भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय १४० *५०५
वैधुर्यं दैवतं दृष्ट्वा शैलादिर्गजवद्गतिः।<br>किमिदं त्विति पप्रच्छ शूलपाणिं महेश्वरम्॥ ४८<br><br>ततः शशाङ्कतिलकः कपर्दी परमार्तवत्।<br>उवाच नन्दिनं भक्तः स मयोऽद्य विनङ्क्ष्यति॥ ४९<br><br>अथ नन्दीश्वरस्तूर्णं मनोमारुतवद् बली।<br>शरे त्रिपुरमायाति त्रिपुरं प्रविवेश सः॥ ५०<br><br>स मयं प्रेक्ष्य गणपः प्राह काञ्चनसन्निभः।<br>विनाशस्त्रिपुरस्यास्य प्राप्तो मय सुदारुणः॥ ५१<br><br>अनेनैव गृहेण त्वमपक्राम ब्रवीम्यहम्।<br><br>श्रुत्वा तन्नन्दिवचनं दृढभक्तो महेश्वरे।<br>तेनैव गृहमुख्येन त्रिपुरादपसर्पितः॥ ५२<br><br>सोऽपीषुः पत्रपुटवद् दग्ध्वा तन्नगरत्रयम्।<br>त्रिधा इव हुताशश्च सोमो नारायणस्तथा॥ ५३<br><br>शरतेजःपरीतानि पुराणि द्विजपुङ्गवाः।<br>दुष्पुत्रदोषाद् दह्यन्ते कुलान्यूर्ध्वं यथा तथा॥ ५४है, धिक्कार है, हाय! बड़े कष्टकी बात हो गयी' यों कहते हुए चिल्ला उठे। इस प्रकार शंकरजीको व्याकुल देखकर गजराजकी चालसे चलनेवाले नन्दीश्वर शूलपाणि महेश्वरके निकट पहुँचे और पूछने लगे—'कहिये, क्या बात है?' तब चन्द्रशेखर जटाजूटधारी भगवान् शंकरने अत्यन्त दुःखी होकर नन्दीश्वरसे कहा—'आज मेरा वह भक्त मय भी नष्ट हो जायगा।' यह सुनकर मन और वायुके समान वेगशाली महाबली नन्दीश्वर तुरंत उस बाणके त्रिपुरमें पहुँचनेके पूर्व ही वहाँ जा पहुँचे। वहाँ स्वर्ण-सरीखे कान्तिमान् गणेश्वर नन्दीने मयके निकट जाकर कहा—'मय! इस त्रिपुरका अत्यन्त भयंकर विनाश आ पहुँचा है, इसलिये मैं तुम्हें बतला रहा हूँ। तुम अपने इस गृहके साथ इससे बाहर निकल जाओ।' तब महेश्वरके प्रति दृढ़ भक्ति रखनेवाला मय नन्दीश्वरके उस वचनको सुनकर अपने उस मुख्य गृहके साथ त्रिपुरसे निकलकर भाग गया। तदनन्तर वह बाण अग्नि, सोम और नारायणके रूपसे तीन भागोंमें विभक्त होकर उन तीनों नगरोंको पत्तेके दोनेकी तरह जलाकर भस्म कर दिया। द्विजवरो! वे तीनों पुर बाणके तेजसे उसी प्रकार जलकर नष्ट हो रहे थे, जैसे कुपुत्रके दोषसे आगेकी पीढ़ियाँ नष्ट हो जाती हैं॥ ४५—५४॥
मेरुकैलासकल्पानि मन्दराग्रनिभानि च।<br>सकपाटगवाक्षाणि बलिभिः शोभितानि च॥ ५५<br><br>सप्रासादानि रम्याणि कूटागारोत्कटानि च।<br>सजलानि समाख्यानि सावलोकनकानि च॥ ५६<br><br>बद्धध्वजपताकानि स्वर्णरौप्यमयानि च।<br>गृहाणि तस्मिंस्त्रिपुरे दानवानामुपद्रवे।<br>दह्यन्ते दहनाभानि दहनेन सहस्रशः॥ ५७<br><br>प्रासादाग्रेषु रम्येषु वनेषूपवनेषु च।<br>वातायनगताश्चान्याश्चाकाशस्य तलेषु च॥ ५८<br><br>रमणैरुपगूढाश्च रमन्त्यो रमणैः सह।<br>दह्यन्ते दानवेन्द्राणामग्निना ह्यपि ताः स्त्रियः॥ ५९<br><br>काचित्प्रियं परित्यज्य अशक्ता गन्तुमन्यतः।<br>पुरः प्रियस्य पञ्चत्वं गताग्निवदने क्षयम्॥ ६०उस त्रिपुरमें ऐसे गृह बने थे जो सुमेरु, कैलास और मन्दराचलके अग्रभागकी तरह दीख रहे थे। जिनमें बड़े-बड़े किंवाड़ और झरोखे लगे हुए थे तथा छज्जाओंकी विचित्र छटा दीख रही थी। जो सुन्दर महलों, उत्कृष्ट कूटागारों (ऊपरी छतके कमरों), जल रखनेकी वेदिकाओं और खिड़कियोंसे सुशोभित थे। जिनके ऊपर सुवर्ण एवं चाँदीके बने हुए डंडोंमें बँधे हुए ध्वज और पताकाएँ फहरा रही थीं। ये सभी हजारोंकी संख्यामें दानवोंके उस उपद्रवके समय अग्निद्वारा जलाये जा रहे थे, जो आगकी तरह धधक रहे थे। दानवेन्द्रोंकी स्त्रियाँ, जिनमें कुछ महलोंके रमणीय शिखरोंपर बैठी थीं, कुछ वनों और उपवनोंमें घूम रही थीं, कुछ झरोखोंमें बैठकर दृश्य देख रही थीं कुछ मैदानमें घूम रही थीं—ये सभी अग्निद्वारा जलायी जा रही थीं। कोई अपने पतिको छोड़कर अन्यत्र जानेमें असमर्थ थी, अतः पतिके सम्मुख ही अग्निकी लपटोंमें आकर दग्ध हो