भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

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पृष्ठ 513
  • अध्याय १४० * | ५०३ ---|---:

| तमेवंवादिनं दैत्यं नन्दीशस्तपतां वरः।<br>उवाच प्रहरंस्तत्र वाक्यालङ्कारकोविदः॥ २१<br>दानवाधम कामानां नैषोऽवसर इत्युत।<br>शक्तो हन्तुं किमात्मानं जातिदोषाद् विबृंहसि॥ २२<br>यदि तावन्मया पूर्वं हतोऽसि पशुवद् यथा।<br>इदानीं वा कथं नाम न हिंस्ये क्रतुदूषणम्॥ २३<br>सागरं तरते दोर्भ्यां पातयेद् यो दिवाकरम्।<br>सोऽपि मां शक्नुयान्नैव चक्षुर्भ्यां समवीक्षितुम्॥ २४<br>इत्येवंवादिनं तत्र नन्दिनं तन्निभो बले।<br>बिभेदैकेषुणा दैत्यः करेणार्क इवाम्बुदम्॥ २५<br>वक्षसः स शरस्तस्य पपौ रुधिरमुत्तमम्।<br>सूर्यस्स्वात्मप्रभावेण नद्यर्णवजलं यथा॥ २६<br>स तेन सुप्रहारेण प्रथमं च तिरोहितः।<br>हस्तेन वृक्षमूत्पाट्य चिक्षेप गजराडिव॥ २७<br>वायुनुन्नः स च तरुः शीर्णपुष्पो महारवः।<br>विद्युन्मालिशरैश्छिन्नः पपात पतगेशवत्॥ २८<br>वृक्षमालोक्य तं छिन्नं दानवेन वरेषुभिः।<br>रोषमाहारयत् तीव्रं नन्दीश्वरः सुविग्रहः॥ २९<br>सोद्यम्य करमारावे रविशक्रकरप्रभम्।<br>दुद्राव हन्तुं स क्रूरं महिषं गजराडिव॥ ३०<br>तमापतन्तं वेगेन वेगवान् प्रसभं बलात्।<br>विद्युन्माली शरशतैः पूरयामास नन्दिनम्॥ ३१<br>शरकण्टकिताङ्गो वै शैलादिः सोऽभवत् पुनः।<br>अरेर्गृह्य रथं तस्य महतः प्रययौ जवात्॥ ३२<br>विलम्बिताश्वो विशिरो भ्रमितश्च रणे रथः।<br>पपात मुनिशापेन सादित्योऽर्करथो यथा॥ ३३<br>अन्तरान्निर्गतश्चैव मायया स दितेः सुतः।<br>आजघान तदा शक्त्या शैलादिं समवस्थितम्॥ ३४ | तब वाक्यके अलंकारोंके ज्ञाता एवं श्रेष्ठ तेजस्वी नन्दीश्वरने ऐसा कहनेवाले दैत्य विद्युन्मालीपर प्रहार करते हुए कहा—'दानवाधम ! तुमलोग इस समय कामासक्त ही हो, जिसका यह अवसर नहीं है। तुम मुझे मारनेमें समर्थ हो तो उसे कर दिखाओ, किंतु जाति-दोषके कारण तुम अपने प्रति ऐसी डींग क्यों मार रहे हो। यदि इससे भी पहले मैंने तुम्हें पशुकी तरह बहुत मारा है तो इस समय तुझ यज्ञविध्वंसीका हनन कैसे नहीं करूँगा ? (तुम समझ लो) जो हाथोंसे सागरको तैरनेकी तथा सूर्यको आकाशसे गिरा देनेकी शक्ति रखता हो, वह भी मेरी ओर आँख उठाकर नहीं देख सकता।' तब नन्दीश्वरके समान ही बलशाली विद्युन्मालीने इस प्रकार कहते हुए नन्दीश्वरको एक बाणसे वैसे ही बींध दिया, जैसे सूर्य अपनी किरणसे बादलका भेदन करते हैं। वह बाण नन्दीश्वरके वक्षःस्थलपर जा लगा और उनका शुद्ध रक्त इस प्रकार पीने लगा जैसे सूर्य अपने प्रभावसे नदी और समुद्रके जलको पीते हैं। उस प्रथम प्रहारसे अत्यन्त क्रुद्ध हुए नन्दीश्वरने अपने हाथसे एक वृक्ष उखाड़कर गजराजकी भाँति विद्युन्मालीके ऊपर फेंका। वायुसे प्रेरित हुआ वह वृक्ष घोर शब्द करता और पुष्पोंको बिखेरता हुआ आगे बढ़ा, किंतु विद्युन्मालीके बाणोंसे छिन्न-भिन्न होकर एक बड़े पक्षीकी तरह भूतलपर बिखर गया॥ १८–२८॥<br><br>विद्युन्मालीद्वारा श्रेष्ठ बाणोंके प्रहारसे उस वृक्षको छिन्न-भिन्न हुआ देखकर महाबली नन्दीश्वर अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे। फिर तो वे सूर्य और इन्द्रके हाथके समान प्रभावशाली अपने हाथको उठाकर सिंहनाद करते हुए उस क्रूर राक्षसका वध करनेके लिये इस प्रकार झपटे, जैसे गजराज भैंसेपर टूट पड़ता है। नन्दीश्वरको वेगपूर्वक आक्रमण करते देखकर वेगशाली विद्युन्मालीने बलपूर्वक नन्दीश्वरके शरीरको सैकड़ों बाणोंसे व्याप्त कर दिया। उस समय नन्दीश्वरका शरीर बाणरूपी काँटोंसे भरा हुआ दिखायी पड़ने लगा; तब उन्होंने अपने शत्रु विद्युन्मालीके रथको पकड़कर बड़े वेगसे दूर फेंक दिया। उस समय उस रथके घोड़े उसमें लटके हुए थे और उसका अग्रभाग टूट गया था तथा वह चक्कर काटता हुआ रणभूमिमें उसी प्रकार गिर पड़ा, जैसे मुनिके शापसे सूर्यसहित सूर्यका रथ गिर पड़ा था। तब दितिपुत्र विद्युन्माली मायाके बलसे अपनेको सुरक्षित रखकर रथके भीतरसे निकल पड़ा और उसने सामने खड़े हुए नन्दीश्वरपर शक्तिसे प्रहार किया। |