्कन्द त्रिपुरके उत्तरद्वारपर ऐसे चढ़े हुए थे मानो बढ़े हुए सूर्य अस्ताचलके शिखरोंपर चढ़ रहे हों।
यमश्च वित्ताधिपतिश्च देवो<br>दण्डान्वितः पाशवरायुधश्च।<br>देवारिणस्तस्य पुरस्य द्वारं<br>ताभ्यां तु तत्पश्चिमतो निरुद्धम्॥ २५दण्डधारी यमराज और अपने श्रेष्ठ अस्त्र पाशको धारण किये हुए कुबेर—ये दोनों देवता उस देवशत्रु मयके पुरके पश्चिमद्वारपर घेरा डाले हुए थे।
दक्षारिरुद्रस्तपनायुताभः<br>स भास्वता देवरथेन देवः।<br>तद्दक्षिणद्वारमरेः पुरस्य<br>रुद्ध्वावतस्थो भगवांस्त्रिनेत्रः॥ २६दस हजार सूर्योंकी-सी आभावाले दक्षके शत्रु त्रिनेत्रधारी भगवान् रुद्रदेव उस उद्दीप्त देवरथपर आरूढ़ होकर शत्रु-नगरके दक्षिणद्वारको रोककर स्थित थे।
तुङ्गानि वेश्मानि सगोपुराणि<br>स्वर्णानि कैलासशशिप्रभाणि।<br>प्रह्लादरूपाः प्रमथावरुद्धा<br>ज्योतींषि मेघा इव चाश्मवर्षाः॥ २७उस त्रिपुरके फाटकोंसहित स्वर्णनिर्मित ऊँचे-ऊँचे महलोंको, जो कैलास और चन्द्रमाके सदृश चमक रहे थे, प्रसन्न मुखवाले प्रमथोंने उसी प्रकार अवरुद्ध कर रखा था, जैसे उपलोंकी वर्षा करनेवाले मेघ ज्योतिर्गणोंको घेर लेते हैं।
उत्पाट्य चोत्पाट्य गृहाणि तेषां<br>सशैलमालासमवेदिकानि ।<br>प्रक्षिप्य प्रक्षिप्य समुद्रमध्ये<br>कालाम्बुदाभाः प्रमथा विनेदुः॥ २८काले मेघकी-सी कान्तिवाले प्रमथगण दानवोंके पर्वतमालाके सदृश ऊँची-ऊँची वेदिकाओंसे युक्त गृहोंको, जो लाल वर्णवाले तथा अशोक-वृक्षों एवं अन्यान्य वनोंसे युक्त थे और जिनमें कोयलें कूक रही थीं, उखाड़-उखाड़कर लगातार समुद्रमें फेंक रहे थे और उच्च स्वरसे गर्जना कर रहे थे।
रक्तानि चाशेषवनैर्युतानि<br>साशोकखण्डानि सकोकिलानि।<br>गृहाणि हे नाथ पितः सुतेति<br>भ्रातेति कान्तेति प्रियेति चापि।<br>उत्पाट्यमानेषु गृहेषु नार्य-<br>स्त्वनार्यशब्दान् विविधान् प्रचक्रुः॥ २९गृहोंको उखाड़ते समय उनमें रहनेवाली स्त्रियाँ—'हे नाथ! हा पिता! अरे पुत्र! हाय भाई! हाय कान्त! हे प्रियतम!' आदि अनेक प्रकारके अनार्योचित शब्द बोल रही थीं।
४९४* मत्स्यपुराण *
मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कलत्रपुत्रक्षयप्राणनाशे<br>तस्मिन् पुरे युद्धमतिप्रवृत्ते।<br>महासुराः सागरतुल्यवेगा<br>गणेश्वराः कोपवृताः प्रतीयुः॥ ३०<br><br>परश्वधैस्तत्र शिलोपलैश्च<br>त्रिशूलवज्रोत्तमकम्पनेश्च ।<br>शरीरसद्मक्षपणं सुघोरं<br>युद्धं प्रवृत्तं दृढवैरबद्धम्॥ ३१<br><br>अन्योन्यमुद्दिश्य विमर्दतां च<br>प्रधावतां चैव विनिघ्नतां च।<br>शब्दो बभूवामरदानवानां<br>युगान्तकालेष्विव सागराणाम्॥ ३२<br><br>व्रणैरजस्रं क्षतजं वमन्तः<br>कोपोपरक्ता बहुधा नदन्तः।<br>गणेश्वरास्तेऽसुरपुङ्गवाश्च<br>युध्यन्ति शब्दं च महदुद्धिरन्तः॥ ३३<br><br>मार्गाः पुरे लोहितकर्दमाक्ताः<br>स्वर्णेष्टकास्फाटिकभिन्नचित्राः ।<br>कृता मुहूर्तेन सुखेन गन्तुं<br>छिन्नोत्तमाङ्गाङ्घ्रिकराः करालाः॥ ३४<br><br>कोपावृताक्षः स तु तारकाख्यः<br>संख्ये सवृक्षः सगिरिर्निलीनः।<br>तस्मिन् क्षणे द्वारवरं रिरक्षो<br>रुद्रं भवेनाद्भुतविक्रमेण॥ ३५<br><br>स तत्र प्राकारगतांश्च भूतान्-<br>शान्तान् महानद्भुतवीर्यसत्त्वः।<br>चचार चासेन्द्रियगर्वदृप्तः<br>पुराद् विनिष्क्रम्य ररास घोरम्॥ ३६<br><br>ततः स दैत्योत्तमपर्वताभो<br>यथाञ्जसा नाग इवाभिमत्तः।<br>निवारितो रुद्ररथं जिघृक्षु-<br>र्यथार्णवः सर्पति चातिवेलः॥ ३७<br><br>शेषः सुधन्वा गिरिशश्च देव-<br>श्चतुर्मुखो यः स त्रिलोचनश्च।<br>ते तारकाख्याभिगतागताभौ<br>क्षोभं यथा वायुवशात् समुद्राः॥ ३८इस प्रकार जब उस पुरमें स्त्री, पुत्र तथा प्राणका विनाश करनेवाला अत्यन्त भीषण युद्ध होने लगा, तब सागरतुल्य वेगशाली महान् असुर और गणेश्वर क्रोधसे भर गये। फिर तो कुठार, शिलाखण्ड, त्रिशूल, श्रेष्ठ वज्र और कम्पन* (एक प्रकारका शस्त्र) आदिके प्रहारसे शरीर और गृहको विनष्ट करनेवाला अत्यन्त घोर युद्ध आरम्भ हो गया; क्योंकि दोनों सेनाओंमें सुदृढ़ वैर बँधा हुआ था। परस्पर एक-दूसरेको लक्ष्य करके मर्दन, आक्रमण और प्रहार करनेवाले देवताओं और दानवोंका प्रलयकालमें सागरोंकी गर्जनाकी भाँति भीषण शब्द होने लगा॥ २९-३२॥<br><br>उस समय वे गणेश्वर और असुरश्रेष्ठ घावोंसे निरन्तर रक्तकी धारा बहाते हुए, बारंबार गरजते हुए और भयंकर शब्द बोलते हुए युद्ध कर रहे थे। उस पुरमें स्वर्ण और स्फटिक मणिकी ईंटोंसे बने हुए जो चित्र-विचित्र मार्ग थे, वे दो ही घड़ीमें रुधिरयुक्त कीचड़से भर दिये गये। जो सुखपूर्वक चलनेयोग्य थे, वे कटे हुए मस्तकों, पादों और पैरोंसे व्याप्त हो जानेके कारण दुर्गम हो गये। तब तारकासुर क्रोधसे आँखें तरेरता हुआ वृक्ष और पर्वत हाथमें लेकर युद्धस्थलमें आ पहुँचा। वह उस समय अद्भुत पराक्रमी शंकरद्वारा अवरुद्ध किये गये दक्षिणद्वारकी रक्षा करना चाहता था। महान् पराक्रमी एवं अद्भुत सत्त्वशाली तारकासुर अपनी इन्द्रियोंके गर्वसे उन्मत्त होकर परकोटोंपर चढ़े हुए भूतगणोंको काटकर वहाँ विचरण करने लगा। पुनः नगरसे बाहर निकलकर उसने घोर गर्जना की। पर्वतकी-सी आभावाला दैत्येन्द्र तारक मतवाले हाथीकी तरह शीघ्र ही शंकरजीके रथको पकड़ लेना चाहता था, परंतु प्रमथोंद्वारा इस प्रकार रोक दिया गया, जैसे बढ़ते हुए समुद्रको उसका तट रोक देता है। उस समय शेषनाग, ब्रह्मा तथा सुन्दर धनुष धारण करनेवाले और पर्वतपर शयन करनेवाले त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकर युद्धस्थलमें तारकासुरके आ जानेसे उसी प्रकार क्षुब्ध हो गये, जैसे वायुके वेगसे सागर उद्वेलित हो उठते हैं।

