मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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५०२ * मत्स्यपुराण *
| Sanskrit | Hindi |
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| ते चासीन् पट्टिशान् शक्तीः शूलदण्डपरश्वधान् ।<br>शरासनानि वज्राणि गुरूणि मुसलानि च ॥ ६<br><br>प्रगृह्य कोपरक्ताक्षाः सपक्षा इव पर्वताः ।<br>निजघ्नुः पर्वतघ्नाय घना इव तपात्यये ॥ ७ | फिर तो पंखधारी पर्वतोंकी भाँति विशालकाय दानवोंके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। वे खड्ग, पट्टिश (पट्टे), शक्ति, शूल, दण्ड, कुठार, धनुष, वज्र तथा बड़े-बड़े मूसलोंको लेकर एक साथ ही इन्द्रपर इस प्रकार प्रहार करने लगे, जैसे ग्रीष्म-ऋतुके बीत जानेपर बादल जलकी वृष्टि करते हैं॥ १-७॥ |
| सविद्युन्मालिनस्ते वै समया दितिनन्दनाः ।<br>मोदमानाः समासेदुर्देवदेवैः सुरारयः ॥ ८<br><br>मर्त्तव्यकृतबुद्धीनां जये चानिश्चितात्मनाम् ।<br>अबलानां चमूर्ह्यासीदबलावयवा इव ॥ ९<br><br>विगर्जन्त इवाम्भोदा अम्भोदसदृशत्विषः ।<br>प्रयुध्य युद्धकुशलाः परस्परकृतागसः ॥ १०<br><br>धूमायन्तो ज्वलद्भिश्च आयुधैश्चन्द्रवर्चसैः ।<br>कोपाद् वा युद्धलुब्धाश्च कुट्ट्यन्ते परस्परम् ॥ ११<br><br>वज्राहताः पतन्त्यन्ये बाणैरन्ये विदारिताः ।<br>अन्ये विदारिताश्चक्रैः पतन्ति हृदधेर्जले ॥ १२<br><br>छिन्नस्रग्दामहाराश्च प्रमृष्टाम्बरभूषणाः ।<br>तिमिनक्रगणे चैव पतन्ति प्रमथाः सुराः ॥ १३<br><br>गदानां मुसलानां च तोमराणां परश्वधाम् ।<br>वज्रशूलर्ष्टिपातानां पट्टिशानां च सर्वतः ॥ १४<br><br>गिरिशृङ्गोपलानां च प्रेरितानां प्रमन्युभिः ।<br>सजवानां दानवानां सधूमानां रवित्विषाम् ।<br>आयुधानां महानाघः सोऽग्रौघे पतत्यपि ॥ १५<br><br>प्रवृद्धवेगैस्तैस्तत्र सुरासुरकरेरितैः ।<br>आयुधैस्त्रस्तनक्षत्रः क्रियते संक्षयो महान् ॥ १६<br><br>क्षुद्राणां गजयोर्युद्धे यथा भवति सङ्क्षयः ।<br>देवासुरगणैस्तद्वत् तिमिनक्रक्षयोऽभवत् ॥ १७ | इस प्रकार मयसहित देवशत्रु दैत्यगण विद्युन्मालीके साथ होकर प्रसन्नतापूर्वक देवेश्वरोंसे टक्कर लेने लगे। उनके मनमें विजयकी आशा तो थी ही नहीं, अतः वे मरनेपर उतारू हो गये थे। उन बलहीनोंकी सेना स्त्रियोंके अवयवोंकी तरह दुर्बल थी। मेघकी-सी कान्तिवाले युद्धकुशल दैत्य परस्पर एक-दूसरेपर प्रहार करते हुए लड़ रहे थे और मेघके समान गरज रहे थे। युद्धलोभी सैनिक प्रज्वलित अग्नि एवं चन्द्रमाके समान तेजस्वी अस्त्रोंद्वारा क्रोधपूर्वक परस्पर एक-दूसरेको मार-पीट-कूट रहे थे। कुछ लोग वज्रसे घायल होकर, कुछ लोग बाणोंसे विदीर्ण होकर और कुछ लोग चक्रोंसे छिन्न-भिन्न होकर समुद्रके जलमें गिर रहे थे। (दैत्योंकी मारसे) जिनकी मालाओंके सूत्र और हार टूट गये थे तथा जिनके वस्त्र और आभूषण नष्ट-भ्रष्ट हो गये थे, वे देवता और गणेश्वर समुद्रमें मगरमच्छों एवं नाकोंके मध्यमें गिर रहे थे। धूमयुक्त सूर्यकी-सी कान्तिवाले वेगशाली दानवोंद्वारा क्रोधपूर्वक चलाये गये गदा, मुसल, तोमर, कुठार, वज्र, शूल, ऋष्टि, पट्टिश, पर्वतशिखर और शिलाखण्ड आदि आयुधोंका महान् समूह सागरमें गिर रहा था। देवताओं और असुरोंके हाथोंसे वेगपूर्वक चलाये गये आयुधोंसे नक्षत्रगण (भी) त्रस्त हो रहे थे। और महान् संहार हो रहा था। जैसे दो हाथियोंके लड़ते समय क्षुद्र जीवोंका विनाश हो जाता है, उसी तरह देवताओं और असुरोंके संग्रामसे मगरमच्छ और नाकोंका संहार होने लगा ॥ ८-१७॥ |
| विद्युन्माली च वेगेन विद्युन्माली इवाम्बुदः ।<br>विद्युन्मालं घनोन्नादो नन्दीश्वरमभिद्रुतः ॥ १८ | तत्पश्चात् विद्युत्समूहोंसे युक्त मेघकी तरह कान्तिमान् विद्युन्मालीने बिजलीसे युक्त बादलकी तरह गरजते हुए नन्दीश्वरपर वेगपूर्वक धावा किया। |
| स तं तमोऽरिवदनं प्रणदन् वदतां वरः ।<br>उवाच युधि शैलादिं दानवोऽम्बुधिनिःस्वनः ॥ १९ | उस समय वक्ताओंमें श्रेष्ठ दानव विद्युन्माली बादलकी तरह गरजता हुआ युद्धस्थलमें सूर्यके समान तेजस्वी मुखवाले नन्दीश्वरसे बोला— |
| युद्धाकाङ्क्षी तु बलवान् विद्युन्माल्यहमागतः ।<br>यदि त्विदानीं मे जीवन्मुच्यसे नन्दिकेश्वर ।<br>न विद्युन्मालिहननं वचोभिर्युधि दानवम् ॥ २० | 'नन्दिकेश्वर! मैं बलवान् विद्युन्माली हूँ और युद्ध करनेकी इच्छासे तुम्हारे सम्मुख खड़ा हूँ। अब तुम्हार मेरे हाथोंसे जीवित बच पाना असम्भव है। युद्धस्थलमें वचनोंद्वारा दानव विद्युन्मालीका हनन नहीं किया जा सकता।' |