मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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४९६ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मृदितमुपनिशम्य तारकाख्यं<br>रविदीप्तानलभीषणायताक्षम् ।<br>हृषितसकलनेत्रलोमसत्त्वाः<br>प्रमथास्तोयमुचो तथा नदन्ति ॥ ५१<br><br>इति सुहृदो वचनं निशम्य तत्त्वं<br>तडिन्मालेः स मयः सुवर्णमाली।<br>रणशिरस्यसिताञ्जनाचलाभो<br>जगदे वाक्यमिदं नवेन्दुमालिम् ॥ ५२<br><br>विद्युन्मालिन्न नः कालः साधितुं ह्यवहेलया।<br>करोमि विक्रमेणैतत् पुरं व्यसनवर्जितम् ॥ ५३<br><br>विद्युन्माली ततः क्रुद्धो मयश्च त्रिपुरेश्वरः।<br>गणान् जघ्नुस्तु द्राघिष्ठाः सहितास्तैर्महासुरैः ॥ ५४<br><br>येन येन ततो विद्युन्माली याति मयश्च सः।<br>तेन तेन पुरं शून्यं प्रमथोपहुङ्कृतम् ॥ ५५<br><br>अथ यमवरुणमृदङ्गघोषैः<br>पणवडिण्डिमज्यास्वनप्रघोषैः ।<br>सकरतलपुटैश्च सिंहनादै-<br>र्भवमभिपूज्य तदा सुरावतस्थुः ॥ ५६<br><br>सम्पूज्यमानोऽदितिजैर्महात्मभिः<br>सहस्ररश्मिप्रतिमौजसैर्विभुः ।<br>अभिष्टुतः सत्यरतैस्तपोधनै-<br>र्यथास्त शृङ्गाभिगतो दिवाकरः ॥ ५७ | और युद्धभूमिमें शत्रुओंके लिये संतापदायक था, वह तारक गणेश्वरोंद्वारा निहत हो गया। सूर्य एवं प्रज्वलित अग्निके समान भयंकर विशाल नेत्रोंवाले तारकको मारा गया सुनकर हर्षके कारण सभी प्रमथोंके शरीर पुलकित और नेत्र उत्फुल्ल हो गये हैं और वे बादलोंकी तरह गर्जना कर रहे हैं।' अपने मित्र विद्युन्मालीके इस तत्त्वपूर्ण वचनको सुनकर कज्जलगिरिके सदृश शरीरवाला स्वर्णमालाधारी मय रणके मुहानेपर विद्युन्मालीसे इस प्रकार बोला—'विद्युन्मालिन्! अब हमलोगोंके लिये अवहेलना (प्रमाद)-पूर्वक समय बिताना ठीक नहीं है। मैं अपने पराक्रमसे पुनः इस त्रिपुरको आप्तिरहित बनाऊँगा।' फिर तो विद्युन्माली और त्रिपुराधिपति मय—दोनोंने क्रुद्ध होकर महासुरोंकी विशाल सेनाके साथ गणेश्वरोंको मारना आरम्भ किया। उस समय त्रिपुरमें विद्युन्माली और मय जिस-जिस मार्गसे निकलते थे, वे मार्ग प्रमथोंके घायल होकर भाग जानेसे शून्य हो जाते थे। तब यम और वरुणके मृदङ्गघोष और ढोल, नगारे एवं धनुषकी प्रत्यञ्चाके निनादके साथ-साथ ताली बजाते और सिंहनाद करते हुए सभी देवगण शङ्करजीकी पूजा करके उन्हें घेरकर खड़े हो गये। सूर्यके समान तेजस्वी उन महात्मा देवगणोंद्वारा पूजित होते हुए तथा सत्यपरायण तपस्वियोंद्वारा स्तुति किये जाते हुए भगवान् शङ्कर अस्ताचलके शिखरपर पहुँचे हुए सूर्यकी भाँति सुशोभित हो रहे थे॥ ४७–५७॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे त्रिपुरदाहे तारकाख्यवधो नामाष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १३८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरदाहके प्रसङ्गमें तारकासुर-वध नामक एक सौ अड़तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १३८॥