* यह एक शस्त्र है। इसका वर्णन महाभारत १।६९।२३ में है।

* अध्याय १३८ * ४९५

शेषो गिरीशः सपितामहेश-<br>श्रोत्क्षुभ्यमाणः स रथेऽम्बरस्थः।<br>बिभेद संधीषु बलाभिपन्नः<br>कूजन्निनादांश्च करोति घोरान्॥ ३९<br><br>एकं तु ऋग्वेदतुरङ्गमस्य<br>पृष्ठे पदं न्यस्य वृषस्य चैकम्।<br>तस्थौ भवः सोद्यतबाणचापः<br>पुरस्य तत्सङ्गममीक्षमाणः॥ ४०<br><br>तदा भवपादन्यासाद्द्वयस्य वृषभस्य च।<br>पेतुः स्तनाश्च दन्ताश्च पीडिताभ्यां त्रिशूलिना ॥ ४१<br><br>ततःप्रभृति चाश्वानां स्तना दन्ता गवां तथा।<br>गूढाः समभवंस्तेन चादृश्यत्वमुपागताः ॥ ४२<br><br>तारकाख्यस्तु भीमाक्षो रौद्ररक्तान्तरेक्षणीः।<br>रुद्रान्तिके सुसंरुद्धो नन्दिना कुलनन्दिना ॥ ४३<br><br>परश्वधेन तीक्ष्णेन स नन्दी दानवेश्वरम्।<br>तक्षयामास वै तक्षा चन्दनं गन्धदो यथा ॥ ४४<br><br>परश्वधहतः शूरः शैलादिः शरभो यथा।<br>दुद्राव खड्गं निष्कृष्य तारकाख्यो गणेश्वरम्॥ ४५<br><br>यज्ञोपवीतमार्गेण चिच्छेद च ननाद च।<br>ततः सिंहरवो घोरः शङ्खशब्दश्च भैरवः।<br>गणेश्वरैः कृतस्तत्र तारकाख्ये निषूदिते ॥ ४६<br><br>प्रमथारसितं श्रुत्वा वादित्रस्वनमेव च।<br>पार्श्वस्थः सुमहापार्श्वं विद्युन्मालिं मयोऽब्रवीत् ॥ ४७<br><br>बहुवदनवतां किमेष शब्दो<br>नदतां श्रूयते भिन्नसागराभः।<br>वद वद त्वं तडिन्मालिन् किमेत-<br>दृणपा युयुधुर्यथा गजेन्द्राः॥ ४८<br><br>इति मयवचनाङ्कुशार्दित-<br>स्तं तडिन्माली रविरिवांशुमाली।<br>रणशिरसि समागतः सुराणां<br>निजगादेदमरिन्दमोऽतिदुःखात् ॥ ४९<br><br>यमवरुणमहेन्द्ररुद्रवीर्य-<br>स्तव यशसो निधिर्धीर्ः तारकाख्यः।<br>सकलसमरशीर्षपर्वतेन्द्रो<br>युद्ध्वा यस्तपति हि तारको गणेन्द्रैः ॥ ५०आकाशस्थित रथपर बैठे हुए बलसम्पन्न शेषनाग, शंकर और ब्रह्माने विशेष क्षुब्ध होकर पृथक्-पृथक् तारकासुरके शरीरकी संधियोंको बींध दिया और वे घोर गर्जना करने लगे। उस समय हाथमें धनुष-बाण लिये हुए भगवान् शंकर अपना एक पैर ऋग्वेदसूप घोड़ेकी तथा दूसरा पैर नन्दीश्वरकी पीठपर रखकर त्रिपुरोंके परस्पर सम्मिलनकी प्रतीक्षा करते हुए खड़े हो गये। उस समय शंकरजीके पैर रखनेसे उन त्रिशूलधारीके भारसे पीड़ित हुए अश्वके स्तन और वृषभके दाँत टूटकर गिर पड़े। तभीसे घोड़ोंके स्तन और गो-वंशके (ऊपरी जबड़ेके) दाँत गुप्त हो गये। इसी कारण वे दिखायी नहीं पड़ते। उसी समय जिसके नेत्रोंके अन्तर्भाग भयंकर और लाल थे, उस भीषण नेत्रोंवाले तारकासुरको भगवान् रुद्रके निकट आते देखकर कुलको आनन्दित करनेवाले नन्दीने रोक दिया तथा उन्होंने अपने तीखे कुठारसे उस दानवेश्वरके शरीरको इस प्रकार छील डाला, जैसे गन्धकी इच्छावाला (अथवा इत्र बनानेवाला) बढ़ई चन्दन-वृक्षको छाँट देता है। कुठारके आघातसे आहत हुए शूरवीर तारकासुरने पर्वतीय सिंहकी तरह क्रुद्ध होकर म्यानसे तलवार खींचकर गणेश्वर नन्दीपर आक्रमण किया। तब नन्दीश्वरने यज्ञोपवीत-मार्गसे (अर्थात् जनेऊ पहननेकी जगह—बाएँ कंधेसे लेकर दाहिने कटितटतक) तिरछे रूपमें तारकासुरके शरीरको विदीर्ण कर दिया और भयंकर गर्जना की। फिर तो वहाँ तारकासुरके मारे जानेपर गणेश्वरोंके भयंकर सिंहनाद गूँज उठे और उनके शङ्खोंके भीषण शब्द होने लगे॥ ३३—४६ ॥<br><br>तब प्रमथगणोंके सिंहनाद और उनके बाजोंके भीषण शब्दको सुनकर बगलमें ही स्थित मयदानवने महान् बलशाली विद्युन्मालीसे पूछा—'विद्युन्मालिन्! बताओ तो सही, अनेकों मुखोंवाले प्रमथगणोंका सागरकी गर्जनाके समान यह भयंकर सिंहनाद क्यों सुनायी पड़ रहा है? ये गणेश्वर क्यों गजराज-से गरजते हुए इतने उत्साहसे युद्ध कर रहे हैं?' इस प्रकार मयके वचनरूपी अङ्कुशसे पीड़ित हुआ किरणमाली सूर्यकी तरह तेजस्वी शत्रुदमन विद्युन्माली, जो तुरंत ही देवताओंके युद्धके मुहानेसे लौटकर आया था, अत्यन्त दुःखके साथ मयसे इस प्रकार बोला—'धैर्यशाली राजन्! जो यम, वरुण, महेन्द्र और रुद्रके समान पराक्रमी, आपकी कीर्तिका निधिस्वरूप, समस्त युद्धोंके मुहानेपर पर्वतराजकी भाँति डटा रहनेवाला

४९६ * मत्स्यपुराण *


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मृदितमुपनिशम्य तारकाख्यं<br>रविदीप्तानलभीषणायताक्षम् ।<br>हृषितसकलनेत्रलोमसत्त्वाः<br>प्रमथास्तोयमुचो तथा नदन्ति ॥ ५१<br><br>इति सुहृदो वचनं निशम्य तत्त्वं<br>तडिन्मालेः स मयः सुवर्णमाली।<br>रणशिरस्यसिताञ्जनाचलाभो<br>जगदे वाक्यमिदं नवेन्दुमालिम् ॥ ५२<br><br>विद्युन्मालिन्न नः कालः साधितुं ह्यवहेलया।<br>करोमि विक्रमेणैतत् पुरं व्यसनवर्जितम् ॥ ५३<br><br>विद्युन्माली ततः क्रुद्धो मयश्च त्रिपुरेश्वरः।<br>गणान् जघ्नुस्तु द्राघिष्ठाः सहितास्तैर्महासुरैः ॥ ५४<br><br>येन येन ततो विद्युन्माली याति मयश्च सः।<br>तेन तेन पुरं शून्यं प्रमथोपहुङ्कृतम् ॥ ५५<br><br>अथ यमवरुणमृदङ्गघोषैः<br>पणवडिण्डिमज्यास्वनप्रघोषैः ।<br>सकरतलपुटैश्च सिंहनादै-<br>र्भवमभिपूज्य तदा सुरावतस्थुः ॥ ५६<br><br>सम्पूज्यमानोऽदितिजैर्महात्मभिः<br>सहस्ररश्मिप्रतिमौजसैर्विभुः ।<br>अभिष्टुतः सत्यरतैस्तपोधनै-<br>र्यथास्त शृङ्गाभिगतो दिवाकरः ॥ ५७और युद्धभूमिमें शत्रुओंके लिये संतापदायक था, वह तारक गणेश्वरोंद्वारा निहत हो गया। सूर्य एवं प्रज्वलित अग्निके समान भयंकर विशाल नेत्रोंवाले तारकको मारा गया सुनकर हर्षके कारण सभी प्रमथोंके शरीर पुलकित और नेत्र उत्फुल्ल हो गये हैं और वे बादलोंकी तरह गर्जना कर रहे हैं।' अपने मित्र विद्युन्मालीके इस तत्त्वपूर्ण वचनको सुनकर कज्जलगिरिके सदृश शरीरवाला स्वर्णमालाधारी मय रणके मुहानेपर विद्युन्मालीसे इस प्रकार बोला—'विद्युन्मालिन्! अब हमलोगोंके लिये अवहेलना (प्रमाद)-पूर्वक समय बिताना ठीक नहीं है। मैं अपने पराक्रमसे पुनः इस त्रिपुरको आप्तिरहित बनाऊँगा।' फिर तो विद्युन्माली और त्रिपुराधिपति मय—दोनोंने क्रुद्ध होकर महासुरोंकी विशाल सेनाके साथ गणेश्वरोंको मारना आरम्भ किया। उस समय त्रिपुरमें विद्युन्माली और मय जिस-जिस मार्गसे निकलते थे, वे मार्ग प्रमथोंके घायल होकर भाग जानेसे शून्य हो जाते थे। तब यम और वरुणके मृदङ्गघोष और ढोल, नगारे एवं धनुषकी प्रत्यञ्चाके निनादके साथ-साथ ताली बजाते और सिंहनाद करते हुए सभी देवगण शङ्करजीकी पूजा करके उन्हें घेरकर खड़े हो गये। सूर्यके समान तेजस्वी उन महात्मा देवगणोंद्वारा पूजित होते हुए तथा सत्यपरायण तपस्वियोंद्वारा स्तुति किये जाते हुए भगवान् शङ्कर अस्ताचलके शिखरपर पहुँचे हुए सूर्यकी भाँति सुशोभित हो रहे थे॥ ४७–५७॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे त्रिपुरदाहे तारकाख्यवधो नामाष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १३८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरदाहके प्रसङ्गमें तारकासुर-वध नामक एक सौ अड़तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १३८॥

* अध्याय १३९ *४९७

एक सौ उन्तालीसवाँ अध्याय

दानवराज मयका दानवोंको समझा-बुझाकर त्रिपुरकी रक्षामें नियुक्त करना तथा त्रिपुरकौमुदीका वर्णन

