मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* अध्याय १३८ * ४९५
| शेषो गिरीशः सपितामहेश-<br>श्रोत्क्षुभ्यमाणः स रथेऽम्बरस्थः।<br>बिभेद संधीषु बलाभिपन्नः<br>कूजन्निनादांश्च करोति घोरान्॥ ३९<br><br>एकं तु ऋग्वेदतुरङ्गमस्य<br>पृष्ठे पदं न्यस्य वृषस्य चैकम्।<br>तस्थौ भवः सोद्यतबाणचापः<br>पुरस्य तत्सङ्गममीक्षमाणः॥ ४०<br><br>तदा भवपादन्यासाद्द्वयस्य वृषभस्य च।<br>पेतुः स्तनाश्च दन्ताश्च पीडिताभ्यां त्रिशूलिना ॥ ४१<br><br>ततःप्रभृति चाश्वानां स्तना दन्ता गवां तथा।<br>गूढाः समभवंस्तेन चादृश्यत्वमुपागताः ॥ ४२<br><br>तारकाख्यस्तु भीमाक्षो रौद्ररक्तान्तरेक्षणीः।<br>रुद्रान्तिके सुसंरुद्धो नन्दिना कुलनन्दिना ॥ ४३<br><br>परश्वधेन तीक्ष्णेन स नन्दी दानवेश्वरम्।<br>तक्षयामास वै तक्षा चन्दनं गन्धदो यथा ॥ ४४<br><br>परश्वधहतः शूरः शैलादिः शरभो यथा।<br>दुद्राव खड्गं निष्कृष्य तारकाख्यो गणेश्वरम्॥ ४५<br><br>यज्ञोपवीतमार्गेण चिच्छेद च ननाद च।<br>ततः सिंहरवो घोरः शङ्खशब्दश्च भैरवः।<br>गणेश्वरैः कृतस्तत्र तारकाख्ये निषूदिते ॥ ४६<br><br>प्रमथारसितं श्रुत्वा वादित्रस्वनमेव च।<br>पार्श्वस्थः सुमहापार्श्वं विद्युन्मालिं मयोऽब्रवीत् ॥ ४७<br><br>बहुवदनवतां किमेष शब्दो<br>नदतां श्रूयते भिन्नसागराभः।<br>वद वद त्वं तडिन्मालिन् किमेत-<br>दृणपा युयुधुर्यथा गजेन्द्राः॥ ४८<br><br>इति मयवचनाङ्कुशार्दित-<br>स्तं तडिन्माली रविरिवांशुमाली।<br>रणशिरसि समागतः सुराणां<br>निजगादेदमरिन्दमोऽतिदुःखात् ॥ ४९<br><br>यमवरुणमहेन्द्ररुद्रवीर्य-<br>स्तव यशसो निधिर्धीर्ः तारकाख्यः।<br>सकलसमरशीर्षपर्वतेन्द्रो<br>युद्ध्वा यस्तपति हि तारको गणेन्द्रैः ॥ ५० | आकाशस्थित रथपर बैठे हुए बलसम्पन्न शेषनाग, शंकर और ब्रह्माने विशेष क्षुब्ध होकर पृथक्-पृथक् तारकासुरके शरीरकी संधियोंको बींध दिया और वे घोर गर्जना करने लगे। उस समय हाथमें धनुष-बाण लिये हुए भगवान् शंकर अपना एक पैर ऋग्वेदसूप घोड़ेकी तथा दूसरा पैर नन्दीश्वरकी पीठपर रखकर त्रिपुरोंके परस्पर सम्मिलनकी प्रतीक्षा करते हुए खड़े हो गये। उस समय शंकरजीके पैर रखनेसे उन त्रिशूलधारीके भारसे पीड़ित हुए अश्वके स्तन और वृषभके दाँत टूटकर गिर पड़े। तभीसे घोड़ोंके स्तन और गो-वंशके (ऊपरी जबड़ेके) दाँत गुप्त हो गये। इसी कारण वे दिखायी नहीं पड़ते। उसी समय जिसके नेत्रोंके अन्तर्भाग भयंकर और लाल थे, उस भीषण नेत्रोंवाले तारकासुरको भगवान् रुद्रके निकट आते देखकर कुलको आनन्दित करनेवाले नन्दीने रोक दिया तथा उन्होंने अपने तीखे कुठारसे उस दानवेश्वरके शरीरको इस प्रकार छील डाला, जैसे गन्धकी इच्छावाला (अथवा इत्र बनानेवाला) बढ़ई चन्दन-वृक्षको छाँट देता है। कुठारके आघातसे आहत हुए शूरवीर तारकासुरने पर्वतीय सिंहकी तरह क्रुद्ध होकर म्यानसे तलवार खींचकर गणेश्वर नन्दीपर आक्रमण किया। तब नन्दीश्वरने यज्ञोपवीत-मार्गसे (अर्थात् जनेऊ पहननेकी जगह—बाएँ कंधेसे लेकर दाहिने कटितटतक) तिरछे रूपमें तारकासुरके शरीरको विदीर्ण कर दिया और भयंकर गर्जना की। फिर तो वहाँ तारकासुरके मारे जानेपर गणेश्वरोंके भयंकर सिंहनाद गूँज उठे और उनके शङ्खोंके भीषण शब्द होने लगे॥ ३३—४६ ॥<br><br>तब प्रमथगणोंके सिंहनाद और उनके बाजोंके भीषण शब्दको सुनकर बगलमें ही स्थित मयदानवने महान् बलशाली विद्युन्मालीसे पूछा—'विद्युन्मालिन्! बताओ तो सही, अनेकों मुखोंवाले प्रमथगणोंका सागरकी गर्जनाके समान यह भयंकर सिंहनाद क्यों सुनायी पड़ रहा है? ये गणेश्वर क्यों गजराज-से गरजते हुए इतने उत्साहसे युद्ध कर रहे हैं?' इस प्रकार मयके वचनरूपी अङ्कुशसे पीड़ित हुआ किरणमाली सूर्यकी तरह तेजस्वी शत्रुदमन विद्युन्माली, जो तुरंत ही देवताओंके युद्धके मुहानेसे लौटकर आया था, अत्यन्त दुःखके साथ मयसे इस प्रकार बोला—'धैर्यशाली राजन्! जो यम, वरुण, महेन्द्र और रुद्रके समान पराक्रमी, आपकी कीर्तिका निधिस्वरूप, समस्त युद्धोंके मुहानेपर पर्वतराजकी भाँति डटा रहनेवाला |