मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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४९८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत | हिन्दी |
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| इति सम्मन्त्र्य हृष्टास्ते पुरान्तर्विबुधारयः।<br>प्रदोषे मुदिता भूत्वा चेरुर्मन्मथचारताम्॥ १४॥ | पुलकित शरीरवाले दैत्य हर्षपूर्वक इस प्रकार कह रहे थे। इस प्रकार वे देवशत्रु दानव त्रिपुरके भीतर मन्त्रणा करके सायंकाल होनेपर प्रसन्न होकर स्वच्छन्दाचारमें प्रसक्त हो गये॥ १—१४॥ |
| मुहुर्मुक्त्तोदयो भ्रान्त उदयाग्रं महामणिः।<br>तमांस्युत्सार्य भगवांश्चन्द्रो जृम्भति सोऽम्बरम्॥ १५॥<br>कुमुदालङ्कृते हंसो यथा सरसि विस्तृते।<br>सिंहो यथा चोपविष्टो वैदूर्य्यशिखरे महान्॥ १६॥<br>विष्णोर्यथा च विस्तीर्णे हारश्चोरसि संस्थितः।<br>तथावगाढे नभसि चन्द्रोऽत्रिनयनोद्भवः।<br>भ्राजते भ्राजयंल्लोकात्सृजञ्ज्योत्स्नारसं बलात्॥ १७॥ | उसी समय बारम्बार मोतीके निकलनेका भ्रम उत्पन्न करनेवाले एवं महामणिके समान भगवान् चन्द्रमा उदयाचलके शिखरपर दीख पड़े। वे अन्धकारका विनाश करके आकाशमण्डलमें आगे बढ़ रहे थे। |
| शीतांशावुदिते चन्द्रे ज्योत्स्नापूर्णे पुरेऽसुराः।<br>प्रदोषे ललितं चक्रुर्गृहमात्मानमेव च॥ १८॥<br>रथ्यासु राजमार्गेषु प्रासादेषु गृहेषु च।<br>दीपांश्चम्पकपुष्पाभा नाल्यस्नेहप्रदीपिताः॥ १९॥<br>तदा मठेषु ते दीपाः स्नेहपूर्णाः प्रदीपिताः।<br>गृहाणि वसुमन्त्येषां सर्वरत्नमयानि च।<br>ज्वलतोऽदीपयन् दीपांचन्द्रोदय इव ग्रहाः॥ २०॥<br>चन्द्रांशुभिर्भसमानमन्तर्दीपैः सुदीपितम्।<br>उपद्रवैः कुलमिव पीयते त्रिपुरे तमः॥ २१॥ | उस समय जैसे कुमुदिनीसे सुशोभित विशाल सरोवरमें हंस, वैदूर्यके शिखरपर बैठा हुआ महान् सिंह और भगवान् विष्णुके विस्तीर्ण वक्षःस्थलपर लटकता हुआ हार शोभा पाता है, उसी तरह महर्षि अत्रिके नेत्रसे उत्पन्न हुए चन्द्रमा अथाह आकाशमें स्थित होकर |
| तस्मिन् पुरे वै तरुणप्रदोषे<br>चन्द्राट्टहासे तरुणप्रदोषे।<br>रत्यर्थिनो वै दनुजा गृहेषु<br>सहाङ्गनाभिः सुचिरं विरेमुः॥ २२॥<br>विनोदिता ये तु वृषध्वजस्य<br>पञ्चेष्ववस्ते मकरध्वजेन।<br>तत्रासुरेष्वासुरपुङ्गवेषु<br>स्वाङ्गाङ्गनाः स्वेदयुता बभूवुः॥ २३॥<br>कलप्रलापेषु च दानवीनां<br>वीणाप्रलापेषु च मूर्च्छितांस्तु।<br>मत्तप्रलापेषु च कोकिलानां<br>सचापबाणो मदनो ममन्थ॥ २४॥ | अपनी चाँदनीसे बलपूर्वक सारे लोकोंको सींचते |
| तमांसि नैशानि द्रुतं निहत्य<br>ज्योत्स्त्रावितानेन जगद्वितत्य।<br>खे रोहिणीं तां च प्रियां समेत्य<br>चन्द्रः प्रभाभिः कुरुतेऽधिराज्यम्॥ २५॥ | एवं प्रकाशित करते हुए सुशोभित हो रहे थे। इस |