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
तारकाख्ये हते युद्धे उत्सार्य प्रमथान् मयः।<br>उवाच दानवान् भूयो भूयः स तु भयावृतान्॥ १<br>भोऽसुरेन्द्राधुना सर्वे निबोधध्वं प्रभाषितम्।<br>यत् कर्तव्यं मया चैव युष्माभिश्च महाबलैः॥ २<br>पुष्यं समेष्यते काले चन्द्रश्चन्द्रनिभाननाः।<br>यदैकं त्रिपुरं सर्वं क्षणमेकं भविष्यति॥ ३<br>कुरुध्वं निर्भयाः काले पिशुनांशंसितेन च।<br>स कालः पुष्ययोगस्य पुरस्य च मया कृतः॥ ४<br>काले तस्मिन् पुरे यस्तु सम्भावयति संहतिम्।<br>स एनं कारयेच्चूर्णं बलिनैकेषुणा सुरः॥ ५<br>यो वः प्राणो बलं यच्च या च वो वैरिताऽसुराः।<br>तत् कृत्वा हृदये चैव पालयध्वमिदं पुरम्॥ ६<br>महेश्वररथं ह्येकं सर्वप्राणेन भीषणम्।<br>विमुखीकुर्वतात्यर्थं यथा नोत्सृजते शरम्॥ ७<br>तत एवं कृतेऽस्माभिस्त्रिपुरस्यापि रक्षणे।<br>प्रतीक्षिष्यन्ति विवशाः पुष्ययोगं दिवौकसः॥ ८ऋषियो! इस प्रकार युद्धभूमिमें तारकासुरके मारे जानेपर दानवराज मय प्रमथोंको खदेड़कर भयभीत हुए दानवोंको सब तरहसे सान्त्वना देते हुए बोला—'अरे असुरेन्द्रो! इस समय तुम सभी महाबली दानवोंका जो कर्तव्य है, उसे मैं बतला रहा हूँ, सब लोग ध्यान देकर सुनो। चन्द्रवदन दानवो! जिस समय चन्द्रमा पुष्य नक्षत्रसे समन्वित होंगे, उस समय एक क्षणके लिये तीनों पुर एकमें मिल जायँगे। यह चन्द्रमाका पुष्य नक्षत्रसे सम्बन्ध होनेपर त्रिपुरके सम्मिलित होनेका काल मैंने ही निर्धारित कर रखा है, अतः उस समय तुमलोग निर्भय होकर नारदजीद्वारा बतलाये गये उपायोंका प्रयोग करो; क्योंकि उस समय जो कोई देवता त्रिपुरोंके सम्मिलित होनेका पता लगा लेगा, वह एक ही सुदृढ बाणसे इस त्रिपुरको चूर्ण कर डालेगा। इसलिये असुरो! तुमलोगोंमें जितनी प्राणशक्ति है, जितना बल है और देवताओंके साथ जितना वैर-विद्वेष है, वह सब हृदयमें विचारकर इस त्रिपुरकी रक्षामें जुट जाओ। तुमलोग एकमात्र महेश्वरके भीषण रथको पूरी शक्ति लगाकर ऐसा विमुख कर दो, जिससे वे बाण न छोड़ सकें। इस प्रकार हमलोगोंद्वारा त्रिपुरकी रक्षा सम्पन्न कर लेनेपर देवताओंको विवश होकर पुनः आनेवाले पुष्ययोगकी प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।'
निशम्य तन्मयस्यैकं दानवास्त्रिपुरालयाः।<br>मुहुः सिंहरवं कृत्वा मयमूचुर्यमोपमाः॥ ९<br>प्रयत्नेन वयं सर्वे कुर्मस्तव प्रभाषितम्।<br>तथा कुर्मो यथा रुद्रो न मोक्ष्यति पुरे शरम्॥ १०<br>अद्य यास्यामः संग्रामे तद्रुद्रस्य जिघांसवः।<br>कथयन्ति दितेः पुत्रा हृष्टा भिन्नतनूरुहाः॥ ११<br>कल्पं स्थास्यति वा खस्थं त्रिपुरं शाश्वतं ध्रुवम्।<br>अदानवं वा भविता नारायणपदत्रयम्॥ १२<br>वयं न धर्मं हास्यामो यस्मिन् योक्ष्यति नो भवान्।<br>अदैवतमदैत्यं वा लोकं द्रक्ष्यन्ति मानवाः॥ १३मयका ऐसा कथन सुनकर यमराजके समान भीषण त्रिपुरनिवासी दानव बारम्बार सिंहनाद कर मयसे बोले—'राजन्! हम सब लोग प्रयत्नपूर्वक आपके कथनका पालन करेंगे और ऐसा कर्म कर दिखायेंगे, जिससे रुद्र त्रिपुरपर बाण नहीं छोड़ सकेंगे। हमलोग आज ही उस रुद्रका वध करनेके लिये संग्रामभूमिमें जा रहे हैं। या तो हमारा त्रिपुर कल्पपर्यन्त निश्चलरूपसे सर्वदाके लिये आकाशमें स्थिर रहेगा अथवा नारायणके तीन पदकी तरह यह दानवोंसे खाली हो जायगा। आप हमलोगोंको जिस कार्यमें नियुक्त कर देंगे, हमलोग उस कर्तव्यका कदापि त्याग नहीं करेंगे। आज मानव जगत्को देवता अथवा दैत्यसे रहित ही देखेंगे।'

४९८ * मत्स्यपुराण *

संस्कृतहिन्दी
इति सम्मन्त्र्य हृष्टास्ते पुरान्तर्विबुधारयः।<br>प्रदोषे मुदिता भूत्वा चेरुर्मन्मथचारताम्॥ १४॥पुलकित शरीरवाले दैत्य हर्षपूर्वक इस प्रकार कह रहे थे। इस प्रकार वे देवशत्रु दानव त्रिपुरके भीतर मन्त्रणा करके सायंकाल होनेपर प्रसन्न होकर स्वच्छन्दाचारमें प्रसक्त हो गये॥ १—१४॥
मुहुर्मुक्त्तोदयो भ्रान्त उदयाग्रं महामणिः।<br>तमांस्युत्सार्य भगवांश्चन्द्रो जृम्भति सोऽम्बरम्॥ १५॥<br>कुमुदालङ्कृते हंसो यथा सरसि विस्तृते।<br>सिंहो यथा चोपविष्टो वैदूर्य्यशिखरे महान्॥ १६॥<br>विष्णोर्यथा च विस्तीर्णे हारश्चोरसि संस्थितः।<br>तथावगाढे नभसि चन्द्रोऽत्रिनयनोद्भवः।<br>भ्राजते भ्राजयंल्लोकात्सृजञ्ज्योत्स्नारसं बलात्॥ १७॥उसी समय बारम्बार मोतीके निकलनेका भ्रम उत्पन्न करनेवाले एवं महामणिके समान भगवान् चन्द्रमा उदयाचलके शिखरपर दीख पड़े। वे अन्धकारका विनाश करके आकाशमण्डलमें आगे बढ़ रहे थे।
शीतांशावुदिते चन्द्रे ज्योत्स्नापूर्णे पुरेऽसुराः।<br>प्रदोषे ललितं चक्रुर्गृहमात्मानमेव च॥ १८॥<br>रथ्यासु राजमार्गेषु प्रासादेषु गृहेषु च।<br>दीपांश्चम्पकपुष्पाभा नाल्यस्नेहप्रदीपिताः॥ १९॥<br>तदा मठेषु ते दीपाः स्नेहपूर्णाः प्रदीपिताः।<br>गृहाणि वसुमन्त्येषां सर्वरत्नमयानि च।<br>ज्वलतोऽदीपयन् दीपांचन्द्रोदय इव ग्रहाः॥ २०॥<br>चन्द्रांशुभिर्भसमानमन्तर्दीपैः सुदीपितम्।<br>उपद्रवैः कुलमिव पीयते त्रिपुरे तमः॥ २१॥उस समय जैसे कुमुदिनीसे सुशोभित विशाल सरोवरमें हंस, वैदूर्यके शिखरपर बैठा हुआ महान् सिंह और भगवान् विष्णुके विस्तीर्ण वक्षःस्थलपर लटकता हुआ हार शोभा पाता है, उसी तरह महर्षि अत्रिके नेत्रसे उत्पन्न हुए चन्द्रमा अथाह आकाशमें स्थित होकर
तस्मिन् पुरे वै तरुणप्रदोषे<br>चन्द्राट्टहासे तरुणप्रदोषे।<br>रत्यर्थिनो वै दनुजा गृहेषु<br>सहाङ्गनाभिः सुचिरं विरेमुः॥ २२॥<br>विनोदिता ये तु वृषध्वजस्य<br>पञ्चेष्ववस्ते मकरध्वजेन।<br>तत्रासुरेष्वासुरपुङ्गवेषु<br>स्वाङ्गाङ्गनाः स्वेदयुता बभूवुः॥ २३॥<br>कलप्रलापेषु च दानवीनां<br>वीणाप्रलापेषु च मूर्च्छितांस्तु।<br>मत्तप्रलापेषु च कोकिलानां<br>सचापबाणो मदनो ममन्थ॥ २४॥अपनी चाँदनीसे बलपूर्वक सारे लोकोंको सींचते
तमांसि नैशानि द्रुतं निहत्य<br>ज्योत्स्त्रावितानेन जगद्वितत्य।<br>खे रोहिणीं तां च प्रियां समेत्य<br>चन्द्रः प्रभाभिः कुरुतेऽधिराज्यम्॥ २५॥एवं प्रकाशित करते हुए सुशोभित हो रहे थे। इस
  • अध्याय १३९ * ४९९

| स्थित्वैव कान्तस्य तु पादमूले<br>काचिद् वरस्त्री स्वकपोलमूले।<br>विशेषकं चारुतरं करोति<br>तेनाननं स्वं समलङ्करोति॥ २६<br><br>दृष्ट्वाननं मण्डलदर्पणस्थं<br>महाप्रभा मे मुखजेति जप्त्वा।<br>स्मृत्वा वराङ्गी रमणैरितानि<br>तेनैव भावेन रतीमवाप॥ २७<br><br>रोमाञ्चितैर्गात्रवरैर्युवभ्यो<br>रतानुरागादरमणेन चान्याः।<br>स्वयं द्रुतं यान्ति मदाभिभूताः<br>क्षपा यथा सार्कदिनावसाने॥ २८<br><br>पेपीयते चातिरसानुविद्धा<br>विमार्गितान्या च प्रियं प्रसन्ना।<br>काचित् प्रियस्यातिचिरात् प्रसन्ना<br>आसीत् प्रलापेषु च सम्प्रसन्ना॥ २९<br><br>गोशीर्षयुक्तैर्हरिचन्दनैश्च<br>पङ्काङ्किताक्षीरधराऽऽसुरीणाम्।<br>मनोज्ञरूपा रुचिरा बभूवुः<br>पूर्णामृतस्येव सुवर्णकुम्भाः॥ ३०<br><br>क्षताधरोष्ठा द्रुतदोषरक्ता<br>ललन्ति दैत्या दयितासु रक्ताः।<br>तन्त्रीप्रलापास्त्रिपुरेषु रक्ताः<br>स्त्रीणां प्रलापेषु पुनर्विरक्ताः॥ ३१<br><br>क्वचित् प्रवृत्तं मधुराभिगानं<br>कामस्य बाणैः सुकृतं निधानम्।<br>आपानभूमीषु सुखप्रमेयं<br>गेयं प्रवृत्तं त्वथ साधयन्ति॥ ३२<br><br>गेयं प्रवृत्तं त्वथ शोधयन्ति<br>केचित् प्रियां तत्र च साधयन्ति।<br>केचित् प्रियां सम्प्रति बोधयन्ति<br>सम्बुध्य सम्बुध्य च रामयन्ति॥ ३३<br><br>चूतप्रसूनप्रभवः सुगन्धः<br>सूर्ये गते वै त्रिपुरे बभूव।<br>समर्मरो नूपुरमेखलानां<br>शब्दश्च सम्बाधति कोकिलानाम्॥ ३४ | प्रकार सायंकालमें शीतरश्मि चन्द्रमाके उदय होनेपर जब त्रिपुरमें चाँदनी फैल गयी, तब असुरगण अपने-अपने गृहोंको सजाने लगे। गलियों, सड़कों, महलों और गृहोंमें तेलसे भरे हुए दीपक जला दिये गये, जो चम्पाके पुष्पकी भाँति सुशोभित हो रहे थे। उसी प्रकार देवालयोंमें भी तेलसे परिपूर्ण दीपक जलाये गये। दानवोंके गृह धन-सम्पत्तिसे परिपूर्ण तो थे ही, उनमें अनेक प्रकारके रत्न भी जड़े हुए थे, जिससे वे जलते हुए दीपकोंको चन्द्रोदय होनेपर ग्रहोंकी तरह अधिक उद्दीप्त कर रहे थे॥ १५–३०॥<br><br>वे भवन बाहरसे तो चन्द्रमाकी किरणोंसे प्रकाशित थे और भीतर जलते हुए दीपकोंसे उद्दीप्त हो रहे थे, जिससे वे त्रिपुरके अन्धकारको उसी प्रकार पीकर नष्ट कर रहे थे, जैसे उपद्रवोंके प्रकोपसे कुल नष्ट हो जाता |

