मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ४९४ | * मत्स्यपुराण * |
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| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| कलत्रपुत्रक्षयप्राणनाशे<br>तस्मिन् पुरे युद्धमतिप्रवृत्ते।<br>महासुराः सागरतुल्यवेगा<br>गणेश्वराः कोपवृताः प्रतीयुः॥ ३०<br><br>परश्वधैस्तत्र शिलोपलैश्च<br>त्रिशूलवज्रोत्तमकम्पनेश्च ।<br>शरीरसद्मक्षपणं सुघोरं<br>युद्धं प्रवृत्तं दृढवैरबद्धम्॥ ३१<br><br>अन्योन्यमुद्दिश्य विमर्दतां च<br>प्रधावतां चैव विनिघ्नतां च।<br>शब्दो बभूवामरदानवानां<br>युगान्तकालेष्विव सागराणाम्॥ ३२<br><br>व्रणैरजस्रं क्षतजं वमन्तः<br>कोपोपरक्ता बहुधा नदन्तः।<br>गणेश्वरास्तेऽसुरपुङ्गवाश्च<br>युध्यन्ति शब्दं च महदुद्धिरन्तः॥ ३३<br><br>मार्गाः पुरे लोहितकर्दमाक्ताः<br>स्वर्णेष्टकास्फाटिकभिन्नचित्राः ।<br>कृता मुहूर्तेन सुखेन गन्तुं<br>छिन्नोत्तमाङ्गाङ्घ्रिकराः करालाः॥ ३४<br><br>कोपावृताक्षः स तु तारकाख्यः<br>संख्ये सवृक्षः सगिरिर्निलीनः।<br>तस्मिन् क्षणे द्वारवरं रिरक्षो<br>रुद्रं भवेनाद्भुतविक्रमेण॥ ३५<br><br>स तत्र प्राकारगतांश्च भूतान्-<br>शान्तान् महानद्भुतवीर्यसत्त्वः।<br>चचार चासेन्द्रियगर्वदृप्तः<br>पुराद् विनिष्क्रम्य ररास घोरम्॥ ३६<br><br>ततः स दैत्योत्तमपर्वताभो<br>यथाञ्जसा नाग इवाभिमत्तः।<br>निवारितो रुद्ररथं जिघृक्षु-<br>र्यथार्णवः सर्पति चातिवेलः॥ ३७<br><br>शेषः सुधन्वा गिरिशश्च देव-<br>श्चतुर्मुखो यः स त्रिलोचनश्च।<br>ते तारकाख्याभिगतागताभौ<br>क्षोभं यथा वायुवशात् समुद्राः॥ ३८ | इस प्रकार जब उस पुरमें स्त्री, पुत्र तथा प्राणका विनाश करनेवाला अत्यन्त भीषण युद्ध होने लगा, तब सागरतुल्य वेगशाली महान् असुर और गणेश्वर क्रोधसे भर गये। फिर तो कुठार, शिलाखण्ड, त्रिशूल, श्रेष्ठ वज्र और कम्पन* (एक प्रकारका शस्त्र) आदिके प्रहारसे शरीर और गृहको विनष्ट करनेवाला अत्यन्त घोर युद्ध आरम्भ हो गया; क्योंकि दोनों सेनाओंमें सुदृढ़ वैर बँधा हुआ था। परस्पर एक-दूसरेको लक्ष्य करके मर्दन, आक्रमण और प्रहार करनेवाले देवताओं और दानवोंका प्रलयकालमें सागरोंकी गर्जनाकी भाँति भीषण शब्द होने लगा॥ २९-३२॥<br><br>उस समय वे गणेश्वर और असुरश्रेष्ठ घावोंसे निरन्तर रक्तकी धारा बहाते हुए, बारंबार गरजते हुए और भयंकर शब्द बोलते हुए युद्ध कर रहे थे। उस पुरमें स्वर्ण और स्फटिक मणिकी ईंटोंसे बने हुए जो चित्र-विचित्र मार्ग थे, वे दो ही घड़ीमें रुधिरयुक्त कीचड़से भर दिये गये। जो सुखपूर्वक चलनेयोग्य थे, वे कटे हुए मस्तकों, पादों और पैरोंसे व्याप्त हो जानेके कारण दुर्गम हो गये। तब तारकासुर क्रोधसे आँखें तरेरता हुआ वृक्ष और पर्वत हाथमें लेकर युद्धस्थलमें आ पहुँचा। वह उस समय अद्भुत पराक्रमी शंकरद्वारा अवरुद्ध किये गये दक्षिणद्वारकी रक्षा करना चाहता था। महान् पराक्रमी एवं अद्भुत सत्त्वशाली तारकासुर अपनी इन्द्रियोंके गर्वसे उन्मत्त होकर परकोटोंपर चढ़े हुए भूतगणोंको काटकर वहाँ विचरण करने लगा। पुनः नगरसे बाहर निकलकर उसने घोर गर्जना की। पर्वतकी-सी आभावाला दैत्येन्द्र तारक मतवाले हाथीकी तरह शीघ्र ही शंकरजीके रथको पकड़ लेना चाहता था, परंतु प्रमथोंद्वारा इस प्रकार रोक दिया गया, जैसे बढ़ते हुए समुद्रको उसका तट रोक देता है। उस समय शेषनाग, ब्रह्मा तथा सुन्दर धनुष धारण करनेवाले और पर्वतपर शयन करनेवाले त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकर युद्धस्थलमें तारकासुरके आ जानेसे उसी प्रकार क्षुब्ध हो गये, जैसे वायुके वेगसे सागर उद्वेलित हो उठते हैं। |
* यह एक शस्त्र है। इसका वर्णन महाभारत १।६९।२३ में है।