मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अध्याय १३९ * ४९९
| स्थित्वैव कान्तस्य तु पादमूले<br>काचिद् वरस्त्री स्वकपोलमूले।<br>विशेषकं चारुतरं करोति<br>तेनाननं स्वं समलङ्करोति॥ २६<br><br>दृष्ट्वाननं मण्डलदर्पणस्थं<br>महाप्रभा मे मुखजेति जप्त्वा।<br>स्मृत्वा वराङ्गी रमणैरितानि<br>तेनैव भावेन रतीमवाप॥ २७<br><br>रोमाञ्चितैर्गात्रवरैर्युवभ्यो<br>रतानुरागादरमणेन चान्याः।<br>स्वयं द्रुतं यान्ति मदाभिभूताः<br>क्षपा यथा सार्कदिनावसाने॥ २८<br><br>पेपीयते चातिरसानुविद्धा<br>विमार्गितान्या च प्रियं प्रसन्ना।<br>काचित् प्रियस्यातिचिरात् प्रसन्ना<br>आसीत् प्रलापेषु च सम्प्रसन्ना॥ २९<br><br>गोशीर्षयुक्तैर्हरिचन्दनैश्च<br>पङ्काङ्किताक्षीरधराऽऽसुरीणाम्।<br>मनोज्ञरूपा रुचिरा बभूवुः<br>पूर्णामृतस्येव सुवर्णकुम्भाः॥ ३०<br><br>क्षताधरोष्ठा द्रुतदोषरक्ता<br>ललन्ति दैत्या दयितासु रक्ताः।<br>तन्त्रीप्रलापास्त्रिपुरेषु रक्ताः<br>स्त्रीणां प्रलापेषु पुनर्विरक्ताः॥ ३१<br><br>क्वचित् प्रवृत्तं मधुराभिगानं<br>कामस्य बाणैः सुकृतं निधानम्।<br>आपानभूमीषु सुखप्रमेयं<br>गेयं प्रवृत्तं त्वथ साधयन्ति॥ ३२<br><br>गेयं प्रवृत्तं त्वथ शोधयन्ति<br>केचित् प्रियां तत्र च साधयन्ति।<br>केचित् प्रियां सम्प्रति बोधयन्ति<br>सम्बुध्य सम्बुध्य च रामयन्ति॥ ३३<br><br>चूतप्रसूनप्रभवः सुगन्धः<br>सूर्ये गते वै त्रिपुरे बभूव।<br>समर्मरो नूपुरमेखलानां<br>शब्दश्च सम्बाधति कोकिलानाम्॥ ३४ | प्रकार सायंकालमें शीतरश्मि चन्द्रमाके उदय होनेपर जब त्रिपुरमें चाँदनी फैल गयी, तब असुरगण अपने-अपने गृहोंको सजाने लगे। गलियों, सड़कों, महलों और गृहोंमें तेलसे भरे हुए दीपक जला दिये गये, जो चम्पाके पुष्पकी भाँति सुशोभित हो रहे थे। उसी प्रकार देवालयोंमें भी तेलसे परिपूर्ण दीपक जलाये गये। दानवोंके गृह धन-सम्पत्तिसे परिपूर्ण तो थे ही, उनमें अनेक प्रकारके रत्न भी जड़े हुए थे, जिससे वे जलते हुए दीपकोंको चन्द्रोदय होनेपर ग्रहोंकी तरह अधिक उद्दीप्त कर रहे थे॥ १५–३०॥<br><br>वे भवन बाहरसे तो चन्द्रमाकी किरणोंसे प्रकाशित थे और भीतर जलते हुए दीपकोंसे उद्दीप्त हो रहे थे, जिससे वे त्रिपुरके अन्धकारको उसी प्रकार पीकर नष्ट कर रहे थे, जैसे उपद्रवोंके प्रकोपसे कुल नष्ट हो जाता |