मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ५०४ | * मत्स्यपुराण * |
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| श्लोक | अर्थ |
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| तामेव तु विनिष्क्रम्य शक्तिं शोणितभूषिताम्।<br>विद्युन्मालिनमुद्दिश्य चिक्षेप प्रमथाग्रणीः॥ ३५<br>तया भिन्नतनुत्राणो विभिन्नहृदयस्त्वपि।<br>विद्युन्माल्यपतद् भूमौ वज्राहत इवाचलः॥ ३६ | प्रमथगणोंके नायक नन्दीश्वरने रक्तसे लथपथ हुई उस शक्तिको हाथमें लेकर विद्युन्मालीको लक्ष्य करके फेंक दिया। फिर तो उस शक्तिने विद्युन्मालीके कवचको फाड़कर उसके हृदयको भी विदीर्ण कर दिया, जिससे वह वज्रसे मारे गये पर्वतकी तरह धराशायी हो गया॥ २९—३६॥ |
| विद्युन्मालिनि निहते सिद्धचारणकिन्नराः।<br>साधु साध्विति चोक्त्वा ते पूजयन्त उमापतिम्॥ ३७<br>नन्दिना सादिते दैत्ये विद्युन्मालौ हते मयः।<br>ददाह प्रमथानीकं वनमग्निरिवोद्धतः॥ ३८<br>शूलनिर्दारितोरस्का गदाचूर्णितमस्तकाः।<br>इषुभिर्गाढविद्धाश्च पतन्ति प्रमथार्णवे॥ ३९<br>अथ वज्रधरो यमोऽर्थदः स च नन्दी<br>स च षण्मुखो गुहः।<br>मयमसुरवीरसम्प्रवृत्तं विविघुः शस्त्रवरैर्हतारयः॥ ४०<br>नागं तु नागाधिपतेः शताक्षं<br>मयो विदार्येषु वरेण तूर्णम्।<br>यमं च वित्ताधिपतिं च विद्ध्वा<br>ररास मत्ताम्बुदवत् तदानीम्॥ ४१<br>ततः शरैः प्रमथगणैश्च दानवा<br>दृढाहताश्चोत्तमवेगविक्रमाः।<br>भृशानुविद्धास्त्रिपुरं प्रवेशिता<br>यथासुराश्चक्रधरेण संयुगे॥ ४२<br>ततस्तु शङ्खानकभेरीमर्दलाः<br>ससिंहनादा दनुपुत्रभङ्गदाः।<br>कपर्दिसैन्ये प्रबभुः समन्ततो<br>निपात्यमाना युधि वज्रसंनिभाः॥ ४३<br>अथ दैत्यपुराभावे पुष्ययोगो बभूव ह।<br>बभूव चापि संयुक्तं तद्योगेन पुरत्रयम्॥ ४४ | इस प्रकार विद्युन्मालीके मारे जानेपर सिद्ध, चारण और किन्नरोंके समूह 'ठीक है, ठीक है' ऐसा कहते हुए शंकरजीकी पूजा करने लगे। इधर नन्दीश्वरद्वारा दैत्य विद्युन्मालीके मारे जानेपर मयने प्रमथोंकी सेनाको उसी प्रकार जलाना आरम्भ किया, जैसे उद्दीप्त दावाग्नि वनको जला डालती है। उस समय शूलके आघातसे जिनके वक्षःस्थल फट गये थे एवं गदाके प्रहारसे मस्तक चूर्ण हो गये थे और जो बाणोंकी मारसे अत्यन्त घायल हो गये थे, ऐसे प्रमथगण समुद्रमें गिर रहे थे। तदनन्तर शत्रुओंके विनाशक वज्रधारी इन्द्र, यमराज, कुबेर, नन्दीश्वर तथा छः मुखवाले स्वामीकार्तिक—ये सभी असुर-वीरोंसे घिरे हुए मयको श्रेष्ठ अस्त्रोंद्वारा बाँधने लगे। उस समय मयने शीघ्र ही एक श्रेष्ठ बाणसे गजारूढ़ सौ नेत्रोंवाले इन्द्रको तथा ऐरावत नागको विदीर्ण कर यमराज और कुबेरको भी बाँध दिया। फिर वह घुमड़ते हुए बादलकी तरह गर्जना करने लगा। इधर प्रमथगणोंद्वारा छोड़े गये बाणोंसे उत्तम वेग एवं पराक्रमशाली दानव बुरी तरह घायल हो रहे थे। वे अत्यन्त घायल होनेके कारण भागकर त्रिपुरमें उसी प्रकार घुस रहे थे, जैसे युद्धस्थलमें चक्रपाणि विष्णुके प्रहारसे असुर। तत्पश्चात् रणभूमिमें शंकरजीकी सेनामें चारों ओर शङ्ख, ढोल, भेरी और मृदङ्ग बज उठे। वीरोंका सिंहनाद वज्रकी गड़गड़ाहटकी भाँति गूँज उठा, जो दानवोंकी पराजयको सूचित कर रहा था। इसी समय उस दैत्यपुरका विनाशक पुष्ययोग आ गया। उस योगके प्रभावसे तीनों पुर संयुक्त हो गये॥ ३७—४४॥ |
| ततो बाणं त्रिधा देवस्त्रिदैवतमयं हरः।<br>मुमोच त्रिपुरे तूर्णं त्रिनेत्रस्त्रिपथाधिपः॥ ४५<br>तेन मुक्तेन बाणेन बाणपुष्पसमप्रभम्।<br>आकाशं स्वर्णसंकाशं कृतं सूर्येण रञ्जितम्॥ ४६<br>मुक्त्वा त्रिदैवतमयं त्रिपुरे त्रिदशः शरम्।<br>धिग्धिङ्मामेति चक्रन्द कष्टं कष्टमिति ब्रुवन्॥ ४७ | तब त्रैलोक्याधिपति त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकरने शीघ्र ही अपने त्रिदेवमय बाणको तीन भागोंमें विभक्त कर त्रिपुरपर छोड़ दिया। उस छूटे हुए बाणने (तीनों देवताओंके अंशसे तीन प्रकारकी प्रभासे युक्त होकर) बाण वृक्षके पुष्पके समान नीले आकाशको स्वर्ण-सदृश प्रभाशाली और सूर्यकी किरणोंसे उद्दीप्त कर दिया। देवेश्वर शम्भु त्रिपुरपर त्रिदेवमय बाण छोड़कर—'मुझे धिक्कार |