१४१- पुरूरवाका सूर्य-चन्द्रके साथ समागम और पितृ-तर्पण, पर्वसंधिका वर्णन तथा श्राद्धभोजी पितरोंका निरूपण

५०० * मत्स्यपुराण *


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्रियावगूढा दयितोपगूढा<br>काचित् प्ररूढाङ्कुरहापि नारी।<br>सुचारुवाष्पाङ्कुरपल्लवानां<br>नवाम्बुसिक्ता इव भूमिरासीत्॥ ३५<br><br>शशाङ्कपादैरुपशोभितेषु<br>प्रासादवर्येषु वराङ्गनानाम् ।<br>माधुर्यभूताभरणामहान्तः<br>स्वना बभूवुर्मदनेषु तुल्याः॥ ३६<br><br>पानेन खिन्ना दयितातिवेलं<br>कपोलमाघ्रासि च किं ममेदम्।<br>आरोह मे श्रोणिमिमां विशालां<br>पीनोन्नतां काञ्चनमेखलाख्याम्॥ ३७<br><br>रथ्यासु चन्द्रोदयभासितासु<br>सुरेन्द्रमार्गेषु च विस्तृतेषु।<br>दैत्याङ्गना यूथगता विभान्ति<br>तारा यथा चन्द्रमसो दिवान्ते॥ ३८<br><br>अट्टाट्टहासेषु च चामरेषु<br>प्रेङ्खासु चान्या मदलोलभावात्।<br>संदोलयन्ते कलसम्प्रहासाः<br>प्रोवाच काञ्चीगुणसूक्ष्मनादा॥ ३९<br><br>अम्लानमालान्वितसुन्दरीणां<br>पर्याय एषोऽस्ति च हर्षितानाम्।<br>श्रूयन्ति वाचः कलधौतकल्पा<br>वापीषु चान्ये कलहंसशब्दाः॥ ४०<br><br>काञ्चीकलापश्च सहाङ्गरागः<br>प्रेङ्खासु तद्रागकृताश्च भावाः।<br>छिन्दन्ति तासामसुराङ्गनानां<br>प्रियालयान् मन्मथमार्गणानाम्॥ ४१<br><br>चित्राम्बरश्रोद्धृतकेशपाशः<br>संदोल्यमानः शुशुभेऽसुरीणाम्।<br>सुचारुवेशाभरणैरुपेत-<br>स्तारागणैर्ज्योतिरिवास चन्द्रः॥ ४२<br><br>सन्दोलनादुच्छ्वसितैश्छिन्नसूत्रैः<br>काञ्चीभ्रष्टैर्मणिभिर्विप्रकीर्णैः ।<br>दोलाभूमिस्तैर्विचित्रा विभाति<br>चन्द्रस्य पार्श्वोपगतैर्विचित्रा॥ ४३<br><br>सचन्द्रिके सोपवने प्रदोषे<br>रुतेषु वृन्देषु च कोकिलानाम्।<br>शरव्यं प्राप्य पुरेऽसुराणां<br>प्रक्षीणबाणो मदनश्चचार॥ ४४है। रात्रिके समय जब चन्द्रमाकी उज्ज्वल छटा पूरे<br><br><br>त्रिपुरमें फैल गयी तब दानवगण रात बितानेके लिये<br><br><br>अपनी पत्नियोंके साथ अपने-अपने गृहोंमें चले गये।<br><br><br>इधर रात बीती और कोयलें कूजने लगीं॥ ३१–४४॥
* अध्याय १४० *५०१
इति तत्र पुरेऽमरद्विषाणां<br>सपदि हि पश्चिमकौमुदी तदासीत् ।<br>रणशिरसि पराभविष्यतां वै<br>भवतुरगैः कृतसंक्षया अरीणाम् ॥ ४५कुछ देर बाद त्रिपुरमें युद्धके मुहानेपर शङ्करजीके घोड़ोंद्वारा पराजित किये गये शत्रुओंकी क्षीण कीर्तिकी तरह उन देवशत्रुओंके नगरमें एकाएक चतुर्थ प्रहरकी क्षीण चाँदनी दीख पड़ने लगी।
चन्द्रोऽथ कुन्दकुसुमाकरहारवर्णो<br>ज्योत्स्नावितानरहितोऽभ्रसमानवर्णः।<br>विच्छा्यतां हि समुपेत्य न भाति तद्वद्<br>भाग्यक्षये धनपतिश्च नरो विवर्णः॥ ४६उस समय कुन्दके पुष्पसमूहोंसे निर्मित हारके समान उज्ज्वल वर्णवाले चन्द्रमा किरणजालके क्षीण हो जानेके कारण निर्जल बादलकी तरह दीखने लगे। चाँदनीके नष्ट हो जानेपर चन्द्रमाकी शोभा उसी प्रकार जाती रही, जैसे धन-सम्पत्तिसे सम्पन्न मनुष्य भाग्यके नष्ट हो जानेपर शोभाहीन हो जाता है।
चन्द्रप्रभामरुणसारथिनाभिभूय<br>संतप्तकाञ्चनरथाङ्गसमानबिम्बः।<br>स्थित्वोदयाग्रमुकुटे बहुरेव सूर्यो<br>भात्यम्बरे तिमिरतोयवहां तरिष्यन् ॥ ४७उस समय तपाये हुए स्वर्णमय चक्रके समान बिम्बवाले सूर्य अपने सारथि अरुणकी प्रभासे चन्द्रमाकी कान्तिको तिरस्कृत कर उदयाचलके अग्र शिखरपर स्थित हुए और आकाशमण्डलमें अन्धकाररूपी नदीको पार करते हुए शोभा पा रहे थे॥ ४५—४७॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे त्रिपुरकौमुदीनामैकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १३९ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें त्रिपुरकौमुदी नामक एक सौ उन्तालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १३९ ॥


एक सौ चालीसवाँ अध्याय

देवताओं और दानवोंका भीषण संग्राम, नन्दीश्वरद्वारा विद्युन्मालीका वध, मयका पलायन तथा शङ्करजीकी त्रिपुरपर विजय

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—ऋषियो!
उदिते तु सहस्रांशौ मेरौ भासाकरे रवौ।<br>नदद्देव बलं कृत्स्नं युगान्त इव सागराः॥ १प्रकाश बिखेरनेवाले सहस्रांशुमाली सूर्यके मेरुगिरिपर उदित होते ही सारी-की-सारी देवसेना प्रलयकालीन सागरकी तरह उच्च स्वरसे गर्जना करने लगी।
सहस्रनयनो देवस्ततः शक्रः पुरन्दरः।<br>सवित्तदः सवरुणस्त्रिपुरं प्रययौ हरः॥ २तब भगवान् शङ्कर सहस्रनेत्रधारी पुरन्दर इन्द्र, कुबेर और वरुणको साथ लेकर त्रिपुरकी ओर प्रस्थित हुए।
ते नानाविधिरूपाश्च प्रमथातिप्रमाथिनः।<br>ययुः सिंहरवैर्घोरैर्वादित्रनिनदैरपि ॥ ३उनके पीछे विभिन्न रूपधारी शत्रुविनाशक प्रमथगण भीषण सिंहनाद करते और बाजा बजाते हुए चले।
ततो वादितवादित्रैश्चातपत्रैर्महाद्रुमैः।<br>बभूव तद्वलं दिव्यं वनं प्रचलितं यथा॥ ४उस समय बजते हुए बाजों, छत्रों और विशाल वृक्षोंसे युक्त होनेके कारण वह देवसेना ऐसी लग रही थी, मानो चलता-फिरता वन हो।
तदापतन्तं सम्प्रेक्ष्य रौद्रं रुद्रबलं महत्।<br>संक्षोभो दानवेन्द्राणां समुद्रप्रतिमो बभौ॥ ५तत्पश्चात् शङ्करजीकी उस विशाल भयंकर सेनाको आक्रमण करते देखकर दानवेन्द्रोंका समूह सागरकी तरह संक्षुब्ध हो उठा।

