मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- अध्याय १३८ * ४९३
| व्रणाननैर्ङ्गरसं स्रवद्भिः<br>सुरासुरैर्नक्रतिमिङ्गिलैश्च ।<br>कृतो मुहूर्तेन समुद्रीदेशः<br>सरक्ततोयः समुदीर्णतोयः॥ २२ | विदीर्ण कर चीत्कार कर रहे थे। देवताओं, असुरों, नाकों और तिमिंगिलोंके घावों और मुखोंसे बहते हुए रुधिरसे समुद्रके उस प्रदेशका जल मुहूर्तमात्रके लिये रक्तयुक्त हो गया और वहाँ बाढ़ आ गयी। उस त्रिपुरका |
| पूर्वं महाम्भोधरपर्वताभं<br>द्वारं महान्तं त्रिपुरस्य शक्रः।<br>निपीड्य तस्थौ महता बलेन<br>युक्तोऽमराणां महता बलेन॥ २३ | पूर्वद्वार अत्यन्त विशाल और काले मेघ तथा पर्वतके समान कान्तिमान् था। महान् बलशाली इन्द्र देवताओंकी विशाल सेनाके साथ उस द्वारको अवरुद्ध कर खड़े थे। |
| तथोत्तरं सोऽन्तरजो हरस्य<br>बालार्कजाम्बूनदतुल्यवर्णः।<br>स्कन्दः पुरद्वारमथारुरोह<br>वृद्धोऽस्तशृङ्गं प्रपतन्निवार्कः॥ २४ | उसी प्रकार उदयकालीन सूर्य और सुवर्णके तुल्य रंगवाले शंकरजीके आत्मज स्कन्द त्रिपुरके उत्तरद्वारपर ऐसे चढ़े हुए थे मानो बढ़े हुए सूर्य अस्ताचलके शिखरोंपर चढ़ रहे हों। |
| यमश्च वित्ताधिपतिश्च देवो<br>दण्डान्वितः पाशवरायुधश्च।<br>देवारिणस्तस्य पुरस्य द्वारं<br>ताभ्यां तु तत्पश्चिमतो निरुद्धम्॥ २५ | दण्डधारी यमराज और अपने श्रेष्ठ अस्त्र पाशको धारण किये हुए कुबेर—ये दोनों देवता उस देवशत्रु मयके पुरके पश्चिमद्वारपर घेरा डाले हुए थे। |
| दक्षारिरुद्रस्तपनायुताभः<br>स भास्वता देवरथेन देवः।<br>तद्दक्षिणद्वारमरेः पुरस्य<br>रुद्ध्वावतस्थो भगवांस्त्रिनेत्रः॥ २६ | दस हजार सूर्योंकी-सी आभावाले दक्षके शत्रु त्रिनेत्रधारी भगवान् रुद्रदेव उस उद्दीप्त देवरथपर आरूढ़ होकर शत्रु-नगरके दक्षिणद्वारको रोककर स्थित थे। |
| तुङ्गानि वेश्मानि सगोपुराणि<br>स्वर्णानि कैलासशशिप्रभाणि।<br>प्रह्लादरूपाः प्रमथावरुद्धा<br>ज्योतींषि मेघा इव चाश्मवर्षाः॥ २७ | उस त्रिपुरके फाटकोंसहित स्वर्णनिर्मित ऊँचे-ऊँचे महलोंको, जो कैलास और चन्द्रमाके सदृश चमक रहे थे, प्रसन्न मुखवाले प्रमथोंने उसी प्रकार अवरुद्ध कर रखा था, जैसे उपलोंकी वर्षा करनेवाले मेघ ज्योतिर्गणोंको घेर लेते हैं। |
| उत्पाट्य चोत्पाट्य गृहाणि तेषां<br>सशैलमालासमवेदिकानि ।<br>प्रक्षिप्य प्रक्षिप्य समुद्रमध्ये<br>कालाम्बुदाभाः प्रमथा विनेदुः॥ २८ | काले मेघकी-सी कान्तिवाले प्रमथगण दानवोंके पर्वतमालाके सदृश ऊँची-ऊँची वेदिकाओंसे युक्त गृहोंको, जो लाल वर्णवाले तथा अशोक-वृक्षों एवं अन्यान्य वनोंसे युक्त थे और जिनमें कोयलें कूक रही थीं, उखाड़-उखाड़कर लगातार समुद्रमें फेंक रहे थे और उच्च स्वरसे गर्जना कर रहे थे। |
| रक्तानि चाशेषवनैर्युतानि<br>साशोकखण्डानि सकोकिलानि।<br>गृहाणि हे नाथ पितः सुतेति<br>भ्रातेति कान्तेति प्रियेति चापि।<br>उत्पाट्यमानेषु गृहेषु नार्य-<br>स्त्वनार्यशब्दान् विविधान् प्रचक्रुः॥ २९ | गृहोंको उखाड़ते समय उनमें रहनेवाली स्त्रियाँ—'हे नाथ! हा पिता! अरे पुत्र! हाय भाई! हाय कान्त! हे प्रियतम!' आदि अनेक प्रकारके अनार्योचित शब्द बोल रही थीं। |