प्रवृत्तासु पुराणीषु धर्म्यासु ललितासु च।

५०२ * मत्स्यपुराण *


SanskritHindi
ते चासीन् पट्टिशान् शक्तीः शूलदण्डपरश्वधान् ।<br>शरासनानि वज्राणि गुरूणि मुसलानि च ॥ ६<br><br>प्रगृह्य कोपरक्ताक्षाः सपक्षा इव पर्वताः ।<br>निजघ्नुः पर्वतघ्नाय घना इव तपात्यये ॥ ७फिर तो पंखधारी पर्वतोंकी भाँति विशालकाय दानवोंके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। वे खड्ग, पट्टिश (पट्टे), शक्ति, शूल, दण्ड, कुठार, धनुष, वज्र तथा बड़े-बड़े मूसलोंको लेकर एक साथ ही इन्द्रपर इस प्रकार प्रहार करने लगे, जैसे ग्रीष्म-ऋतुके बीत जानेपर बादल जलकी वृष्टि करते हैं॥ १-७॥
सविद्युन्मालिनस्ते वै समया दितिनन्दनाः ।<br>मोदमानाः समासेदुर्देवदेवैः सुरारयः ॥ ८<br><br>मर्त्तव्यकृतबुद्धीनां जये चानिश्चितात्मनाम् ।<br>अबलानां चमूर्ह्यासीदबलावयवा इव ॥ ९<br><br>विगर्जन्त इवाम्भोदा अम्भोदसदृशत्विषः ।<br>प्रयुध्य युद्धकुशलाः परस्परकृतागसः ॥ १०<br><br>धूमायन्तो ज्वलद्भिश्च आयुधैश्चन्द्रवर्चसैः ।<br>कोपाद् वा युद्धलुब्धाश्च कुट्ट्यन्ते परस्परम् ॥ ११<br><br>वज्राहताः पतन्त्यन्ये बाणैरन्ये विदारिताः ।<br>अन्ये विदारिताश्चक्रैः पतन्ति हृदधेर्जले ॥ १२<br><br>छिन्नस्रग्दामहाराश्च प्रमृष्टाम्बरभूषणाः ।<br>तिमिनक्रगणे चैव पतन्ति प्रमथाः सुराः ॥ १३<br><br>गदानां मुसलानां च तोमराणां परश्वधाम् ।<br>वज्रशूलर्ष्टिपातानां पट्टिशानां च सर्वतः ॥ १४<br><br>गिरिशृङ्गोपलानां च प्रेरितानां प्रमन्युभिः ।<br>सजवानां दानवानां सधूमानां रवित्विषाम् ।<br>आयुधानां महानाघः सोऽग्रौघे पतत्यपि ॥ १५<br><br>प्रवृद्धवेगैस्तैस्तत्र सुरासुरकरेरितैः ।<br>आयुधैस्त्रस्तनक्षत्रः क्रियते संक्षयो महान् ॥ १६<br><br>क्षुद्राणां गजयोर्युद्धे यथा भवति सङ्क्षयः ।<br>देवासुरगणैस्तद्वत् तिमिनक्रक्षयोऽभवत् ॥ १७इस प्रकार मयसहित देवशत्रु दैत्यगण विद्युन्मालीके साथ होकर प्रसन्नतापूर्वक देवेश्वरोंसे टक्कर लेने लगे। उनके मनमें विजयकी आशा तो थी ही नहीं, अतः वे मरनेपर उतारू हो गये थे। उन बलहीनोंकी सेना स्त्रियोंके अवयवोंकी तरह दुर्बल थी। मेघकी-सी कान्तिवाले युद्धकुशल दैत्य परस्पर एक-दूसरेपर प्रहार करते हुए लड़ रहे थे और मेघके समान गरज रहे थे। युद्धलोभी सैनिक प्रज्वलित अग्नि एवं चन्द्रमाके समान तेजस्वी अस्त्रोंद्वारा क्रोधपूर्वक परस्पर एक-दूसरेको मार-पीट-कूट रहे थे। कुछ लोग वज्रसे घायल होकर, कुछ लोग बाणोंसे विदीर्ण होकर और कुछ लोग चक्रोंसे छिन्न-भिन्न होकर समुद्रके जलमें गिर रहे थे। (दैत्योंकी मारसे) जिनकी मालाओंके सूत्र और हार टूट गये थे तथा जिनके वस्त्र और आभूषण नष्ट-भ्रष्ट हो गये थे, वे देवता और गणेश्वर समुद्रमें मगरमच्छों एवं नाकोंके मध्यमें गिर रहे थे। धूमयुक्त सूर्यकी-सी कान्तिवाले वेगशाली दानवोंद्वारा क्रोधपूर्वक चलाये गये गदा, मुसल, तोमर, कुठार, वज्र, शूल, ऋष्टि, पट्टिश, पर्वतशिखर और शिलाखण्ड आदि आयुधोंका महान् समूह सागरमें गिर रहा था। देवताओं और असुरोंके हाथोंसे वेगपूर्वक चलाये गये आयुधोंसे नक्षत्रगण (भी) त्रस्त हो रहे थे। और महान् संहार हो रहा था। जैसे दो हाथियोंके लड़ते समय क्षुद्र जीवोंका विनाश हो जाता है, उसी तरह देवताओं और असुरोंके संग्रामसे मगरमच्छ और नाकोंका संहार होने लगा ॥ ८-१७॥
विद्युन्माली च वेगेन विद्युन्माली इवाम्बुदः ।<br>विद्युन्मालं घनोन्नादो नन्दीश्वरमभिद्रुतः ॥ १८तत्पश्चात् विद्युत्समूहोंसे युक्त मेघकी तरह कान्तिमान् विद्युन्मालीने बिजलीसे युक्त बादलकी तरह गरजते हुए नन्दीश्वरपर वेगपूर्वक धावा किया।
स तं तमोऽरिवदनं प्रणदन् वदतां वरः ।<br>उवाच युधि शैलादिं दानवोऽम्बुधिनिःस्वनः ॥ १९उस समय वक्ताओंमें श्रेष्ठ दानव विद्युन्माली बादलकी तरह गरजता हुआ युद्धस्थलमें सूर्यके समान तेजस्वी मुखवाले नन्दीश्वरसे बोला—
युद्धाकाङ्क्षी तु बलवान् विद्युन्माल्यहमागतः ।<br>यदि त्विदानीं मे जीवन्मुच्यसे नन्दिकेश्वर ।<br>न विद्युन्मालिहननं वचोभिर्युधि दानवम् ॥ २०'नन्दिकेश्वर! मैं बलवान् विद्युन्माली हूँ और युद्ध करनेकी इच्छासे तुम्हारे सम्मुख खड़ा हूँ। अब तुम्हार मेरे हाथोंसे जीवित बच पाना असम्भव है। युद्धस्थलमें वचनोंद्वारा दानव विद्युन्मालीका हनन नहीं किया जा सकता।'
  • अध्याय १४० * | ५०३ ---|---:

| तमेवंवादिनं दैत्यं नन्दीशस्तपतां वरः।<br>उवाच प्रहरंस्तत्र वाक्यालङ्कारकोविदः॥ २१<br>दानवाधम कामानां नैषोऽवसर इत्युत।<br>शक्तो हन्तुं किमात्मानं जातिदोषाद् विबृंहसि॥ २२<br>यदि तावन्मया पूर्वं हतोऽसि पशुवद् यथा।<br>इदानीं वा कथं नाम न हिंस्ये क्रतुदूषणम्॥ २३<br>सागरं तरते दोर्भ्यां पातयेद् यो दिवाकरम्।<br>सोऽपि मां शक्नुयान्नैव चक्षुर्भ्यां समवीक्षितुम्॥ २४<br>इत्येवंवादिनं तत्र नन्दिनं तन्निभो बले।<br>बिभेदैकेषुणा दैत्यः करेणार्क इवाम्बुदम्॥ २५<br>वक्षसः स शरस्तस्य पपौ रुधिरमुत्तमम्।<br>सूर्यस्स्वात्मप्रभावेण नद्यर्णवजलं यथा॥ २६<br>स तेन सुप्रहारेण प्रथमं च तिरोहितः।<br>हस्तेन वृक्षमूत्पाट्य चिक्षेप गजराडिव॥ २७<br>वायुनुन्नः स च तरुः शीर्णपुष्पो महारवः।<br>विद्युन्मालिशरैश्छिन्नः पपात पतगेशवत्॥ २८<br>वृक्षमालोक्य तं छिन्नं दानवेन वरेषुभिः।<br>रोषमाहारयत् तीव्रं नन्दीश्वरः सुविग्रहः॥ २९<br>सोद्यम्य करमारावे रविशक्रकरप्रभम्।<br>दुद्राव हन्तुं स क्रूरं महिषं गजराडिव॥ ३०<br>तमापतन्तं वेगेन वेगवान् प्रसभं बलात्।<br>विद्युन्माली शरशतैः पूरयामास नन्दिनम्॥ ३१<br>शरकण्टकिताङ्गो वै शैलादिः सोऽभवत् पुनः।<br>अरेर्गृह्य रथं तस्य महतः प्रययौ जवात्॥ ३२<br>विलम्बिताश्वो विशिरो भ्रमितश्च रणे रथः।<br>पपात मुनिशापेन सादित्योऽर्करथो यथा॥ ३३<br>अन्तरान्निर्गतश्चैव मायया स दितेः सुतः।<br>आजघान तदा शक्त्या शैलादिं समवस्थितम्॥ ३४ | तब वाक्यके अलंकारोंके ज्ञाता एवं श्रेष्ठ तेजस्वी नन्दीश्वरने ऐसा कहनेवाले दैत्य विद्युन्मालीपर प्रहार करते हुए कहा—'दानवाधम ! तुमलोग इस समय कामासक्त ही हो, जिसका यह अवसर नहीं है। तुम मुझे मारनेमें समर्थ हो तो उसे कर दिखाओ, किंतु जाति-दोषके कारण तुम अपने प्रति ऐसी डींग क्यों मार रहे हो। यदि इससे भी पहले मैंने तुम्हें पशुकी तरह बहुत मारा है तो इस समय तुझ यज्ञविध्वंसीका हनन कैसे नहीं करूँगा ? (तुम समझ लो) जो हाथोंसे सागरको तैरनेकी तथा सूर्यको आकाशसे गिरा देनेकी शक्ति रखता हो, वह भी मेरी ओर आँख उठाकर नहीं देख सकता।' तब नन्दीश्वरके समान ही बलशाली विद्युन्मालीने इस प्रकार कहते हुए नन्दीश्वरको एक बाणसे वैसे ही बींध दिया, जैसे सूर्य अपनी किरणसे बादलका भेदन करते हैं। वह बाण नन्दीश्वरके वक्षःस्थलपर जा लगा और उनका शुद्ध रक्त इस प्रकार पीने लगा जैसे सूर्य अपने प्रभावसे नदी और समुद्रके जलको पीते हैं। उस प्रथम प्रहारसे अत्यन्त क्रुद्ध हुए नन्दीश्वरने अपने हाथसे एक वृक्ष उखाड़कर गजराजकी भाँति विद्युन्मालीके ऊपर फेंका। वायुसे प्रेरित हुआ वह वृक्ष घोर शब्द करता और पुष्पोंको बिखेरता हुआ आगे बढ़ा, किंतु विद्युन्मालीके बाणोंसे छिन्न-भिन्न होकर एक बड़े पक्षीकी तरह भूतलपर बिखर गया॥ १८–२८॥<br><br>विद्युन्मालीद्वारा श्रेष्ठ बाणोंके प्रहारसे उस वृक्षको छिन्न-भिन्न हुआ देखकर महाबली नन्दीश्वर अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे। फिर तो वे सूर्य और इन्द्रके हाथके समान प्रभावशाली अपने हाथको उठाकर सिंहनाद करते हुए उस क्रूर राक्षसका वध करनेके लिये इस प्रकार झपटे, जैसे गजराज भैंसेपर टूट पड़ता है। नन्दीश्वरको वेगपूर्वक आक्रमण करते देखकर वेगशाली विद्युन्मालीने बलपूर्वक नन्दीश्वरके शरीरको सैकड़ों बाणोंसे व्याप्त कर दिया। उस समय नन्दीश्वरका शरीर बाणरूपी काँटोंसे भरा हुआ दिखायी पड़ने लगा; तब उन्होंने अपने शत्रु विद्युन्मालीके रथको पकड़कर बड़े वेगसे दूर फेंक दिया। उस समय उस रथके घोड़े उसमें लटके हुए थे और उसका अग्रभाग टूट गया था तथा वह चक्कर काटता हुआ रणभूमिमें उसी प्रकार गिर पड़ा, जैसे मुनिके शापसे सूर्यसहित सूर्यका रथ गिर पड़ा था। तब दितिपुत्र विद्युन्माली मायाके बलसे अपनेको सुरक्षित रखकर रथके भीतरसे निकल पड़ा और उसने सामने खड़े हुए नन्दीश्वरपर शक्तिसे प्रहार किया। |

५०४* मत्स्यपुराण *
श्लोकअर्थ
तामेव तु विनिष्क्रम्य शक्तिं शोणितभूषिताम्।<br>विद्युन्मालिनमुद्दिश्य चिक्षेप प्रमथाग्रणीः॥ ३५<br>तया भिन्नतनुत्राणो विभिन्नहृदयस्त्वपि।<br>विद्युन्माल्यपतद् भूमौ वज्राहत इवाचलः॥ ३६प्रमथगणोंके नायक नन्दीश्वरने रक्तसे लथपथ हुई उस शक्तिको हाथमें लेकर विद्युन्मालीको लक्ष्य करके फेंक दिया। फिर तो उस शक्तिने विद्युन्मालीके कवचको फाड़कर उसके हृदयको भी विदीर्ण कर दिया, जिससे वह वज्रसे मारे गये पर्वतकी तरह धराशायी हो गया॥ २९—३६॥
विद्युन्मालिनि निहते सिद्धचारणकिन्नराः।<br>साधु साध्विति चोक्त्वा ते पूजयन्त उमापतिम्॥ ३७<br>नन्दिना सादिते दैत्ये विद्युन्मालौ हते मयः।<br>ददाह प्रमथानीकं वनमग्निरिवोद्धतः॥ ३८<br>शूलनिर्दारितोरस्का गदाचूर्णितमस्तकाः।<br>इषुभिर्गाढविद्धाश्च पतन्ति प्रमथार्णवे॥ ३९<br>अथ वज्रधरो यमोऽर्थदः स च नन्दी<br>स च षण्मुखो गुहः।<br>मयमसुरवीरसम्प्रवृत्तं विविघुः शस्त्रवरैर्हतारयः॥ ४०<br>नागं तु नागाधिपतेः शताक्षं<br>मयो विदार्येषु वरेण तूर्णम्।<br>यमं च वित्ताधिपतिं च विद्ध्वा<br>ररास मत्ताम्बुदवत् तदानीम्॥ ४१<br>ततः शरैः प्रमथगणैश्च दानवा<br>दृढाहताश्चोत्तमवेगविक्रमाः।<br>भृशानुविद्धास्त्रिपुरं प्रवेशिता<br>यथासुराश्चक्रधरेण संयुगे॥ ४२<br>ततस्तु शङ्खानकभेरीमर्दलाः<br>ससिंहनादा दनुपुत्रभङ्गदाः।<br>कपर्दिसैन्ये प्रबभुः समन्ततो<br>निपात्यमाना युधि वज्रसंनिभाः॥ ४३<br>अथ दैत्यपुराभावे पुष्ययोगो बभूव ह।<br>बभूव चापि संयुक्तं तद्योगेन पुरत्रयम्॥ ४४इस प्रकार विद्युन्मालीके मारे जानेपर सिद्ध, चारण और किन्नरोंके समूह 'ठीक है, ठीक है' ऐसा कहते हुए शंकरजीकी पूजा करने लगे। इधर नन्दीश्वरद्वारा दैत्य विद्युन्मालीके मारे जानेपर मयने प्रमथोंकी सेनाको उसी प्रकार जलाना आरम्भ किया, जैसे उद्दीप्त दावाग्नि वनको जला डालती है। उस समय शूलके आघातसे जिनके वक्षःस्थल फट गये थे एवं गदाके प्रहारसे मस्तक चूर्ण हो गये थे और जो बाणोंकी मारसे अत्यन्त घायल हो गये थे, ऐसे प्रमथगण समुद्रमें गिर रहे थे। तदनन्तर शत्रुओंके विनाशक वज्रधारी इन्द्र, यमराज, कुबेर, नन्दीश्वर तथा छः मुखवाले स्वामीकार्तिक—ये सभी असुर-वीरोंसे घिरे हुए मयको श्रेष्ठ अस्त्रोंद्वारा बाँधने लगे। उस समय मयने शीघ्र ही एक श्रेष्ठ बाणसे गजारूढ़ सौ नेत्रोंवाले इन्द्रको तथा ऐरावत नागको विदीर्ण कर यमराज और कुबेरको भी बाँध दिया। फिर वह घुमड़ते हुए बादलकी तरह गर्जना करने लगा। इधर प्रमथगणोंद्वारा छोड़े गये बाणोंसे उत्तम वेग एवं पराक्रमशाली दानव बुरी तरह घायल हो रहे थे। वे अत्यन्त घायल होनेके कारण भागकर त्रिपुरमें उसी प्रकार घुस रहे थे, जैसे युद्धस्थलमें चक्रपाणि विष्णुके प्रहारसे असुर। तत्पश्चात् रणभूमिमें शंकरजीकी सेनामें चारों ओर शङ्ख, ढोल, भेरी और मृदङ्ग बज उठे। वीरोंका सिंहनाद वज्रकी गड़गड़ाहटकी भाँति गूँज उठा, जो दानवोंकी पराजयको सूचित कर रहा था। इसी समय उस दैत्यपुरका विनाशक पुष्ययोग आ गया। उस योगके प्रभावसे तीनों पुर संयुक्त हो गये॥ ३७—४४॥
ततो बाणं त्रिधा देवस्त्रिदैवतमयं हरः।<br>मुमोच त्रिपुरे तूर्णं त्रिनेत्रस्त्रिपथाधिपः॥ ४५<br>तेन मुक्तेन बाणेन बाणपुष्पसमप्रभम्।<br>आकाशं स्वर्णसंकाशं कृतं सूर्येण रञ्जितम्॥ ४६<br>मुक्त्वा त्रिदैवतमयं त्रिपुरे त्रिदशः शरम्।<br>धिग्धिङ्मामेति चक्रन्द कष्टं कष्टमिति ब्रुवन्॥ ४७तब त्रैलोक्याधिपति त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकरने शीघ्र ही अपने त्रिदेवमय बाणको तीन भागोंमें विभक्त कर त्रिपुरपर छोड़ दिया। उस छूटे हुए बाणने (तीनों देवताओंके अंशसे तीन प्रकारकी प्रभासे युक्त होकर) बाण वृक्षके पुष्पके समान नीले आकाशको स्वर्ण-सदृश प्रभाशाली और सूर्यकी किरणोंसे उद्दीप्त कर दिया। देवेश्वर शम्भु त्रिपुरपर त्रिदेवमय बाण छोड़कर—'मुझे धिक्कार
* अध्याय १४० *५०५
वैधुर्यं दैवतं दृष्ट्वा शैलादिर्गजवद्गतिः।<br>किमिदं त्विति पप्रच्छ शूलपाणिं महेश्वरम्॥ ४८<br><br>ततः शशाङ्कतिलकः कपर्दी परमार्तवत्।<br>उवाच नन्दिनं भक्तः स मयोऽद्य विनङ्क्ष्यति॥ ४९<br><br>अथ नन्दीश्वरस्तूर्णं मनोमारुतवद् बली।<br>शरे त्रिपुरमायाति त्रिपुरं प्रविवेश सः॥ ५०<br><br>स मयं प्रेक्ष्य गणपः प्राह काञ्चनसन्निभः।<br>विनाशस्त्रिपुरस्यास्य प्राप्तो मय सुदारुणः॥ ५१<br><br>अनेनैव गृहेण त्वमपक्राम ब्रवीम्यहम्।<br><br>श्रुत्वा तन्नन्दिवचनं दृढभक्तो महेश्वरे।<br>तेनैव गृहमुख्येन त्रिपुरादपसर्पितः॥ ५२<br><br>सोऽपीषुः पत्रपुटवद् दग्ध्वा तन्नगरत्रयम्।<br>त्रिधा इव हुताशश्च सोमो नारायणस्तथा॥ ५३<br><br>शरतेजःपरीतानि पुराणि द्विजपुङ्गवाः।<br>दुष्पुत्रदोषाद् दह्यन्ते कुलान्यूर्ध्वं यथा तथा॥ ५४है, धिक्कार है, हाय! बड़े कष्टकी बात हो गयी' यों कहते हुए चिल्ला उठे। इस प्रकार शंकरजीको व्याकुल देखकर गजराजकी चालसे चलनेवाले नन्दीश्वर शूलपाणि महेश्वरके निकट पहुँचे और पूछने लगे—'कहिये, क्या बात है?' तब चन्द्रशेखर जटाजूटधारी भगवान् शंकरने अत्यन्त दुःखी होकर नन्दीश्वरसे कहा—'आज मेरा वह भक्त मय भी नष्ट हो जायगा।' यह सुनकर मन और वायुके समान वेगशाली महाबली नन्दीश्वर तुरंत उस बाणके त्रिपुरमें पहुँचनेके पूर्व ही वहाँ जा पहुँचे। वहाँ स्वर्ण-सरीखे कान्तिमान् गणेश्वर नन्दीने मयके निकट जाकर कहा—'मय! इस त्रिपुरका अत्यन्त भयंकर विनाश आ पहुँचा है, इसलिये मैं तुम्हें बतला रहा हूँ। तुम अपने इस गृहके साथ इससे बाहर निकल जाओ।' तब महेश्वरके प्रति दृढ़ भक्ति रखनेवाला मय नन्दीश्वरके उस वचनको सुनकर अपने उस मुख्य गृहके साथ त्रिपुरसे निकलकर भाग गया। तदनन्तर वह बाण अग्नि, सोम और नारायणके रूपसे तीन भागोंमें विभक्त होकर उन तीनों नगरोंको पत्तेके दोनेकी तरह जलाकर भस्म कर दिया। द्विजवरो! वे तीनों पुर बाणके तेजसे उसी प्रकार जलकर नष्ट हो रहे थे, जैसे कुपुत्रके दोषसे आगेकी पीढ़ियाँ नष्ट हो जाती हैं॥ ४५—५४॥
मेरुकैलासकल्पानि मन्दराग्रनिभानि च।<br>सकपाटगवाक्षाणि बलिभिः शोभितानि च॥ ५५<br><br>सप्रासादानि रम्याणि कूटागारोत्कटानि च।<br>सजलानि समाख्यानि सावलोकनकानि च॥ ५६<br><br>बद्धध्वजपताकानि स्वर्णरौप्यमयानि च।<br>गृहाणि तस्मिंस्त्रिपुरे दानवानामुपद्रवे।<br>दह्यन्ते दहनाभानि दहनेन सहस्रशः॥ ५७<br><br>प्रासादाग्रेषु रम्येषु वनेषूपवनेषु च।<br>वातायनगताश्चान्याश्चाकाशस्य तलेषु च॥ ५८<br><br>रमणैरुपगूढाश्च रमन्त्यो रमणैः सह।<br>दह्यन्ते दानवेन्द्राणामग्निना ह्यपि ताः स्त्रियः॥ ५९<br><br>काचित्प्रियं परित्यज्य अशक्ता गन्तुमन्यतः।<br>पुरः प्रियस्य पञ्चत्वं गताग्निवदने क्षयम्॥ ६०उस त्रिपुरमें ऐसे गृह बने थे जो सुमेरु, कैलास और मन्दराचलके अग्रभागकी तरह दीख रहे थे। जिनमें बड़े-बड़े किंवाड़ और झरोखे लगे हुए थे तथा छज्जाओंकी विचित्र छटा दीख रही थी। जो सुन्दर महलों, उत्कृष्ट कूटागारों (ऊपरी छतके कमरों), जल रखनेकी वेदिकाओं और खिड़कियोंसे सुशोभित थे। जिनके ऊपर सुवर्ण एवं चाँदीके बने हुए डंडोंमें बँधे हुए ध्वज और पताकाएँ फहरा रही थीं। ये सभी हजारोंकी संख्यामें दानवोंके उस उपद्रवके समय अग्निद्वारा जलाये जा रहे थे, जो आगकी तरह धधक रहे थे। दानवेन्द्रोंकी स्त्रियाँ, जिनमें कुछ महलोंके रमणीय शिखरोंपर बैठी थीं, कुछ वनों और उपवनोंमें घूम रही थीं, कुछ झरोखोंमें बैठकर दृश्य देख रही थीं कुछ मैदानमें घूम रही थीं—ये सभी अग्निद्वारा जलायी जा रही थीं। कोई अपने पतिको छोड़कर अन्यत्र जानेमें असमर्थ थी, अतः पतिके सम्मुख ही अग्निकी लपटोंमें आकर दग्ध हो

५०६ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
उवाच शतपत्राक्षी सास्त्राक्षीव कृताञ्जलिः।<br>हव्यवाहन भार्याहं परस्य परतापन।<br>धर्मसाक्षी त्रिलोकस्य न मां स्प्रष्टुमिहार्हसि॥ ६१<br><br>शायितं च मया देव शिवया च शिवप्रभ।<br>शरेण प्रेहि मुक्त्वेदं गृहं च दयितं हि मे॥ ६२<br><br>एका पुत्रमुपादाय बालकं दानवाङ्गना।<br>हुताशनसमीपस्था इत्युवाच हुताशनम्॥ ६३<br><br>बालोऽयं दुःखलब्धश्च मया पावक पुत्रकः।<br>नार्हस्येनमुपादातुं दयितं षण्मुखप्रिय॥ ६४<br><br>काश्चित् प्रियान् परित्यज्य पीडिता दानवाङ्गनाः।<br>निपतन्त्यर्णवजले शिञ्जानविभूषणाः॥ ६५<br><br>तात पुत्रेति मातेति मातुलेति च विह्वलम्।<br>चक्रन्दुस्त्रिपुरे नार्यः पावकज्वालवेपिताः॥ ६६<br><br>यथा दहति शैलाग्निः साम्बुजं जलजाकरम्।<br>तथा स्त्रीवक्त्रपद्मानि चादहत् पुरेऽनलः॥ ६७गयी। कोई कमलनयनी नारी आँखोंमें आँसू भरे हुए हाथ जोड़कर कह रही थी—'हव्यवाहन! मैं दूसरेकी पत्नी हूँ। परतापन! आप त्रिलोकीके धर्मके साक्षी हैं, अतः यहाँ मेरा स्पर्श करना आपके लिये उचित नहीं है।' (कोई कह रही थी—) 'शिवके समान कान्तिमान् अग्निदेव! मुझ पतिव्रताने इस घरमें अपने पतिको सुला रखा है, अतः इसे छोड़कर आप दूसरी ओरसे चले जाइये; क्योंकि यह गृह मुझे परम प्रिय है।' एक दानवपत्नी अपने शिशु पुत्रको गोदमें लेकर अग्निके समीप गयी और अग्निसे कहने लगी—'स्वामीकार्तिकके प्रेमी पावक! मुझे यह शिशु पुत्र बड़े दुःखसे प्राप्त हुआ है, अतः इसे ले लेना आपके लिये उचित नहीं है। यह मुझे परम प्रिय है।' कुछ पीड़ित हुई दानव-पत्नियों अपने पतियोंको छोड़कर समुद्रके जलमें कूद रही थीं। उस समय उनके आभूषणोंसे शब्द हो रहा था। त्रिपुरमें आगकी लपटोंके भयसे काँपती हुई नारियाँ 'हा तात!, हा पुत्र!, हा माता!, हा मामा!' कहकर विह्वलतापूर्वक करुण-क्रन्दन कर रही थीं। जैसे पर्वताग्नि (दावाग्नि) कमलोंसहित सरोवरको जला देती है उसी प्रकार अग्निदेव त्रिपुरमें स्त्रियोंके मुखरूपी कमलोंको जला रहे थे॥ ५५-६७॥
तुषारराशिः कमलाकराणां<br>यथा दहत्यम्बुजकानि शीते।<br>तथैव सोऽग्निस्त्रिपुराङ्गनानां<br>ददाह वक्त्रेक्षणपङ्कजानि॥ ६८जिस प्रकार शीतकालमें तुषारराशि कमलोंसे भरे हुए सरोवरोंके कमलोंको नष्ट कर देती है उसी तरह अग्निदेव त्रिपुर-निवासिनी नारियोंके मुख और नेत्ररूप कमलोंको जला रहे थे।
शराग्निपातात् समभिद्रुतानां<br>तत्राङ्गनानामतिकोमलानाम् ।<br>बभूव काञ्चीगुणनूपुराणा-<br>माक्रन्दितानां च रवोऽति मिश्रः॥ ६९त्रिपुरमें बाणाग्निके गिरनेसे भयभीत होकर भागती हुई अत्यन्त कोमलाङ्गी सुन्दरियोंकी करधनीकी लड़ियों और पायजेबोंका शब्द आक्रन्दनके शब्दोंसे मिलकर अत्यन्त भयंकर लग रहा था।
दग्धार्धचन्द्राणि सवेदिकानि<br>विशीर्णहर्म्याणि सतोरणानि।<br>दग्धानि दग्धानि गृहाणि तत्र<br>पतन्ति रक्षार्थमिवार्णवौघे॥ ७०जिनमें अर्धचन्द्रसे सुशोभित वेदिकाएँ जल गयी थीं तथा तोरणसहित अट्टालिकाएँ जलकर छिन्न-भिन्न हो गयी थीं। ऐसे गृह जलते-जलते समुद्रमें इस प्रकार गिर रहे थे मानो वे रक्षाके लिये उसमें कूद रहे हों।
गृहैः पतद्भिर्ज्वलनावलीढै-<br>रासीत् समुद्रे सलिलं प्रतप्तम्।<br>कुपुत्रदोषैः प्रहतानुविद्धं<br>यथा कुलं याति धनान्वितस्य॥ ७१अग्निकी लपटोंसे झुलसे हुए गृहोंके समुद्रमें गिरनेसे उसका जल ऐसा संतप्त हो उठा था, जैसे सम्पत्तिशाली व्यक्तिका कुल कुपुत्रके दोषसे नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है।

१४२- युगोंकी काल-गणना तथा त्रेतायुगका वर्णन

* अध्याय १४० *५०७
गृहप्रतापैः क्वथितं समन्तात्<br>तदार्णवे तोयमुदीर्णवेगम्।<br>वित्रासयामास तिमीन् सनक्रां -<br>स्तिमिङ्गिलांस्तक्वथितांस्तथान्यान्॥ ७२<br>सगोपुरो मन्दरपादकल्पः<br>प्राकारवर्यस्त्रिपुरे च सोऽथ।<br>तैरैव सार्धं भवनैः पपात<br>शब्दं महान्तं जनयन् समुद्रे॥ ७३<br>सहस्रशृङ्गैर्भवनैर्यदासीत्<br>सहस्रशृङ्गः स इवाचलेशः।<br>नामावशेषं त्रिपुरं प्रजज्ञे<br>हुताशनाहारबलिप्रयुक्तम् ॥ ७४<br>प्रदह्यमानेन पुरेण तेन<br>जगत्सपातालदिवं प्रतप्तम्।<br>दुःखं महत्प्राप्य जलावमग्नं<br>हित्वा महान् सौधवरो मयस्य॥ ७५<br>तद् देवेशो वचः श्रुत्वा इन्द्रो वज्रधरस्तदा।<br>शशाप तद्गृहं चापि मयस्यादितिनन्दनः॥ ७६<br>असेव्यमप्रतिष्ठं च भयेन च समावृतम्।<br>भविष्यति मयगृहं नित्यमेव यथानलः॥ ७७<br>यस्य यस्य तु देशस्य भविष्यति पराभवः।<br>द्रक्ष्यन्ति त्रिपुरं खण्डं तत्रेदं नाशगा जनाः।<br>तदेतदद्यापि गृहं मयस्यामयवर्जितम्॥ ७८उस समय समुद्रमें चारों ओर गिरते हुए गृहोंकी उष्णतासे खौलते हुए जलमें तूफान आ गया, जिससे मगरमच्छ, नाक, तिमिंगिल तथा अन्यान्य जलजन्तु संतप्त होकर भयभीत हो उठे। उसी समय त्रिपुरमें लगा हुआ मन्दराचलके समान ऊँचा परकोटा फाटकसहित उन गिरते हुए भवनोंके साथ-ही-साथ महान् शब्द करता हुआ समुद्रमें जा गिरा। जो त्रिपुर थोड़ी देर पहले सहस्रों ऊँचे-ऊँचे भवनोंसे युक्त होनेके कारण सहस्र शिखरवाले पर्वतकी भाँति शोभा पा रहा था वही अग्निके आहार और बलिके रूपमें प्रयुक्त होकर नाममात्र अवशेष रह गया। जलते हुए उस त्रिपुरके तापसे पाताल और स्वर्गलोकसहित सारा जगत् संतप्त हो उठा। इस प्रकार महान् कष्ट झेलता हुआ वह त्रिपुर समुद्रके जलमें निमग्न हो गया। इसमें एकमात्र मयका महान् भवन ही बच गया था। अदिति-नन्दन वज्रधारी देवराज इन्द्रने जब ऐसी बात सुनी तो मयके उस गृहको शाप देते हुए बोले—'मयका वह गृह किसीके सेवन करनेयोग्य नहीं होगा। उसकी संसारमें प्रतिष्ठा नहीं होगी। वह अग्निकी तरह सदा भयसे युक्त बना रहेगा। जिस-जिस देशकी पराजय होनेवाली होगी उस-उस देशके विनाशोन्मुख निवासी इस त्रिपुर-खण्डका दर्शन करेंगे।' मयका वह गृह आज भी आपत्तियोंसे रहित है॥ ६८–७८॥
ऋषय ऊचुः<br>भगवन् स मयो येन गृहेण प्रपलायितः।<br>तस्य नो गतिमाख्याहि मयस्य चमसोद्भव ॥ ७९ऋषियोंने पूछा— चमससे उत्पन्न होनेवाले ऐश्वर्यशाली सूतजी ! वह मय जिस गृहको साथ लेकर भाग गया था, उस मयकी आगे चलकर क्या गति हुई ? यह हमें बतलाइये ॥ ७९ ॥
सूत उवाच<br>दृश्यते दृश्यते यत्र ध्रुवस्तत्र मयास्पदम्।<br>देवद्विट् तु मयश्चातः स तदा खिन्नमानसः।<br>ततश्च युतोऽन्यलोकेऽस्मिंस्त्राणार्थं स चकार सः॥ ८०<br>तत्रापि देवताः सन्ति आप्तोर्यामाः सुरोत्तमाः।<br>तत्राशक्तं ततो गन्तुं तं चैकं पुरमुत्तमम् ॥ ८१सूतजी कहते हैं— ऋषियो ! जहाँ ध्रुव दिखलायी पड़ते हैं वहीं मयका भी स्थान दीख पड़ता था, किंतु कुछ समयके बाद देवशत्रु मयका मन खिन्न हो गया, तब वह अपनी रक्षाके निमित्त वहाँसे हटकर अन्य लोकमें चला गया। वहाँ भी आप्तोर्याम नामक श्रेष्ठ देवता निवास करते थे, परंतु अब मयमें वहाँसे अन्यत्र जानेकी शक्ति नहीं रह गयी थी।
५०८* मत्स्यपुराण *

| शिवः सृष्ट्वा गृहं प्रादान्मयायैव गृहार्थिने ।<br>विरराम सहस्राक्षः पूजयामास चेश्वरम् ।<br>पूज्यमानं च भूतेशं सर्वे तुष्टुवुरीश्वरम् ॥ ८२<br>सम्पूज्यमानं त्रिदशैः समीक्ष्य<br>गणैर्गणेशाधिपतिं तु मुख्यम् ।<br>हर्षाद्ववल्गुर्जहसुश्च देवा<br>जग्मुर्ननर्दुस्तु विषक्तहस्ताः ॥ ८३<br>पितामहं वन्द्य ततो महेशं<br>प्रगृह्य चापं प्रविसृज्य भूतान् ।<br>रथाच्च सम्पत्य हरेषुदग्धं<br>क्षिप्तं पुरं तन्मकरालये च ॥ ८४<br>य इमं रुद्रविजयं पठते विजयावहम् ।<br>विजयं तस्य कृत्येषु ददाति वृषभध्वजः ॥ ८५<br>पितॄणां वापि श्राद्धेषु य इमं श्रावयिष्यति ।<br>अनन्तं तस्य पुण्यं स्यात् सर्वयज्ञफलप्रदम् ॥ ८६<br>इदं स्वस्त्ययनं पुण्यमिदं पुंसवनं महत् ।<br>इदं श्रुत्वा पठित्वा च यान्ति रुद्रसलोकताम् ॥ ८७ | तब भक्तवत्सल शंकरजीने एक उत्तम पुर और गृहका निर्माण कर गृहार्थी मयको प्रदान कर दिया। यह देखकर सहस्र नेत्रधारी इन्द्र शान्त हो गये। तत्पश्चात् उन्होंने महेश्वरकी पूजा की। उस समय सभी देवताओंने पूजित होते हुए भूतपति शंकरकी स्तुति की। तदनन्तर देवताओं और गणेश्वरोंद्वारा प्रधान गणेशाधिपति महेश्वरकी पूजा होते देखकर देवगण हाथ उठाकर हर्षपूर्वक जय-जयकार, अट्टहास और सिंहनाद करने लगे। इसके बाद रथसे निकलकर उन्होंने ब्रह्मा और शंकरजीकी वन्दना की। फिर हाथमें धनुष ग्रहणकर और भूतगणोंसे विदा होकर वे अपने-अपने स्थानके लिये प्रस्थित हुए; क्योंकि शंकरजीके बाणसे भस्म हुआ त्रिपुर महासागरमें निमग्न हो चुका था। जो मनुष्य विजय प्रदान करनेवाले इस रुद्रविजयका पाठ करता है, उसे भगवान् शंकर सभी कार्योंमें विजय प्रदान करते हैं। जो मनुष्य पितरोंके श्राद्धोंके अवसरपर इसे पढ़कर सुनाता है उसे सम्पूर्ण यज्ञोंका फल प्रदान करनेवाले अनन्त पुण्यकी प्राप्ति होती है। यह रुद्रविजय महान् मङ्गलकारक, पुण्यप्रद और संतानप्रदायक है। इसे पढ़ और सुनकर लोग रुद्रलोकमें चले जाते हैं ॥ ८०–८७ ॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे त्रिपुरोपाख्याने त्रिपुरदाहो नाम चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४० ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरोपाख्यानमें त्रिपुरदाह नामक एक सौ चालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १४० ॥


एक सौ एकतालीसवाँ अध्याय

पुरूरवाका सूर्य-चन्द्रके साथ समागम और पितृतर्पण, पर्वसंधिका वर्णन तथा श्राद्धभोजी पितरोंका निरूपण

ऋषय ऊचुःऋषियोंने पूछा—सूतजी! इलानन्दन महाराज पुरूरवा प्रति मासकी अमावस्याको किस प्रकार स्वर्गलोकमें जाते हैं और वहाँ अपने पितरोंको कैसे तृप्त करते हैं? उन बुद्धिमान् नरेशके इस प्रभावको हमलोग सुनना चाहते हैं ॥ १ ॥
कथं गच्छत्यमावास्यां मासि मासि दिवं नृपः ।<br>ऐलः पुरूरवाः सूत तर्पयेत कथं पितॄन् ।<br>एतदिच्छामहे श्रोतुं प्रभावं तस्य धीमतः ॥ १
सूत उवाचसूतजी कहते हैं—ऋषियो! पूर्वकालमें महाराज मनुने भगवान् मधुसूदनसे यही प्रश्न किया था। उस समय भगवान्ने उन सूर्यपुत्र मनुके प्रति जो कुछ कहा था, वही मैं बतला रहा हूँ, आपलोग ध्यान देकर सुनिये ॥ २ ॥
एतदेव तु पप्रच्छ मनुः स मधुसूदनम् ।<br>सूर्यपुत्राय चोवाच यथा तन्मे निबोधत ॥ २

* अध्याय १४१ * ५०९


मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा- राजन्! मैं इलापुत्र पुरूरवाका
तस्य चाहं प्रवक्ष्यामि प्रभावं विस्तरेण तु।<br>ऐलस्य दिवि संयोगं सोमेन सह धीमता॥ ३प्रभाव, स्वर्गलोकमें उसका बुद्धिमान् चन्द्रमाके साथ संयोग, उन चन्द्रमासे अमृतकी उपलब्धि तथा पितृतर्पणकी बात विस्तारपूर्वक बतला रहा हूँ। सौम्य, बर्हिषद्, काव्य
सोमाच्चैवामृतप्राप्तिः पितॄणां तर्पणं तथा।<br>सौम्या बर्हिषदः काव्या अग्निष्वात्तास्तथैव च॥ ४तथा अग्निष्वात्तसंज्ञक पितरों तथा नक्षत्रोंपर विचरण करते हुए सूर्य और चन्द्रमा जिस समय अमावास्या
यदा चन्द्रश्च सूर्यश्च नक्षत्राणां समागतौ।<br>अमावास्यां निवसतः एकस्मिन्नथ मण्डले॥ ५तिथिको एक मण्डल अर्थात् एक राशिपर स्थित होते हैं, उस समय वह प्रत्येक अमावास्याको सूर्य और चन्द्रमाका
तदा स गच्छति द्रष्टुं दिवाकरनिशाकरौ।<br>अमावास्याममावास्यां मातामहपितामहौ॥ ६दर्शन करनेके लिये स्वर्गमें जाता है और वहाँ मातामह (नाना) और पितामह (बाबा)—दोनोंको अभिवादन कर कालकी प्रतीक्षा करता हुआ कुछ दिनतक ठहरा
अभिवाद्य तु तौ तत्र कालापेक्षः स तिष्ठति।<br>प्रचस्कन्द ततः सोममर्चयित्वा परिश्रमत्॥ ७रहता है। चन्द्रमासे अमृतके क्षरण होनेपर उससे परिश्रमपूर्वक पितरोंकी पूजा करके लौटता है। किसी महीनेमें श्राद्ध
ऐलः पुरूरवा विद्वान् मासि श्राद्धचिकीर्षया।<br>ततः स दिवि सोमं वै ह्युपतस्थे पितॄनपि॥ ८करनेकी इच्छासे इलानन्दन विद्वान् पुरूरवा स्वर्गलोकमें चन्द्रमा और पितरोंके निकट गया और दो लवमात्र कुहू
द्विलवं कुहुमात्रं च तावुभौ तु निधाय सः।<br>सिनीवालीप्रमाणाल्यकुहूमात्रव्रतोदये ॥ ९अमावास्यामें उसने दोनोंको स्थापित किया; क्योंकि पितृ-व्रतमें जब सिनीवालीका प्रमाण थोड़ा तथा कुहू (अमावास्या) प्रशस्त मानी गयी है। अतः कुहूका समय प्राप्त हुआ
कुहूमात्रं पितॄद्देशं ज्ञात्वा कुहूमुपासते।<br>तमुपास्य ततः सोमं कलापेक्षी प्रतीक्षते॥ १०जानकर वह पितरोंके उद्देश्यसे कुहूकी उपासना करता है। उसकी उपासना करनेके पश्चात् वह कालकी प्रतीक्षा
स्वधामृतं तु सोमाद् वै वसंस्तेषां च तृप्तये।<br>दशभिः पञ्चभिश्चैव स्वधामृतपरिस्त्रवैः।<br>कृष्णपक्षभुजां प्रीतिर्दुह्यते परमांशुभिः॥ ११करता हुआ चन्द्रमाकी भी प्रतीक्षा करता है। वहाँ रहते हुए उसे पितरोंकी तृप्तिके लिये चन्द्रमासे स्वधारूप अमृत प्राप्त होता है। चन्द्रमाकी पंद्रह किरणोंसे स्वधामृतका क्षरण होता है। कृष्णपक्षमें श्राद्धभोजी पितरोंका उन श्रेष्ठ
सद्योऽभिक्षरता तेन सौम्येन मधुना च सः।<br>निवापेष्वथ दत्तेषु पित्र्येण विधिना तु वै॥ १२किरणोंसे बड़ा प्रेम रहता है तथा अन्य पितर उनसे द्वेष करते हैं। पुरूरवा तुरंत अभिक्षरित हुए उस उत्तम मधुको पितृ-श्राद्धकी विधिके अनुसार श्राद्धके समय पितरोंको
स्वधामृतेन सौम्येन तर्पयामास वै पितॄन्।<br>सौम्या बर्हिषदः काव्या अग्निष्वात्तास्तथैव च॥ १३प्रदान करता है। इस प्रकार वह उत्तम स्वधामृतसे सौम्य, बर्हिषद्, काव्य तथा अग्निष्वात्त पितरोंको तृप्त करता
ऋतुरग्निः स्मृतो विप्रैर्ऋतुं संवत्सरं विदुः।<br>जज्ञिरे ऋतवस्तस्मादृर्तुभ्यो ह्यार्तवाऽभवन्॥ १४रहता है। महर्षियोंने ऋतुको अग्नि बतलाया है और ऋतुको संवत्सर भी कहते हैं। उस संवत्सरसे ऋतुकी उत्पत्ति होती है और ऋतुओंसे उत्पन्न हुए पितर आर्तव
पितरोऽर्तवोऽर्धमासा विज्ञेया ऋतुसूनवः।<br>पितामहास्तु ऋतवो ह्यमावास्याब्दसूनवः।<br>प्रपितामहाः स्मृता देवाः पञ्चाब्दा ब्रह्मणः सुताः॥ १५कहलाते हैं। आर्तव और अर्धमास पितरोंको ऋतुका पुत्र तथा ऋतुस्वरूप पितामह और अमावास्याको संवत्सरका पुत्र जानना चाहिये। प्रपितामह और पञ्च संवत्सररूप देवगण ब्रह्माके पुत्र माने गये हैं॥३—१५॥